Barsu-Dayara -Dodital -Sangamchatti -8

शाम के 4 बजे के करीब जाकर हमें उस बर्फ से निजात मिली जिससे हम सुबह दस बजे से जूझ रहे थे । बर्फ तो बरनाला से सुबह 8 बजे चलने पर भी मिल रही थ...


शाम के 4 बजे के करीब जाकर हमें उस बर्फ से निजात मिली जिससे हम सुबह दस बजे से जूझ रहे थे । बर्फ तो बरनाला से सुबह 8 बजे चलने पर भी मिल रही थी पर दयारा के बाद तो हद ही हो गयी थी । बर्फ अभी एक किलोमीटर तक भी मिली पर हमें उससे बचने का रास्ता मिल गया था । अब तीखी ढालान थी और एक किलोमीटर चलने के बाद हमें एक झील मिली जिसका नाम पोर्टर्स ने सतगढ लेक बताया । मैने उनसे पूछा कि सतगढ तो अभी काफी दूर है तो इस झील का नाम सतगढ क्यों​ तो उन्होने कोई जवाब नही दिया बोले जी यही नाम से बुलाते हैं इसे । झील तक भी बर्फ थी । झील पर नेटवर्क आता है आईडिया का और यहां पर बैठकर ​हम तीनो ने आराम से अपने अपने घर पर बात की । यहां के बाद फिर नेटवर्क कल तक नही मिलना था इसलिये घर पर बता दिया । यहां से सतगढ एक के बाद एक धार पर उतरते जाने के बाद मिलना है ।

दो घंटे तक हम लगातार तीखी ढालान उतरते रहे और उसके बाद एक नाला मिला उपर से ही आता हुआ । ये नाला जो कि सीधा उपर से आ रहा था तो काफी तेज पानी था और काफी ज्यादा बहाव में इस नाले को हमने पार किया और बैठ गये पांच मिनट के लिये । हमें दो घंटे हो गये थे चलते हुए और वीरेन्द्र से पूछा तो उसने बताया कि अभी एक घंटा और लगेगा । मेरे भी पैर में उतरने में दर्द होने लगा था और एकलव्य और मेरी चाल बराबर हो गयी थी । मिश्रा जी अपनी फुल रौ में थे और मैने मिश्रा जी को कहा कि वो जगमोहन के साथ आगे चले जायें और वहां जाकर टैंट लगालें और बाकी काम शुरू करें क्योंकि हमें उनके साथ चलने से देर हो जायेगी । इसी बीच जगमोहन से चर्चा हुई तो उसने पूछा कि आप कहां रूकना चाहते हो नदी पार करके या नदी से पहले की तरफ । एक बार को तो मांझी की भी बात हो रही थी । जगमोहन ने तो बोल दिया कि आप चलोगे तो हम भी मना नही करेंगें । अब लग रहा था कि हम 7 बजे तक सतगढ पहुंच पायेंगें तो उस समय अंधेरा हो चुका होगा । हम अब भी घने जंगल में उतर रहे थे और इसके बाद तीन किलोमीटर की तो कम से कम चढाई है कचेरू तक और उसके बाद दो किलोमीटर मांझी था ।
हमने आपसी समझ से सलाह करके मांझी या नदी के पार का इरादा त्याग दिया । आज हम सुबह से 19 किलोमीटर चल चुके थे और इससे ज्यादा चलने की कोई हमें आवश्यकता भी नही थी क्योकि जब दयारा से हमारा प्रोग्राम सबके साथ बन रहा था तो त्यागी जी ने तो कहा था कि उन्हे जल्दी घर जाना है पर एकलव्य मै और मिश्रा जी तो तीनो रविवार तक फ्री थे इसलिये हमने सतगढ में रूकने का ही फाइनल कर दिया ।

मिश्रा जी जगमोहन को लेकर चले गये और वीरेन्द्र हमारे साथ चलने लगा । सतगढ लेक से सतगढ तक तीन घंटे का सफर जंगल का है और ऐसे घने जंगल में दिन में भी दो आदमी तो साथ ही रहने चाहियें । ऐसे में दोनो पोर्टर साथ चलते थे और हम तीनो अक्सर थोडा आगे निकलते ही आवाज लगा लिया करते थे । सात बजे हम सतगढ पहुंचे । सतगढ कोई जगह नही है बस एक पडाव का नाम रख दिया है जो गूगल तो क्या कैसे भी ढूंढने पर नही मिलेगा । जहां पर देवकुंड से सीधा उतरकर नदी को पार करके उपर चढने का रास्ता है उसे ही आप सतगढ कह सकते हो । यहां पर कोई निशानदेही तो है नही । नदी के किनारे मिश्रा जी ने और जगमोहन ने टैंट लगा लिया था और लकडी लाकर आग भी जला दी थी । अंधेरे में नदी के उस जगह तक पहुंचने के लिये पहले एक बार फिर से नाले को पार करना था और उसके बाद नदी के किनारे एक सूखी सी जगह पर हमारा आज रात का रूकने का स्थान था । मै वैसे ऐसी जगह के पक्ष में नही हूं क्योंकि नदी में पानी का स्तर बढ सकता है या रात को बारिश होने पर वो उफान ले जाये तो । पर मैने अपने मन की ये बात किसी से नही कही । दोनो पोर्टर ने एक जगह तो बढिया वाली आग जलाई थी गर्माहट के लिये और दूसरी आग जलायी थी पास में ही एक छोटा सा चूल्हा बनाकर खाने के लिये ।

