Pang-Sarchu-Lachungla-Nakeela-Baralachala

शाम के पांच बजे के करीब हम पांग में थे और पांग में सबसे पहले एक दुकान देखते ही उसी पर बाइक रोक ली । यहां पर एक लडकी पूछने के लिये आई तो उसे...


शाम के पांच बजे के करीब हम पांग में थे और पांग में सबसे पहले एक दुकान देखते ही उसी पर बाइक रोक ली । यहां पर एक लडकी पूछने के लिये आई तो उसे परांठो का आर्डर दे दिया और साथ में चाय भी । आज सुबह से सिवाय बिस्कुट और शीतल पेय के कुछ भी नही खाया पिया था । आलू के परांठे बनने में समय लगा तब तक उस होटल की मालकिन जो कि पहली आयी लडकी से दूसरी थी , से यहां पर रूकने के बारे में बात हुई । यहां पर टैंट लगे हुए थे और एक आदमी के रूकने का सौ रूपये चार्ज था । इतने सस्ते में बडे टैंट में रूकने की जगह मिलना कोई बुरा नही था इसलिये परांठे खाते खाते हमारा इरादा यहीं पर रूकने का हो गया । खाने के रेट भी ज्यादा नही थे और सबसे बडी बात टायलेट भी बना हुआ था । नेटवर्क नही था यहां पर और रोड पांग से चार​ किलोमीटर पहले से ही खराब मिलनी शुरू हो गयी थी और अभी पांग से आगे दो दर्रे आने थे । अब से एक घंटे में वे पार नही हो सकते थे और अंधेरे में पार करना जरूरी नही था । ​होटल मालकिन ने बताया कि यहीं आर्मी के कैम्प में फोन है जिस पर वे बात करवा देते हैं । इतना सुनते ही मिश्रा जी सालगिरह की बाते करने के लिये फोन देखने चले गये ।

मैने टैंट में सामान पटका और देखा कि यहीं बराबर में एक और छोटी सी दुकान है । ये दुकान भी इस दुकान मालकिन की मां की थी । उसी के बाहर जब हम यहां रूके तो एक साईकिल रूकी हुई थी । साईकिल पर उस समय सामान था पर जब परांठे खाने और सामान रखने के बाद मै वहां तक पहुंचा तो सामान साईकिल पर नही था । साईकिल वाले बंदे ने इस दुकान को रूकने के लिये चुन लिया था । ये साहसी साईकिल वाले राकेश कुमार थे जो कि गुडगांव में नौकरी करते हैं और इन्होने दिल्ली से कन्याकुमारी तक साईकिल चलाई थी इससे पहले । यहां ये अपने एक दोस्त के साथ आये थे लेकिन दोस्त हिम्मत छोड गया । अब यहां तक आते आते इनकी भी हिम्मत कम हो रही थी पर जब हमारी बाते हुई तो उसके बाद आगे तक की प्लानिंग बनने लगी । राकेश से बात करते करते काफी देर हो गयी और अंधेरा भी । मै वापस अपने टैंट की तरफ आया तो देखा कि मिश्रा जी आ चुके हैं और उनका मूड आफ है क्योंकि आर्मी वालो के यहां भी बात नही हो पायी ।

वैसे मजाक में ही कह रहा हूं पर कई बार मुझे बडा अजीब लगता है क्योंकि हमारी मैडम चिंता तो करती हैं पर कभी ऐसा नही लगा कि मुझे उन्हे फोन करना ही है । कई बार तो मै बता देता हूं कि चार दिन नेटवर्क नही रहेगा और बस फिर घूमता रहता हूं । हां नेटवर्क में आते ही सबसे पहली काल उन्ही की तरफ से आती है अक्सर और दो बात पूछते ही कि ठीक ठाक और वो खुद ही कह देती हैं कि बस पता चल गया अब घूम लो आराम से । इसका कारण ये भी हो सकता है कि एक तो वो खुद घूमी हैं मेरे साथ और दूसरा ये कि हमारी शादी को 13 साल होने वाले हैं । उधर मिश्रा जी ने तो खाना भी खाने को मना कर दिया पता नही क्यों

