tso moriri-tso kar-Debring-Pang

शी मोरिरी पर मौसम भी सुहावना था और नजारे भी । बादल तो ऐसे दिख रहे थे जैसे कि आज अपने अपने रथ पर सवार होकर घूमने निकले हों । नीले आसमा...


शी मोरिरी पर मौसम भी सुहावना था और नजारे भी । बादल तो ऐसे दिख रहे थे जैसे कि आज अपने अपने रथ पर सवार होकर घूमने निकले हों । नीले आसमान और उस पर सफेद बादल मन मोह रहे थे । हम काफी थक चुके थे और यहां झील शुरू होने पर एक बोर्ड तो लगा था कि करजोक जीरो और दूसरी ओर करजोक के लिये बोर्ड लगा था कि करजोक 8 किलोमीटर । असल में सुमदो से जो दूरी लिख्री थी उसे शी मोरिरी ना लिखकर हर जगह करजोक के लिये लिखा गया था पर वो दूरी झील के किनारे तक की ही थी । बांयी तरफ बहुत बढिया सडक चुमार जा रही थी । चुमार तक जाने के लिये परमिट बमुश्किल ही मिलता है । उसी रोड पर हम झील के किनारे किनारे और थोडी दूर तक चले और एक बढिया सी जगह पर बाइक रोक दी ।


करजोक में रूकने खाने का साधन भी है और रूकने का भी लेकिन ना तो हमें अभी खाना खाना ​था और ना ही आज यहां पर रूकना था । इसलिये करजोक गांव में जाने का विचार त्याग दिया गया और यहीं पर झील किनारे अपना डेरा जमा लिया । पहले कुछ फोटोज खींचे गये मिश्रा जी तो नीचे उतर गये झील किनारे तक पर मै नही उतर पाया क्योंकि मेरे पैर में बहुत दर्द था और पेंगोंग झील पर की गयी पटटी बहुत टाइट थी । उसके बाद दूसरी पटटी ना होने की वजह से वो चिपक भी गयी थी । इसलिये मिश्रा जी को नीचे जाने दिया । मिश्रा जी काफी दूर तक घूमकर वापस आये तो हम चल पडे । शी मोरिरी किसी भी हाल में पेंगोंग से कम नही है पर पेंगोंग की तरह प्रसिद्ध नही है । यहां पर इतनी व्यवसायिकता भी नही है क्योंकि व्यवसायिकता भी भीड से ही तय होती है जहां पर भीड जानी शुरू वहां पर ज्यादा होटल और ढाबे वगैरा खुल जाते हैं
सुबह आठ बजे के चले हम साढे दस बजे शी मोरिरी पर पहुंच गये थे और आज का हमारा लक्ष्य था शी कार से होते हुए लेह मनाली रोड पर पहुंचना । ये रास्ता जो सुमदो से शी कार जाता है इसके बारे में पढा था कि ये काफी खराब स्थिति में है इसलिये इस रास्ते पर हो सके तो अंधेरे या शाम के समय भी जाने की कोशिश नही करनी चाहिये क्योंकि​ हम ग्रुप में नही हैं तो कोई भी दिक्कत होने पर मुश्किल बडी हो सकती है । हम सही समय पर चल रहे थे और अपने सही समय को गंवाना ठीक नही होता इसलिये सवा ग्यारह बजे हम वापस सुमदो के लिये चल दिये

ये वही रास्ता भी है जहां पर आप लेह मनाली रोड से शी कार और शी मोरिरी आ सकते हो वो भी बिना लेह जाये या बिना परमिट के । मनाली की तरफ से आने वाले शी कार से सुमदो और सुमदो से शी मोरिरी जा सकते हैं यहां तक परमिट नही लगता । इसके बाद वापसी के लिये सुमदो से लेह का दूसरा रास्ता पकडा जा सकता है । माहे पुल से आगे जाने पर ही परमिट लगता है । रास्ते में 4800 मीटर उंचाा नामशांगला दर्रा भी पडता है जिसका जिक्र आते समय करना भूल गया था । इस दर्रे को पार करके ही शी क्यागर आती है । बारह बजकर 40 मिनट पर वापस सुमदो पहुंचे और यहां की दुकान से फ्रूटी और बिस्कुट ले लिये । खाने के लिये यहां पर केवल मैगी वगैरा ही मिल सकती थी इसलिये हमने ये सूखा सामान ही ले लिया । वैसे आपातकाल के लिये मै एक किलो चने भी रखकर लाया था जो कि दिल्ली से दिल्ली पूरा सफर करके वापस घर आ गये पर खाये नही गये ।