आज सुबह से दो बार मैगी ही खायी थी बस । इसके अलावा पेट में कुछ भी नही था । अभी भी खिचडी ही बननी थी और जब तक खिचडी बनी तब तक हमने अपने जूते निकालकर आग के पास रख दिये । मोजे और गीले दूसरे कपडे भी आग के पास रख दिये । आग काफी बडे बडे लक्कड से जला रखी थी तो ​थोडी ही देर में जगमोहन ने आवाज दी कि जूता जल गया । मैने दो फुट दूर अपना जूता रखा हुआ था पर आग की गर्मी से दो फुट दूर भी जूते का एडी वाला हिस्सा जल गया और उसकी अंदर की फोम दिखने लगी । मैने जल्दी से उठाया । शुक्र ये रहा कि बहुत जल्दी ध्यान दिया दूसरी और बैठे जगमोहन ने नही तो जूते थोडी देर में पूरे जल जाने थे और उसके बाद क्या होता किसी को नही पता था । टैंट हमारे पास तीन आदमियो का था और दयारा से चलने की जल्दी में इस बारे में सोचा ही नही गया कि हम पांच आदमी हैं और सामान भी बहुत है । यही नही अब जाकर देखा कि एक आलू और दो प्याज के अलावा सब्जी नही है । चायपत्ती तो पहले ही पता चल गया था कि हम भूल आये हैं तो खिचडी के साथ दो प्याज को छीलकर हमें वीरेन्द्र ने टैंट के अंदर ही परोस दिया । खाने के लिये डिस्पोजेबल प्लेट थी जो कि कम थी तो खाने के बाद उन्ही को धो लिया जाता था ।

मैने दोनो बंदो से पूछने से पहले टैंट की स्थिति देखी तो वहां पर पांच बंदे भी आ सकते थे । मैने जगमोहन को कहा तो उसने बोला कि हम बाहर सोयेंगें । यहां पर हम 2100 मीटर पर थे और 3500 से उतरकर आये थे । सिवाय दिन में गीले होने के और यहां पर ठंड का कुछ काम नही था । मैने कई बार रिक्वेस्ट की कि भाई अंदर ही सो जाओ पर वे नही माने । उनके पास अपने स्लीपिंग बैग और मैट्रस थे । उन्होने आग के पास ही अपना बिस्तर खुले में लगा लिया । नदी किनारा होने की वजह से मुझे थोडी ठंड की उम्मीद थी पर हमें टैंट में स्लीपिंग बैग भी आधा खोलकर सोना पडा । एक हलवा प्लेट जैसी डिस्पोजेबल प्लेट जो कि आपने पिछली पोस्ट में मैगी की देखी थी उसमें दो बार खिचडी खाकर हम सो गये । सुबह सवेरे मिश्रा जी ने सबको उठा दिया । रात को फोन पावर बैंक से चार्ज कर लिया था और मिश्रा जी सुबह सुबह उपर से आ रहे नाले में से बने छोटे से झरने में नहा आये । ठंड तो ज्यादा नही थी पानी तो बिलकुल बर्फ जैसा ही था और ऐसे में हमारी तो नहाने की ना थी । चाय तो बन ही नही सकती थी बस मैगी बनवा ली गयी और मैगी खाने के बाद पैकिंग होने लगी चलने के लिये । यहां नदी किनारे भी हर की दून की तरह वही चिडिया मिली जो कि हिमालयन ट्राउट नाम की मछली को नदी से गोता मारकर पकडती है । यहां उनकी बहुतायत थी और हमने उनके काफी शाट लिये ।

सारे काम निपटाते निपटाते हमें साढे सात बज गये और साढे सात बजे भी हमने मिश्रा जी और वीरेन्द्र को साइट पर छोड दिया कि वो पैकिंग करे और मिश्रा जी को लेकर आ जाये । मिश्रा जी के ना थकने और तेज चलने का ये तो फायदा था और सच कहूं तो हमारे तीनो के बीच में ऐसी टीम भावना सी बन गयी थी कि हमने कोई दिक्कत महसूस नही की इस पूरे सफर में वरना तो हो सकता था कि रात को दोनो लडते मुझसे कि कहां फंसा दिया था हमें ।

