Barsu-Dayara -Dodital -Sangamchatti -7

दिन के 12 बज चुके थे और हम दो किलोमीटर ही आ पाये थे दयारा से यहां तक । मैने अपने पोर्टर से पूछा कि हम कितने किलोमीटर आ गये तो वो हंस पडे । ...


दिन के 12 बज चुके थे और हम दो किलोमीटर ही आ पाये थे दयारा से यहां तक । मैने अपने पोर्टर से पूछा कि हम कितने किलोमीटर आ गये तो वो हंस पडे । कई बार पूछने पर उसने बताया कि अभी तो कुछ आये ही नही हो । मुझे उन लोगो की बाते याद आने लगी जिस जिस ने मुझे मना किया था । जब हम दयारा में बैठे हुए थे तो फारेस्ट आफिसर को हमने अपने प्रोग्राम के बारे में बताया कि हमें डोडीताल जाना है । दयारा से सतगढ 15 किलोमीटर है और सतगढ से डोडीताल 10 किलोमीटर यानि 25 किलोमीटर है तो उस वन विभाग के अधिकारी ने सबके सामने कहा कि आज तो सतगढ तक नही जा पाओगे पर चूंकि तुम्हारे साथ लोकल आदमी हैं इसलिये मुझे संतोष है और मै तुम्हे जाने दे रहा हूं ।

हमारे पोर्टर्स ने हमें कहा कि साब जी आप आज यहां पर रूको और हम आगे जाकर बर्फ में रास्ता बनाकर आते हैं और कल चलेंगें पर मैने उनकी भी नही मानी । अबसे पहले बर्फ पर तो यात्रा की थी पर जमी हुई बर्फ पर ही की थी और उसमें फिसलने के डर के अलावा कोई डर नही था । जमी हुई बर्फ में अगर आप स्टिक लिये हों और धीरे से पैर जमा कर चलो तो इतनी दिक्कत नही होती । 12 बजे जब मैने मैगी बनाने के लिये कहा तो मै तो पन्द्रह मिनट के लिये सो भी गया पर एकलव्य और पोर्टर काफी परेशान थे । उनका कहना था कि ​बर्फ ज्यादा है और वो पोर्टर्स आपस में बडबडा रहे थे । एक बंदा ही मस्त् था मिश्रा जी जो कि अपनी सेेल्फी और रिकार्डिंग में लगे थे बेपरवाह कि हमें लाइट भी नही मिलने वाली है औश्र ना कल से मिली है । मैगी खाने के बाद भी हमारा चलने के नाम का सिर कट रहा था और बार बार ये ही पूछ रहे थे पोर्टर्स से कि अभी कितनी दूर तक बर्फ मिलेगी । हालांकि ये भी सच था कि हमें पता था कि वो क्या इस रास्ते से इस बार गये हैं जो उन्हे पता होगा । पर वे भी हमें दिलासा देने के लिये कह रहे थे कि देवकुंड एक किलोमीटर है और उससे आगे एक या दो किलोमीटर तक बर्फ जरूर मिलेगी ।

मैने जगमोहन से पूछा कि ऐसे हालात क्यों​ हो रहे हैं कि हम बर्फ में धंस जाते हैं तो उसने बताया कि दो तीन दिन से धूप बहुत तेज है और अब दोपहर भी हो गयी है ऐसे में बर्फ मुलायम हो जाती है । ऐसी जगह पर सुबह सुबह चलना ठीक रहता है उस समय बर्फ जमी रहती है । अब चाहे हम टैंट लगा लें तब भी हमें चलना तो होगा ही चाहे आज चाहे कल ।

