Namik la - Fatu la - Lamayru

पिछली पोस्ट में मैने आपको बताया था कि कई बार शब्दो और फोटो में तालमेल नही हो पाता क्योंकि एक्सीडेंट होने के बाद जो मन में भावनायें थी औ...

पिछली पोस्ट में मैने आपको बताया था कि कई बार शब्दो और फोटो में तालमेल नही हो पाता क्योंकि एक्सीडेंट होने के बाद जो मन में भावनायें थी और जो लगातार तेजी से बदल रही थी उन्हे बताने के लिये बहुत शब्द चाहियेें जो दो पोस्ट में भी कम पड गये । इस बार भी बात पिछली पोस्ट से ही करते हैं ।

जब बारिश पडने लगी तो हम चम्बा मुबलेख में रूक गये । यहां पर भविष्य बुद्धा के नाम से मठ है । हमने यहां पर खाने का रैस्टोरेंट देखा तो खाना आर्डर कर दिया । अपना सामान भी हम बाइक से उतार लाये थे । जब हम खाने के इंतजार में बैठे थे तो वहां पर एक सज्जन खडे थे जो हमसे हमारे बारे में पूछने लगे । बाइक , चोट आदि के बारे में पूछने के बाद वे हमसे काफी खुल गये । मैने भी उनसे इस इलाके के बारे में बाते करनी शुरू कर दी । वे यहीं के निवासी थे और सरकारी टीचर थे । हमारे बारे में वे जान ही गये थे इसलिये उन्होने सैलरी आदि से लेकर काफी बाते की । उनकी बेटी का दाखिला उन्होने शिमला के प्रसिद्ध बोर्डिंग स्कूल में कराया है जिसकी फीस 4 लाख रूपये साल है । इतनी फीस कैसे दे पाते हैं इस पर उन्होने बताया कि उनकी पत्नी भी सरकारी टीचर है और उन्हे लददाखी होने की वजह से छूट भी मिली है अन्यथा फीस दस लाख रूपये सालाना है । यहीं पर उन्होने रैस्टोरैट खोला हुआ है और रूकने के लिये कमरे भी बनाये हुए हैं जो कि 500 रूपये तक में वो दे देते हैं ।

वो हमसे बात करते रहे और इसी बीच हम खाना खाने लगे । मिश्रा जी ने एक सब्जी को लेकर शक जताया कि ये बासी है कल की बनी हुई । इस पर मालिक ने रसोईया से पूछा तो उसने बताया कि ताजी ही बनायी है । मुझे ऐसा कुछ महसूस नही हुआ पर मैने फिर भी हंसते हुए एक बात बोल दी कि यहां पर इतनी सर्दी है और हमारे घरो में भी हम सर्दियो में कई बार एक समय की बनी हुई सब्जी अगले समय खा लेते हैं । मेरा इस बात को बोलने का आशय ये था कि सर्दी में अक्सर चीजे खराब नही होती और हममें से कोई ही ऐसा होगा जिसने सर्दियो में सब्जी पिछले समय की रखी ना खायी हो कभी । ऐसे में इतनी ठंड में मुझे नही लगता कि सब्जी खराब रही होगी पर मिश्रा जी ने उस बात को मन में बिठा लिया या फिर मुझे लगता है कि चोट लगने से उत्पन्न चि​डचिडापन उन पर हावी हो रहा था क्योंकि उनके मन में विचार बहुत तेजी से चल रहे थे । कभी वो घूूमना जारी रखने के बारे में सोच रहे थे तो कभी सालगिरह मनाने के बारे में


कभी वो बाइक चलाने के लिये मचल जाते तो कभी कुछ और । चोट तो मेरे भी लगी थी और सबसे बडी दिक्कत ये थी कि जिस सीधे पैर में चोट लगी थी उसी से मुझे बार बार किक मारनी पडती थी । दूसरी दिक्कत ये थी कि टैंक बैग मेरी जांघ से बार बार टकराता था । ये तब तक तो महसूस नही हुआ जब तक नार्मल थे पर अब उसी जगह चोट थी और उसी जगह पर बैग् का कोना बार बार लगना मुझे दिक्कत कर रहा था इसलिये मेरा दिमाग खुद परेशान था पर मिश्रा जी ने मुझे चलते चलते ही गुस्से में कहना शुरू कर दिया कि मै उनकी कोई बात नही समझ रहा हूं और रैस्टोरैंट वाले के सामने मुझे उनकी बात का समर्थन करना चाहिये था । मैने उन्हे समझाने की कोशिश भी की कि मैने उनकी बात को काटा नही बल्कि अपनी बात कही पर मिश्रा जी इस बात को मुझे इस तरह समझा रहे थे कि मैने ऐसा कहकर दूसरो के सामने खुद को नीचा दिखाया है कि दिल्ली वाले तो सर्दियो में एक आध टाइम की रखी सब्जी भी खा लेते हैं ।

