Barsu-Dayara -Dodital -Sangamchatti -6

किसी भी यात्रा में अपने साथ अपने से ज्यादा उर्जावान साथी का होना हमेशा उत्साहजनक और फायदेमंद होता है । प्रकाश मिश्रा युवा तो हैं ही पर साथ ...


किसी भी यात्रा में अपने साथ अपने से ज्यादा उर्जावान साथी का होना हमेशा उत्साहजनक और फायदेमंद होता है । प्रकाश मिश्रा युवा तो हैं ही पर साथ ही जोश से भरे हुए भी हैं । कई बार ऐसा हुआ कि उनको कोई काम बता दिया गया भाग कर आगे जाने का या पीछे जाने का । यहां तक कि कई बार ऐसा भी होता है कि पानी ऐसी जगह पर होता है और आपको वहां जाने के लिये 200 या 400 मीटर चलना होता है और आप थके हुए होते हैं तब आपको सिर्फ पहाडी बंदा जो कि आपके साथ गाइड या पोर्टर होता है या फिर आपका ही कोई साथी जो कि प्रकाश मिश्रा की तरह उर्जावान हो वही आपकी मदद करता है ।

करना तो खुद भी पड जाये तो भी किया ही जायेगा पर मिश्रा जी की उर्जा देखकर उन्हे ही अक्सर कहा जाता था । जब दयारा बुग्याल तक पहुंचे तो दो फुट बर्फ मिलनी शुरू हो गयी थी । यहां से एक रास्ता बकरिया टाप के लिये जाता है । ब​करिया टाप पर कुछ लोग गये हुए थे और उनके पैरो के निशान साफ दिख रहे थे । हमारी इस ट्रैक पर चलने से पहले पोर्टर से जो बात हुई थी उसके अनुसार दयारा पार करने के बाद कम से कम दो किलोमीटर या उससे थोडा ज्यादा दूर तक बर्फ मिल सकती है इसलिये बर्फ मिलने का मन तो सैट था कि हां ​बर्फ में ही चलना है । दयारा में ही जूते धंसने लगे थे पर हाई एंकल का होने की वजह से इतना खतरा नही था । फिर भी संभल संभल कर चलना पड रहा था । दयारा से उल्टे हाथ की तरफ दिखने वाला टाप बकरिया टाप का रास्ता था जबकि सामने की ओर दिख रहा रास्ता डोडीताल वाले ट्रैक पर जाता है । इस समय बर्फ में केवल हमारे पोर्टर को ही पता था कि रास्ता कहां पर है । बर्फ का एक ये भी फायदा था कि अगर साथी आगे निकल जाये तो भी दिक्कत नही होती क्योंकि रास्ता साफ दिखता है ।

यहां दयारा में उंचे स्थान पर आने के बाद दो बाते हुई । एक तो हमें ये ध्यान आया कि हमारे पास पानी की बोतल कम हैं । सामान लेने में जल्दीबाजी में केवल एक लीटर की एक पानी की बोतल और एक बोतल 250 ग्राम वाली मिश्रा जी के पास थी । हम पांच आदमी थे और इतने में काम चलना मुश्किल था । उपर से एक बार पानी पीने को रूके तो एक लीटर पानी खत्म । यहां पर दूर दूर तक पानी का नामोनिशान नही था । तभी हमारे पोर्टर की नजर पडी नीचे गहराई में एक जगह बर्फ कम थी और वहां पर मिटटी का ​टीला था । उस टीले की ढांग से बर्फ पिघल कर रिस रही थी । उपर टाप तक भी पानी नही मिलना था तो हमारा पोर्टर वीरेन्द्र नीचे गया दोनो बोतलो को भरकर लाया । धूप बहुत तेज थी और ठंडी हवाऐं भी कम नही थी । मैने तो नीचे केवल हाफ बाजू की टीशर्ट पहनी थी और उपर विंडशीटर
मिश्रा जी ने भी हाफ बाजू की टीशर्ट पहनी थी और उपर से कुछ भी नही था । कुछ लोगो ने फोटो देखकर ये भी कहा कि वहां पर ठंड नही थी क्या । ठंड तो थी पर एक तो धूप बहुत तेज थी और दूसरी बात कि हम उंचाई की ओर बढ रहे थे । दयारा जहां 3100 मीटर के करीब है वहीं देवकुंड 3500 मीटर के लगभग और हमें तीन किलोमीटर के अंदर देवकुंड पहुंचना था । दयारा वाले पहले टाप को जैसे तैसे पार किया और टाप पर आकर हिमालय की चोटियो का बेहतरीन और खूबसूरत नजारा देखने को मिल रहा था ।

