Barsu-Dayara -Dodital -Sangamchatti -3

बरसू गांव भटवारी से 12 किलोमीटर दूर है जो कि गंगोत्री वाली सडक पर है । यहीं से दयारा बुग्याल जाने का रास्ता है । वैसे दयारा बुग्याल जाने का...


बरसू गांव भटवारी से 12 किलोमीटर दूर है जो कि गंगोत्री वाली सडक पर है । यहीं से दयारा बुग्याल जाने का रास्ता है । वैसे दयारा बुग्याल जाने का एक रास्ता यहीं पास के गांव रैथल से भी है और वहां से भी पक्का ट्रैक बना हुआ है । कई लोग ऐसा भी करते हैं कि रैथल और बरसू में एक तरफ से आते हैं और दूसरी तरफ से निकलते हैं । इससे उन्हे उसी रास्ते से वापस नही जाना पडता ।


मै और डा0 प्रदीप त्यागी जी अपनी अपनी गाडी से थे और जब हम बरसू गांव में पहुंचे तो हमने सोचा कि गाडी कहां खडी की जायें । हमारे साथ जो पोर्टर थे उन्हे हमने त्यागी जी की गाडी में बिठा दिया था । उन्होने सुझाव दिया कि गाडी को गढवाल मंडल के होटल के मैदान में खडी कर दो पर हमने सोचा कि जब हम वहां पर रूक नही रहे तो वहां क्यों खडी करें । वैसे भी पहाड में आज तक मैने इतनी ईमानदारी देखी है कि आपकी गाडी खुली भी हो तो उसमें से कुछ भी सामान चोरी नही होगा इसलिये मैने यही सुझाव दिया कि गाडी को गांव में सही सी जगह पर कहीं भी खडी कर दो कुछ नही होगा । सामने ही काफी दिनो से बंद पडी दो दुकान दिख रही थी । ऐसा लग रहा था जैसे बरसो से नही खुली तो उन्ही के सामने खडी कर दी दोनो गाडी ।

अब आपको पोर्टर के बारे में बताता हूं । जब इस ट्रैक की तैयारी कर रहे थे तो मैने नेट पर काफी सर्च की और मुझे जैसा कि आपको पहले ही बताया कि ये किसी का ब्लाग लिखा नही मिला । जो मिला वो भी डोडीताल की तरफ से किया हुआ था । हिंदी में तो मतलब ही नही था । वहीं अगोडा के भारत लाज के मालिक और गाइड का काम करने वाले राजेश पंवार ने गाइड के रूप में ये ट्रैक किया था । मुझे उसका नम्बर मिला और मैने जानकारी लेने के लिये फोन किया । अगोडा गांव डोडीताल का बेस है और इस गांव में अकेला सर्व सुविधा सम्पन्न ये लाज है । राजेश पंवार ने मुझे काफी बढिया से जानकारी दी और जब मैने उससे इस ट्रिप पर चलने की बात की तो उसने बताया कि वो किसी और के साथ पहले से ही बुक है पर वो मेरे साथ आदमी भेज सकता है ।

मैने उससे पोर्टर करने के लिये बात की । मुझे ऐसा आदमी चाहिये था जो सामान उठाये और साथ ही रास्ता भी जानता हो । राजेश ने अपने एक गांव के बंदे जगमोहन का नम्बर दिया । मैने उससे बात की तो उसने बताया कि उसने पहले भी ये ट्रैक किया है और वो 700 रूपये रोज लेगा । मैने उसे 600 में मना लिया । मै और प्रकाश दो ही बंदे इस ट्रैक पर जाने वाले थे और हमें रास्ता बताने के लिये एक बंदा चाहिये था क्योंकि दयारा बुग्याल से आगे कोई रास्ता बना हुआ नही है और अब तो बर्फ है बिना बर्फ के भी यहां पर रास्ता भटक जाते हैं ।