सुमदो से कुछ किलोमीटर तक सडक बनी थी और यहां पर नमक के ढेर भी लगे थे । इस जगह पर नमक को देखकर अजीब महसूस होता है । पेंगोंग जैसी खारे पानी की झील के आसपास भी ऐसा नजारा नही दिखता जैसा कि यहां पर है । सडक खत्म होने के बाद हमारी दुश्वारियां शुरू हो गयी । यहां पर आगे पूरे रास्ते सडक नाम की चीज ही नही है और जो रास्ता है वो कच्चे से भी बुरा है । सडक बनाने के लिये रोडी जो डाली जाती है बस वही पडी हुई है और उस पर बाइक उछलती रहती है । उससे बचने के लिये बडी गाडियो ने बराबर में कच्चे में रास्ता बना रखा है पर उस रास्ते पर रेत की मात्रा ज्यादा है और बाइक के धंसने के आसार बने रहते हैं । कुल मिलाकर एक तरफ कुंआ और दूसरी तरफ खाई और उपर से चढाई । शी कार जाने के लिये सुमदो से लगातार चढाई 4800 मीटर उंचे पोलोकोंगका दर्रे तक चलती रहती है । चांग ला पर भी हमें बाइक से एक बार भी उतरना नही पडा था क्योंकि वहां पर कम से कम इतना बुरा रास्ता नही ​था । चढाई कितनी भी हो पर सडक उसे थोडा आसान कर देती है । यहां तो दर्रे से पहले एक बार मिश्रा जी को उतरना भी पडा और धक्का भी लगाना पडा रेत में धंसने के बाद । पूरी यात्रा में यही एक जगह थी जहां पर ऐसा हुआ । इस पूरे रास्ते में एक ही जगह ऐसी दिखी जहां पर आपात स्थिति में मदद मांगी जा सकती थी । ये दो चार घरो जैसी जगह थी और वहां पर एसटीडी का बोर्ड साफ लिखा नजर आ रहा था । हालांकि वो जगह इस रास्ते से हटकर थी । हमें दर्रे तक पूरे रास्ते कोई गाडी नही मिली । दर्रे के पार एक कार मिली बस और वो लेह मनाली रोड तक भी एकमात्र ही थी । दर्रे पर हम कुछ देर के लिये रूके । अभी समय ज्यादा नही हुआ था पर बावजूद उसके मौसम बहुत खराब हो रहा था । पीछे बादलो को आते देख लग रहा था कि कहीं हम फंस ना जायें ।

दर्रे पर मौसम से डर लग रहा था और दर्रे से जरा सा आगे चलते ही शी कार की घाटी दिखनी शुरू हो गयी और शी कार की झलक भी मिल गयी । पर जितना हमें झील नजदीक लग रही थी उतनी थी नही और उतरते उतरते काफी समय हो गया । झील ये भी काफी बडे क्षेत्र में है पर इसमें पानी कम था । हवा बहुत तेज चल रही थी और झील के आसपास कई सारे बवंडर बन रहे थे जो कि बहुत उंचे भी थे । झील के किनारे बहुत दूर थुक्जे गांव दिख रहा था पर वहां तक जाने के लिये अभी भी सडक वही रोडी वाली थी जिस पर चलते चलते हमारा शरीर ऐसा हो चुका था जैसे ​हमें आज बिजली के झटके दिये गये हों । मै फोटो ख्रींचने के लिये रूका तो मिश्रा जी ने तब तक फ्रूटी निकाल ली । बस उसके बाद तो यहीं पर बिस्कुट के साथ नाश्ता किया गया । खाने का तो पता ही नही था कि कहां पर मिलेगा इसलिये इसे ही खाना मानकर इतिश्री की गयी और आगे की ओर चल पडे । झील के किनारे उतरने के लिये और झील के पानी के पास जाने के लिये कुछ कच्ची पगडंडी बनी हुई थी जो एसयूवी टाइप गाडियो की बनायी हुई थी पर उस पर रेत इतना था कि हमारी बाइक का जाना संभव नही था । अगर उतराई में चले भी जाओ तो चढाई में तो पक्का फंस जाना था इसलिये हम चलते रहे । झील के पास और गांव से दो किलोमीटर पहले बढिया बनी सडक आ गयी और उसके बाद तो बाइक ने गति पकड ली ।