मैने खाना खाया और इन होटल वालो को समझने की कोशिश की । इनके पास अपनी तीन गा​डियां हैं और ये लेह के रहने वाले हैं । साल के चार से पांच महीने के लिये यहां पर रोजगार करने आते हैं । होटल मालकिन की मां ने बताया था कि उसका आदमी फौज में था और फौज में रहते रहते ही उसने इस जगह का जुगाड अपने अफसरो से कहके करवा दिया था । आज 220 किलोमीटर चले कुल न्योमा से शी मोरिरी वहां से शी कार और वहां से पांग तक । रात में राजमा चावल खाकर मै भी सोने चला गया । यहां पर लाइट की सुविधा भी थी इसलिये कैमरा और फोन चार्जिंग पर लगा दिये । हालांकि लाइट की सुविधा हमारे टैंट में नही थी तो ये सब हमें होटल वालो के कमरे में लगाने पडे ।

सुबह 6 बजे उठे और आराम से फ्रेश आदि होकर नाश्ता वगैरा करके 7 बजे यहां से निकल लिये । होटल मालकिन के पास डीजल और पैट्रोल भी उपलब्ध था तो कई लोग जो कि कारू से टांडी के बीच में कोई पम्प ना होने की वजह से शंका में रहते हैं उन लोगो को यहां पर डीजल और पैट्रोल भरवाते देखा । अब यहां से हमें सारचू तक पहुंचना था पहले और सारचू तक जाने के लिये पहले लाचुंगला को पार करना था । पांग से नदी किनारे चढाई शुरू हुई और उस चढाई के लिये रोड बिलकुल खत्म थी । एक संकरी सी घाटी और बराबर की नदी में तो कई जगह बर्फ की मोटी परत थी जिसमें से किनारे की बर्फ टूट रही थी धीरे धीरे । जैसे तैसे करके लाचुंगला पर पहुचे और यहां पर फोटो लिये । लाचुंगला के दूसरी तरफ नीचे घाटी में कुछ टैंट आदि दिख रहे थे । ये व्हिस्की नाला जगह है और यहां तक लगातार उतराई है । लाचुंग ला से व्हिस्की नाले के उपर जाता घुमावदार रास्ता भी दिखता है और उसकी चोटी पर ही नकीला दर्रा है ।

व्हिस्की नाले पर भी कुछ दुकाने थी जिनमें खाने के सामान से लेकर रूकने का भी इंतजाम था । नकीला तक फिर से लगातार चढाई चढनी पडी । नकीला दर्रे पर कुछ फोटो लिये और उसके बाद फिर से उतराई शुरू हुई । अब प्रसिद्ध गाटा लूप आ गये थे जहां पर हमें मनाली की साइड से आते हुए बाइकर के ग्रुप भी मिलने लगे थे । ये लोग कल सारचू या उससे पहले कहीं रूके होंगें । हमें भी सारचू 15 किलोमीटर पहले से दिख गया था । गाटा लूप से उतरकर एक खुली घाटी में आते हैं । इस घाटी में हम बांये हाथ पर जिस सडक पर चल रहे हैं उसी के दाहिने हाथ नदी है और नदी के उस पार सारचू लेकिन रूकिये ये इतना आसान नही है । नदी का पाट यहां पर काफी चौडा है और उस पार जाने के लिये नदी पर बने उस पुल से जाना है जो उस जगह बना है जहां पर नदी संकरी घाटी में है । उसके बाद फिर से सारचू की तरफ बस इसी में 15 किलोमीटर हो जाते हैं । साढे दस बजे हम सारचू पहुंच गये । गाटा लूप से लेकर सारचू तक बहुत ही उम्दा नजारो वाला इलाका है । सारचू में बहुत दुकाने हैं और सबमें खाने की सुविधा के साथ साथ रूकने के लिये बिस्तर लगे हुए हैं । यहां से हम हिमाचल में प्रवेश कर जायेंगें । यहां पर एक दुकान पर बाइक लगा दी और खाने का आर्डर दे दिया । 80 रूपये की थाली थी जिसमें राजमा चावल और रोटी थी । पति पत्नी दोनो इसे चला रहे थे । सारचू से निकले तो पहाड की साइड यानि बांयी साइड रोड के हर एक दो किलोमीटर पर टैंट ही टैंट । यहां तो नगर सा बसा हुआ था । हर सुख सुविधा के साथ यहां पर टैंट कालोनिया बसी थी । हम जहां पर रूके वो तो बस ट्रक या गरीब लोगो के ठिकाने हैं जहां पर सौ या दो सौ रूपये में रूकना मिल सकता है पर यहां तो प्राइवेट होटल जैसा नजारा है । कुछ दूर तक सडक सही रही और उसके बाद फिर से खराब मिलने लगी । साढे ग्यारह बजे हम किलिंग सराय पहुंचे । इस समय धूप निकली थी बडी तेज तो यहां पर रहने वाले बीआरओ के सभी वर्कर नहाने और कपडे धोने में लगे थे ।


