Barsu-Dayara -Dodital -Sangamchatti -2

रिषीकेश से आगे चलने से पहले हमारे बीच यही चर्चा थी कि शायद रिषीकेश में सुबह 5 बजे से पहले यातायात को रोका जाता है और पुलिस चैकपोस्ट पर बैरि...


रिषीकेश से आगे चलने से पहले हमारे बीच यही चर्चा थी कि शायद रिषीकेश में सुबह 5 बजे से पहले यातायात को रोका जाता है और पुलिस चैकपोस्ट पर बैरियर लगाया जाता है और इसीलिये हमने सुबह रिषीकेश में मिलना तय किया था । हर की दून में हम 12 बजे चलकर सुबह 5 बजे ​देहरादून पहुंचे थे तो इस हिसाब से मै आज 12 बजे से चलकर चार बजे तक पहुंचने की सोच रहा था क्योंकि देहरादून मुरादनगर से 200 किलोमीटर के करीब है जबकि हरिद्धार 175 के करीब है । चूंकि मैने या किसी ने भी ब्रेक नही लिया इसलिये हम 3 बजे ही हरिद्धार पहुंच गये । यहां पर त्यागी जी से मिलने के बाद रिषीकेश से नरेन्दरनगर की ओर चले तो यही सोच रहे थे कि अगर चैकपोस्ट पर रोका गया तो थोडी देर गाडी में ही सो लेंगें ।

वैसे भी अमित तिवारी जी और एकलव्य भाई तो नींद खींच रहे थे । मुझे नींद गाडी चलाते समय बिलकुल नही आती और साइड में या पीछे बैठते ही तुरंत आने लगती है । हम चैकपोस्ट पर पहुंचे तो यहां पर पुलिस के एक सिपाही ने बस हमें देखकर बैरियर हटा दिया । अब हमें निश्चित रूप से समय का फायदा मिलने वाला था क्योंकि हम एक डेढ घंटा पहले चल रहे थे अपने समय से । सुबह का सूर्योदय होने लगा था और हम अब तक बढिया स्पीड से चले जा रहे थे । अमित भाई को बस में सफर करने का पूरा तजुर्बा है तो उन्होने यहां की गाडियो की श्रेणियां भी गिना दी । यहां उत्तराखंड में स्पीड पोस्ट , काशी विश्वनाथ और एक दो सेवा बसो की चलती हैं इन्ही में से एक के नाम पर हम काफी हंसे । एक बस सेवा को यहां पर भूख हडताल सेवा भी कहा जाता है । वो खाने चाय पानी के लिये नही रूकती है तो इसलिये उसे भूख हडताल कहा जाता है । वैसे रास्ते में हरिद्धार पहुंचने पर हरिद्धार का नजारा देखकर भी हम दंग थे कि कितना सुंदर सजाया गया है शहर को । एक बार को तो इरादा भी बना कि यहीं पर पहले फोटोग्राफी की शुरूआत कर लेते हैं पर अपने पहले लक्ष्य को देखते हुए हमारा जल्दी से जल्दी पहुंचना जरूरी था इसलिये और दूसरा कारण ये कि मेरे अलावा एकलव्य भाई का कैमरा बैग के अंदर दबा था इसलिये इस इरादे को त्याग दिया ।

गाडी के उपर जाल लगा ना होने के कारण पिछले दोनो बंदे काफी फिक्स होकर बैठे हुए थे । जैसे ही रिषीकेश में त्यागी जी मिले जो कि अपनी गाडी लिये हुए थे और दो ही बंदे थे पूरी गाडी में तो सबसे पहले दिमाग में यही बात आयी कि अपने बैग त्यागी जी की गाडी में रख देते हैं । बस फिर क्या था अपने सारे ही बैग् त्यागी जी की गाडी में रख दिये गये और तब जाकर ढंग से पिछली सीट पर दोनो बंदे बैठ पाये । रिषीकेश से 23 किलोमीटर चलकर ही हिंडोलाखाल के पास कुंजापुरी का रास्ता भी जाता है । यहां पर भी जाने की इच्छा थी जो जाते समय जल्दी की वजह से और आते समय थकान की वजह से इस बार पूरी नही हो पायी पर देखिये माता जल्दी ही बुलायेगी तो जायेंगें । चम्बा से आगे निकलने के बाद एक रास्ता टिहरी बांध की ओर चला जाता है । वैसे टिहरी बांध की झील का हल्का सा नजारा दिखता है । झील का पानी रूकता रूकता काफी दूर तक फैला हुआ है पहाडो में ।

