Chushul -Saga la -Loma

गांव के बाहर ही युद्ध स्मारक बना है जिसमें अंदर जाकर देखने वाला कुछ नही है बाहर से ही सब कुछ दिख जाता है । ये बात मैने इसलिये कही क्य...


गांव के बाहर ही युद्ध स्मारक बना है जिसमें अंदर जाकर देखने वाला कुछ नही है बाहर से ही सब कुछ दिख जाता है । ये बात मैने इसलिये कही क्योंकि स्मारक की चारदीवारी होकर उसके बाहर गेट लगा था जो कि बंद था । ये चुशुल मैमोरियल है । यहीं पर सीधे हाथ की साइड वाले पहाड पर बंकर बने हुए थे । चीन के साथ हुए युद्ध में ये बंकर काम आये होंगें पर आजकल बेकार पडे हुए हैं । चुशुल से बाहर निकलते ही वो खुला मैदान या घाटी जिसे चुशुल आने से पहले देखा था हमारे सामने थी और इसी पर हमें सीधे ही चलते जाना था । उल्टे हाथ पर नम भूमि दिख रही थी जिस पर हल्की हल्की हरियाली सी भी थी । दूसरी ओर अंत में पहाड था जिसके नीचे एक चौकी सी दिख रही थी । कैमरा में फुल जूम करके देखा लेकिन फोटो इसलिये नही आ पाया क्योंकि हवा बहुत तेज और ठंडी थी इसलिये जब जूम करता तो कैमरा स्थिर नही हो पा रहा था ।

सामने की ओर से एक बस आती दिखी पर वो बस भी आर्मी वालो की ही थी । आर्मी के ट्रक मिले जो हमें अकेले और बिना बुलेट के देखकर हैरान होते थे हालांकि कई आर्मी वाले हमारी तरफ को हाथ भी उठा देते और कई बार जब हम हाथ उठाते अभिवादन को तो बडे खुश होते । अब यहां से रेजांगला मैमोरियल आने वाला था जिसके लिये रास्ते भर बोर्ड लगे थे । सुबह 7 बजे चलकर हम साढे दस बजे चुशुल पहुंच चुके थे । साढे ग्यारह बजे रेजांगला मैमोरियल और साढे 12 बजे सागा ला पास पर ​थे । 2 बजे दिन में हम लोमा चेक पोस्ट पर थे । ये समय मै इसलिये बता रहा हूं आपको कि आपको दूरियो का अंदाजा थोडा समय के हिसाब से भी हो जाये । रेजांगला के लिये बोर्ड चुशुल से बाहर निकलने से लेकर मैमोरियल तक हर दो या तीन किलोमीटर पर लगे हैं पर उनमें से कई बोर्ड जिस जगह पर लगे हैं वहां पर अब रास्ता नही है । हो सकता है कि सर्दियो के छह महीने इस क्षेत्र में गाडियो का आवागमन ना के बराबर हुआ हो और उसके बाद वो रास्ता पत्थर आदि से भर गया तो बडी गाडियो ने नयी लीक बना दी क्योंकि आखिर में एक ही बात सत्य है कि यहां पर कोई रास्ता नही है । कई जगह कई लीक बनी दिखती हैं जो बाद में एक हो जाती हैं । रेजांगला का युद्ध इतिहास में काफी प्रसिद्ध है क्योंकि यहां पर 120 भारतीय सैनिको ने अपने से कई गुना चीनी सैनिको को धूल चटा दी थी । ऐसे बियाबान इलाके में एक अच्छा खासा मैमोरियल बना है और मुझे उम्मीद थी कि यहां पर कोई तो होगा क्योेंकि यहां पर पोस्ट की तरह से कमरा और शौचालय तक हैं पर यहां पर आदमी का साया तक नही दिखायी दिया ।