हम दो बंदो को एक पोर्टर बहुत था पर फिर अमित भाई ने कहा कि दयारा तक जाने के लिये एक बंदा और भी चाहिये होगा तो मैने जगमोहन से कहा और उसने अपने ही गांव के एक और बंदे को तैयार कर लिया । अब दो पोर्टर हो गये थे और उन्हे हमने दस बजे तक उत्तरकाशी में मिलने को कह दिया था । वे दोनेा हमें 12 बजे उत्तराकाशी में मिले । ना तो अब से पहले मै राजेश से मिला था और ना इन दोनो से और सिर्फ फोन से ही ये सब काम हो गया । पहाड के लोग विश्वास करना जानते हैं । खैर होली का दिन होने की वजह से हम सब बहुत सशंकित थे कि शायद फोन करने के बाद भी ना मिल पायें और कहीं होली में पीकर टुन्न पडे हों तो हमारे टूर का क्या होगा ।

लेकिन उन्हे मिलना था और वो मिल गये । इसके बाद उत्तरकाशी से सामान दिलवाने में उन्होने अमित भाई की मदद की और अपने जानने वाली दुकान से सामान दिलवाया । ये अलग बात है कि उनके जानने वाले ने आधी चीजो में कमी की और कुछ चीजे रखी ही नही । महंगी दी वो अलग । यहां पर तिलक भाई की कमी बहुत खली वो अगर होते तो ये सब नही होता ।

जब घर से चल पडे तभी जाके फाइनल हुआ कि इस यात्रा पे कितने लोग जा रहे हैं । 7 पूर्ण् रूप से तैयार लोगो में से भी 6 रह गये तो ​अमित भाई ने कहा कि एक पोर्टर और चाहिये । एक बंदे को तो हम लेकर आगे निकल जाने वाले थे और एक बंदा उनके साथ रह जाना था । हम तीन लोग अपना स्लीपिंग बैग लेकर चले थे घर से । फिर भी 6 लोग और दो पोर्टर यानि 8 स्लीपिंग बैग् दो टैंट और कुकर , पतीला , डिस्पोजेबल बर्तन , दाल , चावल , मैगी 20 पैकेट , चायपत्ती , दूध , आलू , प्याज और पता नही क्या क्या सामान हो गया था जिसे पोर्टर को लेकर चलना था और दो लोगो के लिये ये सामान चढाई पर ज्यादा होने की उम्मीद थी ।

वैसे मै दो के ही पक्ष में था पर अमित भाई ने तीन बोला तो मुझे जगमोहन को फिर से फोन करना पडा कि क्या एक आदमी का इंतजाम और हो सकता है तो उसने हां तो कर दी पर ये नही बताया कि वो आदमी उसके गांव अगोडा से ही आयेगा जो कि उत्तरकाशी से 14 किलोमीटर दूर है और फिर वहां से वो बरसू आयेगा जो कि 40 किलोमीटर है । इसमें उसे समय लगना ही था क्योंकि वो बाइक या कार से तो आ नही रहा था । तो जब हमने बरसू में लाकर सामान उतारा तब तक वो बंदा मनेरी तक आया था । यानि उसे आने में हमें दो घंटे से भी ज्यादा लगने थे तो मैने उसे मना करने को बोला पर जगमोहन अड गया कि अब तो वो आ गया है घर से ऐसे में आप मना नही कर सकते । बहुत सोचकर एक हल निकाला कि खाने और स्लीपिंग बैग को लेकर एक आदमी हमारे साथ चले और दूसरा बंदा टैंट और बाकी सामान के साथ उसका यहां पर इंतजार करे और जब वो आ जाये तो दोनो सामान लेकर हमें उपर मिलें ।