तीन किलोमीटर का सफर था लेकिन 2100 मीटर से 2750 मीटर की चढाई थी । सीधे चढते ही जाना था और पुराने समय का बना हुआ रास्ता अब ज्यादा इस्तेमाल ना हो पाने की वजह से जगह जगह से टूटा हुआ था और पेड गिरने से बंद भी हो चुका था कई जगह से । एक बार को तो जगमोहन ने कहा भी कि आप जो अपने मित्र बीनू के रिश्तेदार के बारे में बता रहे थे जो कि वन विभाग में हैं उनके पास हमारे साथ चलना और बताना कि ये रास्ता बंद हो चुका है कई जगह से इसे सही करा दें हमारे खच्चर नही जा सकते हैं । मैने उससे कहा कि हम फोन पर ही ये बात कर लेंगें । इस जंगल में लंगूरो , तितलियों , बिच्छू घास और बुरांश की बहुतायत है । लंगूरो ने एक बात का खतरा पैदा किया था कि वो बहुत उंचे उंचे पेडो के उपर कूद रहे थे और उनकी गिरायी हुई लकडियां सिर पर गिर जाये तो चोट भी लग सकती थी । तितलियां 99 प्रतिशत सफेद वाली थी और बिच्छू घास एक दो बार ना चाहते हुए भी छू गयी पर शुक्र है खुजली नही हुई क्योकि दूर से ही लगी थी । यहां पर पूरे जंगल में पत्ते बहुत पडे थे और इतने पत्तो में फिसलने का खतरा हो जाता है । इतना घना जंगल और उपर से खडी चढाई शुक्र है तीन किलोमीटर में 700 मीटर चढने पर भी किसी ने मुझे ये नही कहा कि दिक्कत हो गयी नही तो कुछ लोग तो 1000 मीटर की चढाई को दिन में चढने के लिये पर्याप्त बताते हैं । साढे नौ बजे यानि दो घंटे के बाद हम कचेरू में थे जो कि मांझी से दो किलोमीटर है और यहां से हमें बढिया तरीके से देवकुंड दिख रहा था सामने की ओर जिसे पार करके हम आये थे ।

Dayara dodital-


सतगढ लेक से पहले
सतगढ झील
सीधे तीव्र ढालान है
धार पर ही उतरते जाना है एक के बाद एक धार
नाले को पार करने से पहले
एकलव्य अंधेरे में एक बार फिर से नाला पार करते हुए
पहले हाथ सेकें जायें
सतगढ
खाने की तैयारी
देख लो यही है वो चिडिया
खडी चढाई 
बीच वाली चोटी देवकुंड है यहीं से आये हैं
रास्ते की हालत बुरी है
बिच्छू घास
कचेरू

COMMENTS

BLOGGER: 10
  1. भाई चलने से पहले ठीक से देखा नही क्या क्या ले जा रहे ओर क्या नही, सब्जी जो खरीदी थी वह दायरा से ही वापिस चली गई शायद तिवारी जी के साथ, बेचारे पोर्टर इतनी ठंड में बाहर सोए।

    वैसे हमे पढने में मजा आया।

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  2. रोमांचक और साहसिक यात्रा विवरण !

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  3. बहुत ही बढ़िया फोटोग्राफी मनु भाई
    ट्रैक पर खाने पीने के सामान की कमी से परेशानी तो हुई ही होगी
    इसलिए अबसे जब भी ट्रैक पर जाओ तो पुरे सामान के साथ जिससे की ट्रैक में कोई असुविधा न हो

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  4. बहुत ही बढ़िया फोटोग्राफी मनु भाई
    ट्रैक पर खाने पीने के सामान की कमी से परेशानी तो हुई ही होगी
    इसलिए अबसे जब भी ट्रैक पर जाओ तो पुरे सामान के साथ जिससे की ट्रैक में कोई असुविधा न हो

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  5. सब कुछ बहुत सुन्दर मनु भाई

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  6. सब कुछ बहुत सुन्दर मनु भाई

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  7. सब कुछ बहुत सुन्दर मनु भाई

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  8. बहुत सुन्दर

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  9. बढ़िया मनु भाई....मज़ा आ गया । रास्ता काठिन तो है पर सुन्दर भी है .....बहुत खूबसूरत फोटो हैं । काश हम भी आगे गए होते ।

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  10. वृतान्त बहुत सटीक अऊर उपयोगी ! चित्रों को देखकर मऩ लालायित हो जाता है ! बेहतरीन पोस्ट

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