मिश्रा जी ने यहां पर बिलकुल गोडे टेक दिये और बोले कि मै पहले कुछ देर आराम करूंगा उसके बाद चलेंगें । मिश्रा जी एक पत्थर पर लेट गये और मै भी बैठ गया । कुछ देर बाद मिश्रा जी ने चलने को कहा तो फिर से हम चल दिये । अब बारालाचाला की चढाई शुरू हो गयी थी । उससे पहले उपर से जो नदी आ रही थी वो बर्फ से काफी जगह जमी थी जो सुंदर नजारा दे रही थी । बारालाचाला से पहले रोड पर पानी आ रहा था इसलिये यहां पर बाइक के फिसलने की काफी दिक्कत हो रही थी पर यहां पर बीस फुट से उंची उंची बर्फ की दीवारे देखकर मिश्रा जी का मन मयूर नाच उठा । पहली बार वो अपनी सालगिरह को भूलकर नाचने लगे थे । बारालाचाला दर्रे तक हम पोन बजे पहुंच गये । बारालाचाला पर इतनी बर्फ थी कि किसी रोड पर मैने भी पहली बार इतनी बर्फ देखी थी । इस दर्रे पर चढने से लेकर उतरने तक करीब बीस किलोमीटर से भी ज्यादा एरिया में बर्फ के अलावा उपर आसमान और बीच में केवल सडक दिख रही थी । इसकी वीडियो भी किसी को मोबाईल पर दिखा दी तो मुंह फटा रह जाता है ।

Leh laddakh-


पांग में रात के लिये टैंट
पांग वाला होटल अंदर से
पांग वाला होटल बाहर से
पांग से लाचुंगला की तरफ
पांग से लाचुंगला की तरफ
पांग से लाचुंगला की तरफ
पांग से लाचुंगला की तरफ
पांग से लाचुंगला की तरफ
पांग से लाचुंगला की तरफ
लाचुंग ला
नीचे टैंट वाली जगह व्हिस्की नाला और सामने नकीला को जाता रास्ता
नकीला पास
नकीला के सामने के पहाड
गाटा लूप्स
पदुम की ओर जाती नदी
सारचू की तरफ दिखता पहाड
बर्फ और बिना बर्फ के पहाड के बीच जो जगह है दांये उसी से होकर सारचू जाना है
यहीं कहीं सारचू दिख जायेगा आपको इसी घाटी में है
सारचू
सारचू
सारचू से आगे
किलिंग सराये , हम सामने की ओर से आये हैं
बारा ला चा ला दर्रे की तरफ
बारा ला चा ला दर्रे की तरफ
बारा ला चा ला दर्रे की तरफ
बारा ला चा ला दर्रे की तरफ
बारा ला चा ला दर्रे की तरफ
बारा ला चा ला दर्रे की तरफ

COMMENTS

BLOGGER: 3
  1. Thanks for taking me on such a beautiful virtual tour. I visited the place long back. Your post brought back pleasant memories

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  2. apna safar yaad gaya....kabhi na bhoolne wala...baralacha la ka video kahan hai?uska bhi link dijiye

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  3. apna safar yaad gaya....kabhi na bhoolne wala...baralacha la ka video kahan hai?uska bhi link dijiye

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