एक बजे हम फिर से चल पडे । जब कोई आपका उपहास उडाता है कोई आपको कमतर आंकता है तो आपका हौंसला लाख गुना बढ जाता है । मेरे कानो में उन सबकी बाते गूंज रही थी जो कहते थे कि एक दिन में तो सतगढ तक भी नही पहुंच पाओगे वो भी दयारा से और हम तो चले ही सुबह बरनाला से थे । इसलिये किसी ने इसके बाद चर्चा नही की और तेजी से चलना शुरू कर दिया पर यहां पर चलना अपने हाथ में नही था । सबसे बडी परेशानी थी कि एक पैर धंसने के बाद उसे निकालने से पहले दूसरा पैर धंस जाना । एक घंटे में जूते काफी सूख गये थे तेज धूप से और मोजे भी तो थोडा आराम लगा पर वो आराम दस मिनट बाद ही काफूर था क्योंकि दस मिनट बाद फिर से उसी बर्फ में धंसकर हम फिर से जूतो में पानी भर जाने से जूझ रहे थे । जिस जगह पर हमने मैगी बनायी थी वहां से देवकुंड एक किलोमीटर था और थोडी राहत की बात ये आयी कि अब बर्फ कम मिली क्योंकि देवकुंड तक चढाई भी थी और इस जगह पर बर्फ पडी ही कम थी । ये एक टाप पार करते ही दयारा आंखो से ओझल हो गया और उस पर्वतमाला की बस एक झलक ही दिख रही थी । एक फोटो लिया गया ताकि याद रहे और उसके बाद दूसरी ओर बंदरपूंछ के अलावा अन्य श्रंखलाऐं दिखने लगी थीे । हमारे पोर्टर्स रूके नही और आगे जाकर एक उंचे मिटटी के टीले पर बैठ गये जहां पर बर्फ नही थी । हमने उनके पास जाकर पूछा तो उन्होने बताया कि आइये आपको कुछ दिखाते हैं । ये जगह देवकुंड कहलाती है

यहां से तीन रास्ते अलग होते हैं । एक रास्ता है जो लम्बी धार या नीमधार कहलाता है और वो उपर धार धार होकर ही जाता है डोडीताल तक । उसमें से भी एक रास्ता सीधा डोडीताल जाता है जबकि एक मांझी में उतर जाता है और वहां से डोडीताल जा सकते हैं । दूसरा रास्ता है सूरू थाच वाला वो भी यहीं से अलग होता है और तीसरा रास्ता है सतगढ का जो कि हम जाने वाले थे । इस रास्ते में यहां से सीधे धार धार नीचे उतरना है और ये काफी कठिन चढाई तो है ही पर कठिन उतराई भी है । देवकुंड भी एक बुग्याल की तरह ही है और यहां पर पेड नही है । एक छोटा सा कुंड है जो कि इस समय जमा हुआ था । हम उसके पास तक तो गये पर दस ​फीट दूर से भी ज्यादा से हमने उसे देखा क्योंकि वहां तक जाने में भी पैर एक फुट धंस रहे थे और पता नही पानी कहां तक होता हो तो हमने काफी दूर से फोटो लिया । उसके बाद जगमोहन ने हमें दूर से मांझी दिखाया । मैने जूम से फोटो लिया जो इतना स्पष्ट तो नही था पर हां उसमें कुछ झौंपडियां दिख रही थी । वही मांझी है ।

मैने तो आज मांझी पहुंचने का ही लक्ष्य रखा था पर अब वो मुश्किल लग रहा था । हम दो बजे devkund पहुंचे जो कि फिर से एक घंटे में एक किलोमीटर ही चल पाये थे । हमें उतराई में भी पसीना आ रहा था जो कि कभी नही हुआ क्योंकि उतराई में ना तो सांस चढता है और ना पसीना ज्यादा आता है पर यहां तो बर्फ में से पैर खींचकर बाहर निकालने में बहुत ताकत लगानी पड रही थी । इसी वजह से समय लगता था और इसी वजह से श्रम भी ज्यादा हो रहा था ।