शी कार झील पर जो एकमात्र गांव है यहां पर मोनेस्ट्री भी है और साथ ही टैंट वाले होटल भी । होम स्टे की भी सुविधा है पर दो बजे दर्रे पर और तीन बजे यहां गांव में पहुंचने के बाद हमें आगे चलने की इच्छा थी इसलिये हम चलते गये । झील के एक किनारे पर पहाड और उस पहाड से लगा बसा गांव है । दर्रे से लेकर गांव तक सीधी सडक है और इस सडक पर खडे होकर जब आप झील की तरफ देखोगे तो झील के दूसरी तरफ जो उंचे पहाड खडे हैं समझ लीजिये उनके बिलकुल पीछे लेह मनाली रोड है । लेह की तरफ जाते हुए अगर शाम हो जाये तो दस बीस किलोमीटर की बढिया सडक को पार करके आप यहां शी कार आ सकते हो जहां बढिया रूकना खाना मिलेगा और आपके सफर में एक नगीना और बढ जायेगा । गांव पार करने के बाद उल्टे हाथ पर सामने दिख रहे पहाडो की ओर बिलकुल सीधा रास्ता गया है । दो पहाडो के बीच में से सडक है और जैसे ही हम उन दो पहाडो के बीच पहुंचे तो लेह मनाली रोड दिखनी शुरू हो गयी । फिर भी वहां तक पहुंचने में आठ दस किलोमीटर तो लग गये । यहां पर भी उल्टे हाथ को मुडना है और हम एक बेहतरीन हाइवे पर आ गये थे । यहां पर तम्बू में दुकाने थी एक दो जहां चाय और बोतलबंद पानी की भरमार थी । यहां का नाम ही डेबरिंग है । शी कार के पास गांव वालो ने इतनी लंबी सडक को चलने की बजाय अपना एक कच्चा रास्ता बना लिया है । मनाली रोड से पन्द्रह किलोमीटर चलने की बजाय चार किलोमीटर में ही आप शी कार पर पहुंच जाओगे । सडक बनाने वाले इंजीनियरो ने तो मानो सरकारी पैसा बर्बाद करने की ही ठान रखी है । यहां से मोरे प्लेन शुरू हो जाता है । मोरे प्लेन बहुत ही खूबसूरत जगह है और अक्सर पहली बार लेह आने वाले बंदे इसकी बहुत तारीफ करते हैं । लगता है कि हम किसी और ही दुनिया में आ गये हैं । दूर दूर तक खुला मैदान और उसमें बीचोबीच जाता हाईवे । मैदाने के दोनो तरफ बहुत दूर पहाड और उन पर लदी बर्फ । आसमान में उडते सफेद बादल , और क्या चाहिये फोटो खींचने के लिये । आपको मेहनत नही करनी पडती कैसा भी कैमरा हो अपना काम बखूबी कर देता है । यहीं आपको हाइवे के किनारे चलते हुए वो पहाड दिखते हैं जो शी कार की पहली झलक से दिखे थे और तब समझ आता है कि अगर इंजीनियर सडक को थुक्जे गांव की तरफ ना बनाकर यहीं से सीधी निकाल दें तो पांच किलोमीटर में ही शायद ये दर्रे से नीचे उतरती सडक में सीधी मिल जायेगी और इसके लिये यहां दो पहाडो के बीच में थोडी कम उंची जगह भी है जिसे काटा जा सकता है बडे आराम से । अब यहां तक आने के लिये कम से कम तीस किलोमीटर चलना पडा । शाम के चार बजे हम डेबरिंग में थे और सारचू यहां से 102 किेलोमीटर था और मोरे प्लेन की सडक देखकर ऐसा लग रहा था कि हम तीन घंटे में यानि सात बजे तक सारचू पहुंच जायेंगें जो कि अमूमन पहाडो का औसत समय होता है पर ऐसा नही हो सका । मोरे प्लेन में तो सडक बहुत बढिया थी पर जैसे ही मोरे प्लेन खत्म हुआ और नीचे गहराई में पांग दिखा वैसे ही बढिया सडक गायब हो गयी । हमें इस सडक पर ट्रक से लेकर बस तक हर चीज खूब मिल रही थी और कई दिनो का एकांतवास खत्म हो गया था और एक दुविधा भी कि रोहतांग पास खुला होगा या नही । मनाली की तरफ से आते ट्रक और टूरिस्ट गाडियां देखकर इसके बारे में पूछना ही बेकार था । पांग तक उतरती सडक काफी खराब स्थिति में थी । पांग कोई गांव नही बस आमी का कैम्प और ट्रक बसो आदि का रूकने का ठिकाना है पर यहां पर ढाबो के अलावा पंक्चर आदि की सुविधा मिल जाती है ।

Leh laddakh-



tso moriri
tso moriri
tso moriri and me
tso moriri and me
बादलो को छूने की एक कोशिश
शी मोरिरी का मनमोहक अंदाज
वापसी में शी क्यागर से पहले घास का एक मैदान
नटखट लददाखी बच्ची
मै सोचता था कि हमारे यहां पर ही बच्चे मिटटी खाते हैं
शी कार के लिये बजरी वाली सडक
रास्ते दोनो ही कच्चे हैं ये आपको तय करना है खराबतम कौन सा है
दर्रे पर मिश्रा जी
दर्रे के दूसरी ओर
शी कार दिखनी शुरू
बांये हाथ शी कार है यही नाश्ते की जगह है
ये बवंडर इस पूरी घाटी में थे
झील किनारे बसा गांव
सामने के पहाडो के पीछे लेह मनाली रोड है
लेह मनाली रोड के लिये इसी बीच से जाना है
ये आ गयी लेह मनाली रोड डेबरिंग पर बांयी ओर शी कार वाली सडक जिससे हम आये
मोरे प्लेन
मोरे प्लेन
मोरे प्लेन
पांग से बिलकुल पहले
पांग से बिलकुल पहले
नीचे पांग ही दिख रहा है

COMMENTS

BLOGGER: 2
  1. Great vews... what epic landscapes!

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  2. आपके यात्रा वृतांत को पढ़ते हुए आपसे और फ़ोटोज़ देख कर आपकी पोस्टों से । कमाल की यात्राएं हैं आपकी

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