सच में ऐसे बियाबान में हमें अभी तक एक दो ट्रक ही मिले थे । हमने पेंगोंग से निकलते समय सोचा तो था कि कोई ना कोई बुलेट वाला हमें पीछे से आता मिल जायेगा पर हमारे पीछे से कोई आता हुआ दूर दूर तक नही दिख रहा था । रेजांगला से सीधे नाक की सीध में सागा ला पास दिख रहा था पर वहां तक जाने का रास्ता और भी कठिन था । एक जगह तो पहाड के नीचे एक पोस्ट जैसी जगह दिखी और वहां से धुंआ सा भी उठ रहा था । लगा कि वहां कोई होगा पर वहां तक जाने से पहले ही दो रास्ते हो गये । पोस्ट की तरफ जाने वाला रास्ता इतना बेकार था कि बाइक ने चढने से मना कर दिया । यहां पर टायरो के नीचे से मिटटी निकल जा रही थी इसलिये बाइक का पहिया स्लिप हो रहा था । हम नीचे वाले रास्ते को ही चल दिये क्योंकि हमें ये तो दिख रहा था कि उपर वाला रास्ता केवल पोस्ट तक गया है बाकी आगे पोस्ट से चलकर वो भी नीचे वाले में ही मिल रहा है । एक हसरत सी मन में रह गयी कि ऐसे बियाबान इलाके में कोई आदमी मिल जाये । अब यहां से सागा ला पास तक सीधी चढाई ही थी बस वो धीरे धीरे बढ रही थी । सागा ला पास करीब 4500 मीटर की उंचाई पर है और यहां तक आते आते बाइक की भी बढिया कसरत हो रही थी । हम लगातार सागा ला तक चलते रहे और पास पर आकर ही बाइक को रोका । पास पर आते ही मिश्रा जी तो पास के पास पडे पत्थरो पर लेट गये ।

यहां पर करीब एक किलोमीटर उपर एक सैन्य चौकी दिख रही थी । ये चौकी इतनी बढिया जगह थी कि वो यहां से चुशुल और मेरक से आगे जहां पेंगोेंग मुडती है उसकी उंचाई वाली जगह तक देख सकते हैं । पर वो हमारे से दूर थी और हम वहां पर नही जाना चाहते थे तभी एक लडका पल्सर 200 सीसी की बाइक लिये आया और उसके पीछे पीछे एक पिकअप गाडी भी आकर रूकी । बाइक और कार वाले दोनो ने रूककर पास पर लगी झंडियो की परिक्रमा की और जो झंडिया गिरी हुई थी उनको सही किया । बाइक वाले से हमने पूछा कि आगे कहां तक खराब रास्ता है तो उसने बताया कि सागा ला गांव है आगे उस गांव से पहले से ही सडक मिल जायेगी बढिया । अपने बारे में उसने बताया कि वो चुशुल में सप्लाई का सामान लेकर जा रहा है । मिश्रा जी दोबारा से बाइक पर बैठै और हम चल पडे इस उम्मीद में कि सुबह के सात बजे से हडिडया तोडने वाले सफर पर चल रहे हैं तो अब बढिया सडक आयेगी और वो आयी भी । आगे सागा ला गांव से पहले ही बढिया सडक शुरू हो गयी । गांव में हमने सोचा भी कि कोई दुकान मिले पर ऐसा कुछ नही दिखा । गांव के बाहर ही चेक पोस्ट थी जिस पर मौजूद सैन्यकर्मी ने हमारा परमिट चैक किया । उसके बाद तो बढिया सडक की वजह से स्पीड ब​ढ गयी । खुला मैदान दिख रहा था दूर दूर तक बिलकुल उसी तरह का नजारा था जैसा कि चुशुल से पहले दिखायी दिया था । फर्क इतना ही था कि यहां पर सीधे हाथ के कोने पर चुशुल की जगह लोमा था । हमें अपने सीधे हाथ पर चलते चलते लोमा मिलना था । उल्टे ​हाथ पर दूर तक पर्वत श्रंखला चली गयी थी और ठीक सामने कई किलोमीटर लम्बा खुला मैदान दिख रहा था जिसके अंतिम छोर पर एक पहाड था अकेला । उस पहाड के किनारे किनारे भी जाता रास्ता दिख रहा था और हां एक खास बात और कि इस मैदान में जगह जगह पशु और सफेद टैंट दिख रहे थे । ये सफेद टैंट उन लोगो के हैं जो अपनी भेडो को यहां पर चराने के लिये लाते हैं । इनकी खास बात मैने नोट ​की कि उनके सबके टैंट सफेद ही मिले मुझे । शायद ऐसा इसलिये होता होगा क्योंकि सफेद रंग के ये टैंट दिन में तो दूर से चमकते ही हैं साथ ही चांदनी रात में बहुत स्पष्ट दिखते होंगें ।