एक बात और बता दूं कि कई जगह यहां पर हम तीन फुट तक बर्फ में धंस गये और कई जगह फिसल गये । कुछ लोगो ने फोटोज देखकर कहा कि बर्फ इतनी नही थी । मै उन लोगो से कहना चाहता हूं कि भाई जब हम धंसते थे तो हमें ही नही पता होता था कि अभी नीचे बर्फ कितनी और है या हम कितना नीचे और ध्ंस सकते हैं । ये भी हो सकता है कि नीचे मिटटी आ जाने की वजह से और धंसना रूक जाता हो और ये भी हो सकता है कि नीचे पक्की बर्फ आ जाने की वजह से और नीचे ना धंस पाये हों । पर इसका हर जगह फोटो तो मै भी नही ले पाया । मै सबसे पीछे था इसलिये आगे निकलने वाले को निकलने देने के लिये मै रूक जाता था तो फोटो भी ले ​लेता था । एक फोटो जो मै यहां पर शेयर नही कर रहा क्योंकि मिश्रा जी ने मना किया है वो ये था कि मिश्रा जी इतने धंस गये थे कि वो निकल तो गये पर पैंट वहीं फंस गयी । जैसे तैसे पैंट को निकालकर वो निकले और उसके बाद आगे जाकर पैंट सुखायी तो नेकर में बैठे थे पोर्टर्स के पास कहने लगे ये फोटो मत लगाना । देवकुंड से अब हमें सीधी उतराई जो कि बहुत ही गहरी थी उतरनी थी । पहले यहां पर बनी दो झौंपडियो के बराबर में से जाना था और उसके बाद नीचे जो पानी जाने का रास्ता था वहां से होकर गुजरना था । झोंपडियो के बराबर से गुजरने पर भी वही हाल था और हमें ये समझ नही आ रहा था कि क्या कोई और रास्ता भी हो सकता है जो लम्बा भले हो पर बर्फ में से होकर ना जाये । झौंपडियो तक उतर गये तो उसके बाद बुरा सपना जैसे साकार हो गया । मुझे तो लग ही रहा था कि दो पहाडो के बीच की जगह अक्सर बरसाती पानी की जगह होती है और यहां तो पानी की आवाज भी आ रही थी । ऐसे में इस जगह पर को पोर्टर बहुत तेजी से पार करके आगे निकल गये । एक बार को तो गुस्सा भी आया कि कम से कम उनसे बात भी करना चाहते तो वे तो इतनी आगे निकल गये कि अब कुछ नही हो सकता ।

मै एकलव्य को नही छोड सकता था तो सबसे पीछे मै ही चल रहा था । एकलव्य की फिटनेस उतनी बढिया नही थी पर मानसिक रूप से जितना मजबूत वो है उतना कोई कोई होता है । बंदा कितना भी परेशान हुआ पर कहीं भी रूका नही एक मिनट से ज्यादा । फिर भी उसकी चाल धीमी थी और वो और मै सबसे लास्ट में जाते तो हमें सब आराम करते हुए मिलते और जैसे ही हम पहुंचते वो सब उठकर खडे होकर चल देते । हम फिर भी नही बैठते । कुछ तो लग रहा था कि नीचे कुछ बर्फ कम सी है । अब नीचे जंगल दिख रहा था और बर्फ से पीछा छूटने की उम्मीद भी बढ रही थी पर ये भी वहम ही साबित हुआ । जाते जाते बर्फ ने अपना रौद्र रूप दिखाया और चूंकि हम धार पर ही उतर रहे थे तो हर बार पहले से ज्यादा बडा गढढा बर्फ में हो गया । पर जैसे तैसे करके हम बर्फ से निकल गये और ये जब साफ हुआ जब दूर तक बर्फ तो दिखी पर बराबर में सूखी जमीन पर जाने का रास्ता भी खूब सारा दिख रहा था । लग रहा था जैसे सारे कष्ट दूर हो गये हों । अभी तक सुबह से सिवाय दो मैगी के किसी ने कुछ भी नही खाया था और ना किसी के मन में खाने की बात थी । बस किसी तरह​ यहां से निकलना था और वो अब पास लग रहा था ।