यहां पर सामान की पैंकिंग हुई और हम सबने भी अपनी तैयारी कर ली । पहले तो बरसू तक ही पहुंचने का प्लान और यहीं पर रूकने की तैयारी थी पर अभी 4 बजे थे और समय देखकर सबका मन हुआ कि यहां से 4 किलोमीटर दूर बरनाला है जहां पर कैम्प साइट भी है तो वहीं पर रूकते हैं । तो हम एक बंदे को साथ लेकर सब निकल पडे । हम दो बंदो को छोडकर बाकी सब को दयारा बुग्याल तक ही जाना था इसलिये आज बरनाला करना और भी बढिया था । चार बजे से हमने ट्रैक शुरू कर दिया । गांव के गेट से लगी झील है और उसी के किनारे से होकर दयारा का रास्ता जाता है । सीधे उपर की दिशा में काफी दूर तो सीमेंटिड ट्रैक बना हुआ है और उसके बाद आगे जाकर पत्थरो से बना रास्ता मिलने लगता है लेकिन कहीं भी आप रास्ता भटक नही सकते । बस गांव से सौ मीटर उपर तक कुछ रास्ते निकलते हैं पर एक बार वहां से आगे निकलने के बाद एक ही रास्ता है जो कि बरनाला तक ना भटकने वाला है ।

जैसा कि मैने पहले ही बताया कि त्यागी जी और उनके मित्र कुलदीप त्यागी जी पहले तुंगनाथ तक जाने की सोच ही रहे थे और उसके लिये भी मुतमईन नही थे कि वो कर पायेंगें या नही और दयारा उनके लिये वहां से दुगुनी दूरी का था । वैसे भी डर एक बार लगता है पहाड पर थकान एक बार होती है । जैसे ही आप चढना शुरू करते हो ऐसा लगता है कि इतनी चढाई आप नही कर पाओगे और वापस चलो । ऐसा ही त्यागी जी के साथ हुआ और एकदम से जो उनकी सांस फूली तो वो गांव के पास ही बैठ गये और वो भी गांव की ओर को मुंह करके यानि ट्रैक से उल्टा । मै काफी दूर तक उन्हे उपर से देखता गया कि पर वो बैठे ही रहे । मुझे लगा कि वो ट्रैक नही कर पायेगें । वैसे भी दयारा बुग्याल के रास्ते में बरनाला तक ही ज्यादा कठिन है क्येांकि बारसू गांव करीब 2000 मीटर है और बरनाला 2800 के पास तो 4 किलोमीटर में 800 मीटर चढाई है यानि हर किलोमीटर में 200 मीटर तो आप समझ सकते हैं कि खडी चढाई है उपर से थोडी दूर चलने पर ही बर्फ मिलनी शुरू हो गयी थी और बर्फ पर चलना पड रहा था ।

एकलव्य के साथ भी ऐसा ही था । उसने भी काफी दिनो से कोई ट्रैक नही किया था और दो साल से ज्यादा समय से जब कोई ऐसा ना करे बल्कि मै तो भुक्त भोगी हूं कि अगर साल भर तक कोई ट्रैक ना करो या घूमने ना जाओ तो कई बार निगेटिव विचार आ जाते हैं और बंदा खुद निगेटिव हो जाये तो दूसरो को भी करने लगता है । सकारात्मक विचार अपने साथ सकारातमक बयार लाते हैं । यहां इस चढाई में एकलव्य भाई ने जो रेस पकडी है तो किसी के हाथ ही नही आये । ऐसा नही कि वो तेज चले पर वो कहीं रूके नही और अपनी धीमी चाल से चलते गये । मैने डाक्टर साहब को भी उनसे आगे निकलने से पहले बता दिया कि आप एक पैर जितनी दूरी पर ही पैर रखना और फिर देखना आप कैसे आराम से आ जाओगे । पता नही उन्होने माना या नही पर वो हमें दिखने बंद हो गये थे । हमें बस एक ही सुकून था कि वो बरसू जा सकते थे बडे आराम से जब चाहें और वहां पर रूक सकते थे । या फिर अगर वो आना चाहें तो अभी दो घंटे तक पोर्टर आयेंगे पीछे से जो उन्हे मिल जायेंगें ।