बाइक की स्पीड को लगाम अचानक से देनी पडी । ये क्या हम जिसे बेहतरीन काली सडक मान रहे थे वो अचानक से दस मीटर तक सफेद हो गयी थी । दस मीटर तक सफेद रेत ने सडक को ढक लिया था । बाइक इतनी दूर तक किसी भी स्पीड में नही चल सकती । दो तीन मीटर के बाद बाइक को पहले गियर में चलाना तो पडा ही साथ ​ही मिश्रा जी ने धक्का भी लगाया तब जाकर बाइक पार हो पायी । अब बैठने का नम्बर आया तो मिश्रा जी ने बाइक चलाने की जिद पकड ली । मैने उन्हे समझाया कि अभी चलने दो बहुत दूर जाना है पर वो नाराज हो गये । उनके अनुसार अब प्लेन आ चुका है और प्लेन में तो वो चलाना जानते ही हैं । वैसे ये प्लेन जगह समुद्र तल से करीब 4000 मीटर की उंचाई पर तो होगी ही जिस पर हर दो किलोमीटर के आसपास रेत आ रही थी इसी तरह की इसलिये अब मिश्रा जी का मन बाइक चलाने का था ।

बहुत बहस हुई और मैने मिश्रा जी को बाइक दे दी । एक रेत के टुकडे से वो मुश्किल से निकाल पाये तो मैने फिर से ले ली । बस अब मिश्रा जी भडक चुके थे पर मैने भी ठान लिया था कि समय बढता जा रहा है और हमें अभी हनले जाना है इसलिये बाइक मै ही चलाउंगा । दो बजे हम लोमा में थे जहां सिंधु नदी हमें बढिया स्वरूप में दिख रही थी । यहां पर चेकपोस्ट है और चेकपोस्ट पर हमें जो जवान मिला उससे हमारी थोडी देर बात हुई यहां पर हमसे एक गलती हो गयी । लोमा में हम जिस रास्ते से आये वो सीधा सिंधु के किनारे आगे जा रहा है और हनले के लिये उल्टे हाथ पर बने पुल से सिंधु को पार करना था । पुल पार करके भी दो रास्ते हैं एक सीधा और एक उल्टे हाथ की ओर । हमारे पास आफलाइन मैप था पर उस वक्त हमने उसे देखा भी नही और बाते करते करते जवान से पूछा कि हनले सीधे ही जाना है ना तो उसने बोला कि हां बांये मुड जाना । बस परमिट दिखाकर हम पुल पार करके बांये मुड गये और चलते गये ।


Leh laddakh-


chushul memorial
लददाखी गधे दिखते हुए
चीन सीमा की तरफ का नजारा
रोहित पोस्ट
रेजांगला मैमोरियल
लैंडस्केप तो यहीं गजब के हैं
ये जंगली गधे एक निश्चित दूरी पर ऐसे खडे हैं जैसे सेना की परेड में हों
सीधे हाथ की तरफ हल्की सी गहराई ही सागा ला पास है
सागा ला पास और लेटे  हुए मिश्रा जी
सागा ला से दूसरी तरफ देखने पर
मिश्रा जी याक का फोटो लेना चाहते थे यहां पर बहुत सारे थे
सामने वाले पहाड और सीधे हाथ वाले के बीच में लोमा है
बांये हाथ पर नजारा
इस पहाड के दांये हनले का रास्ता है और बांये दुंगती
ये लीजिये सिंधु आ गयी
लोमा चेक पोस्ट
हनले की तरफ का एक पहाड

COMMENTS

BLOGGER: 1
  1. बहुत ही सुन्दर यात्रा वृतांत और जीवंत चित्र ..
    आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं!

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