Raja Bharthari temple , Rajasthan , राजा भर्तृहरि मंदिर अलवर राजस्थान

राजा भर्तृहरि का मंदिर , Bharthari temple ,योगी भर्तहरि नाथ मंदिर indok, राजस्थान एक राजा का मंदिर । ये शब्द सुनते ही सोचने पर मजबूर करता है पर राजा भ


औरत का प्रेम किसी को राजा बना देता है तो किसी को सन्यासी । औरत का धोखा किसी को मरवा देता है तो किसी को आत्महत्या करवा देता है । ईश्वर ने इस पृथ्वी पर औरत को बनाया तो उसमें इतनी कलायें दी कि शायद ईश्वर खुद भी नही जान पाया होगा कि उसमें कितनी कलायें हैं । वैसे तो औरतो के बारे में कितने ही किस्से चले आये हैं और आपने भी सुने होंगें पर आज मै आपको ऐसे ही एक किस्से के बारे में बताने वाला हूं ।

सरिस्का से निकलने के बाद हम आगे की ओर बढचले थे । सरिस्का से बाहर हमने वहां पर बैठै गाइडो से बात की और उनसे पूछा कि यहां पर आसपास में घूमने के लिये क्या जगहे है तो उन्होने बताय कि यहां से थोडी ही दूर पर राजा भर्तृहरि का मंदिर है उसे देखना जरूर ।
हम एक दो बार पूछने के बाद राजा भर्तृहरि के मंदिर में पहुंच गये । वैसे ये अलवर जा रही सडक से 5 किलोमीटर अलग हटकर है । यहां पर साल में एक बार काफी बडा मेला भरता है ।

राजा भर्तृहरि का मंदिर , Bharthari temple ,योगी भर्तहरि नाथ मंदिर indok, राजस्थान एक राजा का मंदिर । ये शब्द सुनते ही सोचने पर मजबूर करता है पर राजा भर्तृहरि का नाम आप ग्रामीण अंचल में किसी से भी सुन सकते हैं । इनके बारे में बहुत सारी कहानिया प्रचलित हैं । यही नही उत्तर भारत में तो कम से कम हर अंचल में गानो , सांग और रागनियो में राजा भर्तृहरि आम जनमानस के मन में बैठै हुए हैं । रागनियो में लोग एक ही कहानी और एक ही किस्से को अपने अपने शब्दो , स्वर में अलग अलग पिरोते हैं और ये हमेशा नया बना रहता है ।

राजा भर्तृहरि के बारे में प्रचलित कहानियो में से कम से कम एक सब जगह कामन कहानी है कि ये उज्जैन के राजा थे । उज्जैन के राजा रहते हुए इनकी दो रानियां भी थी उसके बाद भी इन्होने एक तीसरी रानी से शादी कर ली जो कि सुंदर और कम उम्र की थी । राजा अपनी इस रानी को सबसे ज्यादा प्रेम करता था और उस पर काफी मोहित था । वो उस रानी के प्रेम में इतना मोहित था कि राजपाठ के फर्ज को भी भूलने लगा था । एक बार उस राजा के महल में गुरू गोरखनाथ का आना हुआ । राजा के मस्तक पर रेखाओ को देखा तो गुरू गोरखनाथ समझ गये कि इन्हे बहुत बडा सन्यासी बनना है पर अभी तो ये वासना के जाल में फंसा हुआ है तो गुरू ने अपनी बहुत बढिया सेवा करने पर राजा को आर्शीवाद स्वरूप एक अमरफल दिया । गुरू गोरखनाथ ने इसके बारे में बताया कि अगर तुम ये फल खा लोगे तो अमर हो जाओगे ।

राजा भर्तृहरि के पास सब कुछ था और उसे लगता था कि उसे किसी चीज की आवश्यकता नही है पर वो अपनी छोटी रानी जिसका नाम पिंगला कहा जाता है उसको खोना नही चाहता था वो उसकी सुंदरता पर इतना मोहित था कि वो चाहता था कि उसकी रानी हमेशा ऐसे ही बनी रहे इसलिये उसने वो अमरफल अपनी रानी पिंगला को दे दिया ताकि वो उसे खाकर हमेशा ऐसे ही सुंदर और जवान रहे ।