यहां बरनाला के रास्ते में घना जंगल ही जंगल है और सारा रास्ता ऐसा है कि आपको सिवाय जंगल के कुछ नही दिखता है । हर बार ऐसा लगता था कि उपर जो पेड दिख रहे हैं और उनसे जो उजाला आ रहा है वो शायद आखिरी टाप है और उजाला दिखने का मतलब है कि आगे बुग्याल है पर ऐसा नही होता था । हर बार एक टाप दिखने के बाद दूसरा टाप आ जाता था और फिर से वही जंगल का सफर । हमें रास्ते में भेड चराने वाले गुज्जर भी मिले जो अपनी भेडो को नीचे ला रहे थे । और बकरे की मां कब तक खैर मनाती तो आखिर एक टाप ऐसा आ ही गया जहां पर से प्लेन सा रास्ता आया और सामने झोंपडी दिखनी शुरू हो गयी । अब लगा कि वास्तव में बरनाला आ गया है वैसे ये भी बरनाला नही था बल्कि बरनाला में कैम्प साइट थी जहां पर गुज्जरो ने छानी बनायी हुई हैं । पर है बरनाला बुग्याल के पास ही और यहां पर मुझसे पहले मिश्रा जी , एकलव्य और अमित तिवारी जी पहुंच चुके थे । मेरी चाल हमेशा धीमी ही रहती है तो मै जब पहुंचा तो मिश्रा जी एक छानी में बैठे थे । हम भी वहीं पर बैठ गये । यहां पर तीन खच्चर वाले थे जो फौजियो के एक ग्रुप को उपर छोडकर आये थे और यहां पर रात को रूकेगें । थोडी ही देर में त्यागी जी और उनके मित्र भी आ गये और पोर्टर भी । त्यागी ​जी जिन्हे मै बडे आराम से बैठा देखकर आया था उनके और हमारे आने में ज्यादा अंतर नही था । मुझे तो उनके आने की उम्मीद नही लग रही थी । खैर सब आ गये तो रूकने की चर्चा हुई । ठंड ठीक ठाक थी तो खुले में टैंट लगाने की बजाय छानी के अंदर लगाने की सोची । यहां पर एक छानी मिली ठीक सी जिसकी थोडी सी सफाई करने के बाद उसमें दोनो टैंट लगा दिये गये और खाने की तैयारी शुरू कर दी गयी । आज खिचडी की दावत होने वाली थी । उससे पहले पैग लगाये गये ....................................पानी के और कुछ मत समझना

Dayara dodital-



हिमालय की बर्फ से लकदक चोटियां
हिमालय की बर्फ से लकदक चोटियां
हिमालय की बर्फ से लकदक चोटियां
हिमालय की बर्फ से लकदक चोटियां
पहाडो की गोद में बरसू
गांव से थोडा उपर से फिर ऐसे बना है रास्ता
बरनाला कैम्पसाइट और छानी
भागते भूत की लंगोटी ही हाथ आयी इतने लम्बे पेडो के बीच से
sunset at dayara
खच्चर वालो के साथ

अब मोबाईल से लिये गये फोटोज
night stay camp

COMMENTS

BLOGGER: 7
  1. गाड़ी की तरह ही लेखन की भी बढ़िया रफ़्तार है मनु भाई आपकी.... बाकी खिचड़ी से पहले पानी के पैग..😊😊 मज़ा आ गया । बहुत सुन्दर फोटोग्राफ हैं ।

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  2. जबरजस्त लेखनी😊 इसे तो कविता में लयब्दध भी ककिया जा सकता है।


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  3. aap itni jaldi post kese likh lethe hain , muzhe tho bada time lagtha hai :-)

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  4. वाह धड़ाधड़ पोस्ट आ रही है । भागते भूत की लंगोटी भी बढ़िया लग रही है ।

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  5. वाह धड़ाधड़ पोस्ट आ रही है । भागते भूत की लंगोटी भी बढ़िया लग रही है ।

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