बुग्यालो को गर्मियो या बरसात में देखना भी सुखद अनुभव होता है लेकिन उस समय बुग्याल को भेड , भैंस और अन्य लोग भी इस्तेमाल कर रहे होते हैं । अभी जो दयारा बुग्याल पहले टाप से खडे होकर दिख रहा था वो बिलकुल अनछुआ था । यहां पर मनाली वाले पर्यटक आ जायें तो सारी की सारी बर्फ पर प्लास्टिक की बोतलें , चिप्स के पैकेट बिखरे पायें । फिर ये आपको सुंदर नही लगेगा । अभी की स्थिति में यहां दयारा के टाप पर खडे होकर सिर्फ दो लाइने पूरी बर्फ पर दिखती हैं । एक जिससे कि हम यहां तक आये हैं और वो हमने ही पहली बार बनायी है । दूसरी वो जिससे कुछ लोग ब​करिया टाप तक गये हैं । इसके अलावा भी एक दो लाइन और दिखती हैं वो जानवरो की हो सकती हैं । वो जानवर कोई भी हो सकते हैं । दयारा के टाप से सामने थोडा नीचे की ओर जाता रास्ता दिख रहा था और हमारे पोर्टर उधर को चले जा रहे थे ।

जितना आसान दिख रहा था उतना था नही और जैसे ही हम टाप से आगे चले तो ध्ंसने शुरू हो गये । दो फीट से ज्यादा पैर धंसने लगे थे । मेरा वजन 85 किलो है और मेरे पास 15 किलो का रकसैक बैग् भी था । एकलव्य का वजन भी कम नही है पर उसके पास बैग् नही था । दो सौ मीटर का एक पैच पार करने में हमें आधा घंटा लग गया और बीच में मौजूद एक मिटटी के टीले पर हमने अपने बैग् रख लिये । यहां पर बैठने की जगह थी और वीरेन्द्र यहां पर सुस्ता रहा था जबकि जगमोहन आगे दो सौ मीटर जाकर पत्थरो की एक नाली सी पर बैठ गया था । हमें भूख लगने लगी थी । सुबह एक मैगी खायी थी बस और बरनाला से 4 किलोमीटर से ज्यादा चढाई की थी और वो मैगी पेट में कहां गयी कुछ पता नही था । उसके बाद दयारा में भी हम लगातार चढाई ही करते आ रहे थे और एक किलोमीटर के करीब आ गये थे । हमने आवाज देकर जोर से जगमोहन को कहा कि मैगी बना लो पर उसने मना कर दिया । गुस्सा तो बहुत आया कि बात नही मान रहा है पर जब बर्फ के एक और पैच को पार करके हम उसके पास तक पहुंचे तो उसने बताया कि यहां पर ना तो लकडी है और ना ही कुछ और तो मै कैसे मैगी बना लूं । हमारे पास सिर्फ एक पतीला ही तो था । पानी फिर से खत्म हो गया था और अब सिवाय आगे चलने के कोई और चारा नही था ।