हालांकि रैस्टोरैंट वाले ने सब्जी दूसरी लाकर दे दी थी तुरंत तो इन सब बातो का कोई फायदा नही था पर फिर भी हम नमिक ला तक बहस करते हुए ही गये । नमिक ला पर फोटो खिंचवाने के नाम पर ये बहस शांत हुई । नमिक ला तक सडक बढिया बनी हुई थी और अब इसके बाद हमें फोटू ला को पार करना था । नमिक ला जहां 12000 फीट के आसपास है वहीं फोटू ला साढे तेरह हजार फीट पर है । यही नही फोटू ला श्रीनगर और लेह रोड का सबसे उंचा स्थान है और फोटू ला पर लगे बोर्ड पर सरकार ने भी इसे फोटू ला टाप लिखा है जबकि दर्रे , पास , जोत , ला और टाप अलग अलग जगहो पर एक ही चीज के लिये इस्तेमाल किये जाते हैं । इन सबमें विवादित शब्द टाप को कहा जा सकता है क्योंकि टाप का मतलब उंचा होता है जबकि दर्रे अक्सर सबसे उंचाई पर नही होते बल्कि दो पहाडो या चोटियो के बीच की वो जगह होते हैं जहां कम उंचाई होती है और वहां से पार करना उन पहाडो को सुविधाजनक होता है । कई जगह रोहतांग ​के रास्ते में भी मील के पत्थरो पर रोहतांग टाप लिखा गया है तो इसका मतलब रोहतांग सबसे उंचा है ऐसा नही है बल्कि ये भी लोकल भाषा या बोली में बोला जाने वाला शब्द ही है ।


नमिक ला से नीचे उतरना हुआ और उसके बाद एक सुंदर जगह आती है शायद उसका नाम बौदखरबू है । यहां पर एक मोनेस्ट्री भी है और यहां की बसावट बिलकुल पेटिंग जैसी है । मुलबेख में हमें फिर से बुलेट ग्रुप ने पार किया था जब हम खाना खा रहे थे । नमिक ला के बाद फोटू ला में हमने फिर से उन्हे पकड लिया था । पास या दर्रे तो बहुत होते हैं पर उनमें से खूबसूरत कुछ ही होते हैं । फोटू ला भी उनमें से एक है । धीरे धीरे फिर से चढाई शुरू होती है और बढिया सडक पर जो नजारे मिलते हैं उनमें पहाडो का रंग मुख्य है । ये वो धरती है जहां पर पहाडो का रंग पल पल बदलता है । लामायरू इस मामले में ज्यादा प्रसिद्ध है और वो फोटू ला के बाद ही है तो यहां पर उसका असर आना लाजिमी भी है । इसके अलावा पानी और मिटटी के क्षरण से जो प्राकृतिक संरचनाऐं यहां पहाड पर बनी दिखती हैं उनका कोई कलाकार भी मुकाबला नही कर सकता है ।

फोटू ला पर कुछ अन्य बाइकरो से बात हुई जिनमें दिल्ली बाइकर क्लब के सदस्य भी थे । यहां पर फोटो खिंचवाने के बाद फिर से उतराई शुरू हो गयी और एकदम से हेयरपिन बैंड की तरह की सडके आ गयी । लामायरू तक उतराई ही उतराई थी और पहाडो के अलग अलग रंग और उपर से धूप और छाया का खेल नजारो को रोमांचक बना रहा था । बारिश दोबारा से आने लगी थी सो मैने बाइक की स्पीड बढा दी थी । पीछे मिश्रा जी कह रहे कि आराम से चलिये । मैने थोडा तेज चलाकर लामायरू में रूकने के लिये जगह देखनी शुरू कर दी और एक रैस्टोरैंट हमें मुफीद लगा जहां पर हमने बाइक लगाकर अपना सामान अंदर रख लिया ।