Dayara dodital-




पेडो के बीच पतली सी धार ही रास्ता है
देवकुंड पर पहुंच गये और सामने का नजारा
देवकुंड से लास्ट सीन दयारा का पीछे वाला टाप दयारा है
देवकुंड
और यहां सामने से आये हैं हम
बंदरपूंछ के सामने हमारे पोर्टर
देवकुंड पर हम सब
देवकुंड
नया जोखिम नयी परीक्षा
दूसरी झोंपडी से बिलकुल बराबर से नीचे जाना है
यहां से आये हैं उपर से
नरक के गढढे
पैर बचायें या हाथ या पूरा शरीर
मिश्रा जी  ने अलग चलना चाहा तो यहां पर फंस गये थे
कोई खास बर्फ थोडे ही है ?
ये पानी का रास्ता होना चाहिये पर गाइड यहीं से लेकर गये
सामने पेड के नीचे मिश्रा जी सुखा रहे हैं । दूर से दिखा देता हूं
उपर से आये हैं सीधे हाथ को घूमकर
प्रकाश मिश्रा जी जूझते हुए
प्रकाश मिश्रा जी जूझते हुए
ये धार है आगे से एकदम नीचे को उतरेगी
गई भैंस बर्फ में
नीचे जंगल और सूखी मिटटी दिखनी शुरू हो गयी है

COMMENTS

BLOGGER: 12
  1. बर्फ में तो शरीर भी बोझ बन जाता है ।

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  2. ओ तेरी......इत्ती बर्फ ।
    मनु भाई मन बहुत था आपके साथ डोडीताल तक जाने का पर ऐसी कोई तैयारी नहीं थी पहले से जिससे इस रास्ते पर जाने का हौंसला ना कर पाये । अब अफ़सोस भी बहुत हो रहा है । साहसिक यात्रा...👍👍

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  3. भाई बहुत ही बढ़िया लेख
    एकलव्य भाई की हिम्मत है की वो चल पाये वरना चोट लगने पर चलने का मन नही करता और दूसरा अगर भरपेट भोजन न किया हो तो भी हिम्मत नही होती ट्रैक पर चलने की , बर्फ बहुत ही ज्यादा थी दायरा से मांझी ये तो आप लोग ही बता सकते हो क्योंकि आपने किया है
    आप तीनो को बहुत बधाई हो जो इतने बर्फ में यात्रा पूरी की

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  4. भाई बहुत ही बढ़िया लेख
    एकलव्य भाई की हिम्मत है की वो चल पाये वरना चोट लगने पर चलने का मन नही करता और दूसरा अगर भरपेट भोजन न किया हो तो भी हिम्मत नही होती ट्रैक पर चलने की , बर्फ बहुत ही ज्यादा थी दायरा से मांझी ये तो आप लोग ही बता सकते हो क्योंकि आपने किया है
    आप तीनो को बहुत बधाई हो जो इतने बर्फ में यात्रा पूरी की

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  5. अभी तक के सारे भाग एक साथ पढ़े,पल पल रोमांच बरकरार रहा। हम केवल आनंद ले सकते हैं पर आप पर जो बीती होगी वो आप ही समझ सकते हो। ये काम कोई कोई बिरला ही करता है।और वो बिरले आप लोग हो। मनु भाई एंड पार्टी जय हो।

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  6. Amazing pics. Thanks for sharing.

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  7. Nice discription of the journey. Photos are too good 👍

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  8. Nice discription of the journey. Photos are too good 👍

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  9. देख कर लग रहा है की बर्फ के सागर में घुम रहे हो, पार्टर आगे निकल जाते थे शायद इसलिए की उनका काम केवल रास्ता बनाना व बोझा उठाना ही था, अगर एक गाईड ले जाते तो वह जरूर आपके साथ रहता।
    अच्छा लगा पढकर व फोटो देखकर वाकई बहुत बर्फ थी।

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  10. जब कोई आपका उपहास उडाता है कोई आपको कमतर आंकता है तो आपका हौंसला लाख गुना बढ जाता है ! सही बात कही आपने मनु भाई ! मिश्रा की पास वाली फोटो बड़ी फेमस हुई थी ! नरक के गड्डे डराते तो हैं लेकिन उन्हें जिनके हौसलों में जान नहीं होती !!

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