पहली बार ऐसा हुआ था कि मै अपने साथ बिस्कुट और चाकलेट नही लाया था क्योंकि हमने इतना सामान लिया था उत्तरकाशी से कि मुझे अलग से जरूरत महसूस नही हुई । ब्रैड और जैम , सोयाबीन , आलू , गोभी और पता नही क्या क्या । ठाठ तो सारे ही किये गये थे पर जब हम चले तो हमें ये ही पता था कि या तो दो बंदे हम ही जायेंगें या फिर सारे जायेंगें । यहां तो एक एकलव्य आ गया और बाकी तीन वहीं रह गये । समय कम होने की वजह से जल्दीबाजी में जो मिला उसे लेकर पोर्टर निकल पडे । अब हमारे सामने एक मोड था उस मोड पर जाते ही एक और टाप दिखा । वही टाप देवकुंड के पास है और वो यहां से करीब दो किलोमीटर होगा । वहां जाने के लिये कम से कम एक किलोमीटर तो बर्फ में चलना था । मैने बैग खंगाला तो मुझे घरवाली के रखे हुए आधा किलो चने मिल गये । मिश्रा जी ने अपने बैग से किसमिस निकाल कर दी । ये गुड का काम कर देगी और सबने चने अपनी जेब में रख लिये और खाते हुए चलने लगे । यहां से जो एक किलोमीटर का रास्ता था वो धार पर बना हुआ था और बर्फ में धार भी तीखी बनी हुई थी । केवल वीरेन्द्र और जगमोहन के चलने से ही पता चल रहा था कि यहां पर रास्ता भी हो सकता है ।

इस एक किलोमीटर के रास्ते को हमने एक घंटे में पार किया इससे आप सिर्फ अंदाजा लगा सकते हो कि कितना मुश्किल पैच था ये । वो भी तब जबकि यहां पर चढाई नही थी । यहां से एक किलोमीटर ढालान थी और उसके बाद देवकुंड तक एक किलोमीटर तक चढाई । मै साफ देख रहा था एकलव्य को तीन फीट तक बर्फ में धंसते हुए । मै उसके पीछे चल रहा था और सोच रहा था कि क्या करूं । एक तरीका तो ये था कि मै उसी गढढे में पैर रखूं जो कि एकलव्य के धंसने से बना है और दूसरा ये कि मै अलग नयी बर्फ पर रखूं । मैने अलग नयी बर्फ पर पैर रखना मुनासिब समझा और वो भी चढाई की तरफ । ढालान की तरफ अगर मै धंस जाउं तो फिर हजारो फीट गहरी खाई में गिरना ही है तो इसलिये सुरक्षा इसी में है कि मै चढाई की तरफ नयी बर्फ में पैर रखूं । पर ये फैसला गलत था । नयी बर्फ में पैर रखते ही वहां पर भी एकलव्य की तरह मै भी ध्ंस गया । एक पैर अगला धंसा है और दूसरा पैर रखा तो वो भी धंस गया । अब पैरो को निकालने में ऐसा लग रहा था जैसे आप दलदल में फंस गये हों । तुरंत ही जूतो में बर्फ चली गयी और यहां पर उसे रोकने का कोई रास्ता भी नही था । दस मिनट में ही वो बर्फ पैरो में पानी बनकर फच फच करने लगी । जूते उपर नीचे से गीले और पैंट या लोअर दो फीट नीचे से गीले हो गये थे । ढालान पर ही एक नाला आया और नाले को पार करने के लिये गोलाई जैसा बनाया जाता है । यहां पर मिश्रा जी जो कि ये मान रहे थे कि वो तो हल्के से हैं वो ढालान की तरफ पैर रख बैठे और फिर संभल नही पाये और नीचे की ओर फिसलते चले गये । शुक्र ये रहा कि यहां पर गहरी खायी नही थी बल्कि पानी जाने का रास्ता था । हम दोनो दूर थे और वहीं से चिल्लाये पर कुछ कर नही पाये । मिश्रा जी नीचे तक लुढक गये करीब दस से बारह फीट और उसके बाद वहां खडे होकर उन्होने उपर को देखा । सबकी जान में जान आयी और वो धीरे धीरे उपर को चढ आये । यही काम अगर इससे पहले वाले मोड पर हुआ होता तो यकीन मानिये पता नही कहां तक जाते वो ।