रानी पिंगला राजा के सेनापति से प्रेम करती थी । वो राजा के प्रति समर्पित नही थी । राजा के सेनापति और रानी पिंगला में मुलाकात हुई और रानी पिंगला जो कि सेनापति के प्रति आसक्त थी उसने वो फल सेनापति को दे दिया ताकि वो हमेशा चिरयुवा रहे और उसके पास रहे । रानी को ये नही पता था कि वो सेनापति रानी के साथ साथ एक वेश्या के पास भी जाता था और असलियत में उसी से प्रेम करता था । सेनापति रानी के पास जाता जरूर था पर मन में आसक्ति उसकी वेश्या के प्रति थी तो उसने वो फल उस वेश्या को दे दिया कि वो उसे खा ले ताकि वो अमर हो जाये और हमेशा ऐसे ही सुंदर और जवान रहे ।

वेश्या ने उस फल को खाने से पहले सोचा कि अगर वो उस फल को खा लेगी तो हमेशा जवान रहेगी और हमेशा इसी नर्क में पडी रहेगी । इसलिये उसने सोचा कि इस फल को खाने का फायदा ऐसे व्यक्ति को है जो उसका सही हकदार हो और ऐसा व्यक्ति तो उनका राजा है जो न्यायप्रिय , जनता की भलाई चाहने वाला है तो वो अगर अमर होगा तो हमेशा इस राज्य की भलाई के लिये काम करता रहेगा । ये सोचकर वो राजा के पास गयी और अमरफल को उनके सामने प्रस्तुत किया । राजा उस फल को देखकर पहचान गया और अचंभित भी हुआ और क्रोधित भी कि उसे ये फल कैसे मिला । राजा के सामने धीरे धीरे सब राज खुल गया । सेनापति को देश निकाला दे दिया और राजा व्यथित हो गया । जिस रानी को वो इतना प्यार करता था उसी ने उसे धोखा दे दिया । बस इसके बाद राजा भर्तृहरि के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया और वे गुरू गोरखनाथ के शिष्य बनने के लिये गये । गुरू गोरखनाथ ने उन्हे शिष्य कैसे बनाया इसके बारे में भी किवदंतियां प्रचलित हैं जिनमें से एक ये है कि गुरू ने उन्हे पिंगला को माता मानकर​ भिक्षा मांगकर लाने को कहा । सांग और रागनियो में इसका बडा मार्मिक वर्णन है । आखिर राजा ने वो काम भी किया और उसके बाद वो गोरखनाथ के शिष्य बने । उन्होने वैराग्य पर तीन ग्रंथ लिखे और उनके काव्य को उच्च कोटि का माना जाता है । वैसे उनके काव्य और उनके जीवन समय पर मतभेद हैं कोई उन्हे राजा विक्रमादित्य के वंश से और उनका भाई भी बताता है ।
भरतरी का मेला कहां लगता है---
उज्जैन में उनकी वो गुफा भी है जहां पर उन्होने तपस्या की थी । कहते हैं उनकी तपस्या से इंद्र भी घबरा गया था । यहां राजस्थान में उनका मंदिर कैसे है इसका जवाब भी उनकी किवदंतियो में हैं जिसमें से एक है कि एक बार गोरखनाथ ने उनकी परीक्षा लेने के लिये उन्हे मरू​भूमि की यात्रा नंगे पैर करने को कहा । हो सकता है की उसी कारण यहां पर उनको पूजा जाता हो ।

खैर मंदिर काफी सुंदर बना हुआ है और सन्यासियो का भी यहां पर जमावडा है । पांडुपोल भरतरी , भर्तृहरि अलवर,bharthari mandir ,bharthari ki gufa in rajasthan ,bharthari mandir alwar rajasthan, सब इसी जगह के प्रचलित नाम हैं 

Thar and alwar-


राजा भर्तृहरि मंदिर
राजा भर्तृहरि मंदिर
राजा भर्तृहरि मंदिर
राजा भर्तृहरि मंदिर
राजा भर्तृहरि मंदिर
रास्ते में राजस्थानी महिलायें
रास्ते में राजस्थानी महिलायें
राजस्थान की सडके
राजस्थान की सडके

COMMENTS

BLOGGER: 8
  1. बेहतरीन कहानी , बढ़िया लेख और फोटो तो एक नम्बर :)

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  2. Good day! I just want to offer you a big thumbs up for the excellent info you have got right here on this post. I'll be returning to your website for more soon. gmail log in

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  3. Good day when I worship here

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