यहां चाय का आर्डर दे दिया गया और उसके साथ ही पकौडियो का भी । रैस्टोरैंट थोडा क्लासी था तो महंगा होना ही था चाय और पकौडी दोनो को पर जब तक हमने चाय पी और प​कौडियां खायी तब तक बारिश फिर से थम गयी थी ।2 बजकर 40 मिनट पर नमिक ला पार किया और 4 बजे फोटू ला पर थे । 5 बजे हमें बारिश की वजह से लामायरू में रूकना पडा । बुलेट वाले अभी नही रूके और सीधे निकल गये थे । वे पूरे इंतजाम से थे । हमारे पास भी पन्नी वगैरा थी पर कपडे इतने बढिया नही थे कि लगातार बारिश में एक या दो घंटे तक चल सकें । पकौडी खाकर मजा आ गया और इसी बीच एक बंदा वहां पर आया । वैसे तो 7 बजे के बाद भी उजाला रहता है पर 5 बजे ही बारिश और मौसम खराब के कारण अंधेरा सा होने लगा था । उस बंदे का गेस्ट हाउस था लामायरू में और जब मैने उससे पूछा तो उसने कहा कि 500 रूपये में कमरा हो जायेगा । मेरा मन बना कि आज यहीं रूक लेते हैं पर मैने मिश्रा जी से पूछना सही समझा । मैने उन्हे बताया कि अभी आधा रास्ता बाकी है और पांच घंटे में हमने ये तय किया है तो इस हिसाब से हो सकता है कि हम लेह तक रात के दस बजे पहुंचे तो कहीं रूकना ठीक होगा अगर तुम कहो तो यहीं पर रूक जायें । मिश्रा जी का सपाट जवाब था कि चलते हैं । मैने बहस करना ठीक नही समझा क्योंकि अभी तो बहस हुई थी इसलिये बोला कि चलो और मिश्रा जी बैग् उठाकर चल दिये ।

जब लामायरू से आगे निकल लिये तो मिश्रा जी ने कहा कि गेस्ट हाउस नही देखोगे तो मुझे अचरज हुआ । मुझे गुस्सा तो बहुत आया था जब मिश्रा जी ने कहा कि चलते हैं क्योंकि इससे आगे रूकने की जगह काफी दूर जाकर मिलनी ​थी कम से कम 50 किलोमीटर और । आज एक्सीडेंट के बाद हम 50 सांकू से कारगिल और 120 लामायरू तक चल चुके थे । मिश्रा जी की और मेरी दोबारा एक राउंड बहस के बाद ये निष्कर्ष निकला कि मिश्रा जी ने समझा कि मै गेस्ट हाउस चलने को बोल रहा हूं इसलिये उन्होने सामान उठाया और चल दिये और मैने सोचा कि मिश्रा जी रोज की तरह चलो और आगे देखते हैं ये बोल रहे हैं इसलिये मै चल दिया । बडा अजीब था पर मेरे लिये पहली बार नही था । अक्सर ऐसा होता है हमारा तो एक्सीडेंट हुआ था पर जिनका नही भी होता वहां भी आपस में ऐसा हो जाता है ।

पर इसका फायदा ही हुआ और हम आगे की ओर चलना शुरू हो गये । लामायरू पार करते ही पर्पल रंग के पहाड दिखते हैं और हम नदी के समकक्ष आ जाते हैं । नदी के साथ साथ सडक शाानदार बनी हुई है । लामायरू काफी प्रसिद्ध जगह है और लददाख के काफी सारे ट्रैक यहां से शुरू होते हैं । विदेशियो का तो ये रूकने का पसंदीदा ठिकाना हैयहां का बौद्ध मठ प्रसिद्ध है और देखने लायक है ।

Leh laddakh-


ये मुझे सबसे ज्यादा पसंद है
Gompa
फोटू ला से पहले
सामने फोटू ला है
फोटू ला तक पहुंचने में और नजारे आयेंगें
एक बार पीछे मुडकर देखा
Fotu LA
फोटू ला से नीचे उतरते ही
लामायरू में नाश्ता
लामायरू से श्रीनगर की ओर की दूरियां
लामायरू मठ
लामायरू मठ

COMMENTS

BLOGGER: 6
  1. बहुत बढ़ीया मनु भाई, कमाल का टूर......पंजाबी में एक कहावत है ” टूर विच माड़ा बेली, ते घर नेड़े चंदरा गवांड ना होवे ”

    लेकिन उम्मीद है प्रकाश मिश्रा जी आने वाले समय में ठीक हो गए होंगे

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    1. इसका हिंदी में अर्थ भी तो बता दो

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    2. इसका हिंदी में अर्थ है " यात्रा में घटिया मित्र और घर के पास घटिया पड़ोसी ना हो "

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    3. इसका हिंदी में अर्थ है " यात्रा में घटिया मित्र और घर के पास घटिया पड़ोसी ना हो "

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  2. यात्रा के साथ साथ बहस ।और फिर ये फोटो ने तो मन मोह लिया ।
    एक बात पूछना चाहता हूं कि इस खूब लद्दाख की हरियाली वाले जगह पर ठहरने की व्यवस्था तो होगी न।

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  3. लामायारू मठ तो बहुत शानदार लग रहा है !! शानदार नजारों की शानदार यात्रा

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