हमारे चलने से अक्सर बर्फ में पैर धंसते थे और जब पैर बाहर निकलता था तो उससे निकली बर्फ ढालान पर गोला सा बनकर नीचे लुढकती जाती थी । ये हमारे लिये साफ संकेत था कि संभलकर चलो वरना ऐसे ही लुढक जाओगे । अब कोई कुछ बोल नही रहा था आपस में सबका ध्यान सिर्फ नीचे की ओर था । एकलव्य भाई बीनू के लिये एक एक्सट्रा स्टिक लाये थे जो कि मिश्रा जी के काम आ गयी । यहां पर अक्सर पैर धंसने पर डर के मारे स्टिक का सहारा लेते तो तीन से चार फीट की वो स्टिक पूरी की पूरी बर्फ में धंस जाती । कई बार पैरो के निशान में पैर रखते तो वो और नही धंसता और कई बार उसमें पैर रखने पर कमर तक पैर चला जाता । कुछ समझ नही आ रहा था और एक घंटें में एक किलोमीटर पार करने के बाद ढालान खत्म हुआ और चढाई शुरू हो गयी । यहीं पर थोडी सूखी जगह थी और घास पत्ते और सूखी लकडियां भी थी । मैने मैगी बनाने को बोला और वहीं पत्थरो पर ही लेट गया । मुझे पता ही नही चला कि एक मिनट के अंदर ही मै खर्राटे भी लेने लगा । बाकी सबका हाल भी बुरा था और सबने अपने जूते खोलकर सुखाने को रख दिये थे । धूप इतनी तेज थी कि पन्द्रह मिनट मे मेरे पैरोे में पहने मोजे सूख गये थे । मुझे सोने के लिये हाथ मुंह पर रखना पडा और उसके बाद भी धूप चुभ रही थी ।

हमने मैगी खायी जिसमें नमक नही डला था और यहीं पता चला कि हमारे पास सूखा दूध तो है पर चाय पत्ती भूल गये हैं । यहां पर पीने का पानी बर्फ उबालकर बनाया क्योंकि आग तो हमारे पास थी ही । यहां से बोतल में भी भर लिया पानी आगे के लिये

Dayara dodital-


वापस दयारा की ओर देखते हुए
खूबसूरत हि​मालय
दयारा से अगला पैच यहां तक राहत थी
दयारा से दिखता एक दूसरा टाप
यहां मुश्किले बढनी शुरू हुई
सीधे हाथ पर जो टाप है वहीं पर जाना है । ये दयारा से लिया गया
एकलव्य और वीरेन्द्र
फोटो दिखा तो सकता है पर गहराई महसूस नही करा सकता
फिर भी जब सामने कुंआ या खाई हो तो क्या फर्क पडता है गिरना तो है ही
दूर से बडा प्यारा लगता है ये रास्ता
एकलव्य मेरा माडल है इस यात्रा में
असली हीरो हमारे पोर्टर
वीरेन्द्र पानी लेने जाता हुआ
हिमालय दर्शन
हिमालय दर्शन
श्रीकंठा और द्रौपदी का डांडा जैसी पर्वतमालाऐं सामने हैं
ऐसे मोड सबसे खतरनाक होते थे
आपको पता ही नही चलता कब आपका पैर नीचे चला जायेगा
सीधे सामने रास्ता जा रहा है
ये वाली ढालान खतरनाक है
ये सामने से मिश्रा जी लुढक गये थे
पैरो में बर्फ से मोजे गीले हो चुके हैं
यही जगह है यहीं पर मै सो गया
दुनिया का सबसे स्वादिष्ट खाना बिना नमक का भी

COMMENTS

BLOGGER: 6
  1. ज़बरदस्त....रोमांचक....साँसे रोक देने वाली.....आप त्रिमूर्ति के साहस एवं दृढ़ निश्चय का साक्षात्कार कराने वाली यात्रा ।
    बहुत खूब मनु भाई....👍👍👍

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  2. मनु भाई अगली बार मै भी आपके साथ रहूंगा।
    जब भी प्लान हो बताइएगा जरूर

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  3. मनु भाई अगली बार मै भी आपके साथ रहूंगा।
    जब भी प्लान हो बताइएगा जरूर

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  4. बेहद रोमांचक यात्रा।

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  5. मनु भाई मजा आ गया हिमालय देखकर ! द्रौपदी का डांडा देखकर लग रहा है जैसे आप एवेरेस्ट चढ़ गए हों ! सही कहा आपने ऊर्जावान साथी का होना उत्साहित करता रहता है !!

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  6. It's wonderful..photo dekh kar jane ka man huya lekin sab padhne ke bad pata chala itna asan nahi hai..thank you for the information :)

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