यहां से आगे चलने के बाद धरासू से पहले एक जगह आती है वहां पर बहुत दूर तक का नजारा दिखता है साथ ही भागीरथी का पाट भी काफी फैेला हुआ है । सच पूछो तो यहां का नजारा देखकर स्पीती की याद आ जाती है । स्पीती भी बिलकुल ऐसा ही है जहां पर नदी का कटाव नदी के किनारो को सुंदर बना देता है । धरासू से आगे धरासू बैंड आता है जहां से एक रास्ता पुल के जरिये सीधे हाथ पर नदी को पार करके जा रहा है । हमें तो सीधे ही चलते रहना था और यहां के बाद चिन्यालीसौड पहुंच गये ।

अब तक मुझे काफी नींद आ रही थी और मैने पानी की बोतल लेकर मुंह धोया । रात को घर से परांठे लेकर चले थे पर किसी ने खाने के लिये कहा ही नही । बस रास्ते में प्रदीप जी ने संतरे खिला दिये उन्ही से मूड फ्रेश हो गया । जितना जल्दी हम हरिद्धार तक आये थे यानि की 175 किलोमीटर करीब 3 घंटे में उत्तरकाशी तक आने में उससे काफी ज्यादा समय लगा । एक तो रिषीकेश से उत्तरकाशी की दूरी होर्डिंग में करीब 165 किलोमीटर लिखी है जबकि हकीकत में मीटर में 195 किलोमीटर के करीब पडा । पहाडो में एक घंटे में बिना रूके भी 30 का औसत आ जाये तो बहुत समझना चाहिये । इस हिसाब से हमें 7 घंटे तो लगने ही थे और हम उससे भी थोडा ज्यादा यानि की करीब 12 बजे तक उत्तरकाशी पहुंचे ।

उत्तरकाशी में पहुंचने के बाद ही गाडी में मेरे तीनो साथी सोकर जागे नही तो पूरी लम्बी खींच रखी थी । अब यहां पर मेरी डयूटी समाप्त होनी थी थोडी देर के लिये और अमित भाई जो कि आगे का काम सम्भालने वाले थे उनकी शुरू होनी थी पर उससे पहले हमें थोडा फ्रेश होने की जरूरत महसूस हो रही थी । हमारे ग्रुप में बहुत ही बडे घुमककड और साहसिक कार्य करने वाले तिलक सोनी भी हैं जो कि काफी बडा नाम हैं इस क्षेत्र में । एकलव्य भाई ने उनको फोन किया कि वो कहां पर हैं । वैसे हमें पता था कि वो इस समय घूमने गये हैं मुनस्यारी की तरफ पर फिर भी पूछा तो उन्होने बताया कि वो मुनस्यारी में हैं पर आप अगर उत्तरकाशी पहुंच गये हों तो कमरे पर जाकर आराम करो । ग्रुप में बातचीत से उन्हे पता ही था कि हमारा कार्यक्रम बन रहा है । किसी जगह रूकना पैसे देकर अलग बात होती है और दोस्ती हो जाने के बाद वहां पर रूकने में झिझक होती है पर जब दोस्त ही झिझक दूर कर दे तो फिर कहने ही क्या । एकलव्य भाई ने जब उनका फोन मेरे हाथ में दिया तो पहली ही बार में मै सन्न रह गया । उनके जैसे बडे कद के व्यक्ति से इतनी प्यार भरे लहजे खास तौर पर हरियाणवी लहजे में बात होने के बाद मुझे विश्वास नही हो रहा था कि मै तिलक भाई से ही बात कर रहा हूं ।

तिलक सोनी आज उत्तराखंड में जाना माना नाम है । अखबारो में छपना उनका रोज का काम है । पहाडो से अपने प्यार के चलते वो उत्तरकाशी में ही रहने लगे हैं और यहां पर उन्होने कई ऐसे काम किये हैं जो हर किसी के बस के नही जैसे नेलांग वैल्ली को दुनिया के सामने रखना , सर्दियो में साहसिक बाइक यात्राऐं करना और करवाना , कालिंदी खाल जैसा ट्रैक जिसमें कई रात 6000 मीटर से उपर कैम्प करना होता है उसे वे हर साल करते हैं । और भी पता नही क्या क्या मै बता सकता हूं पर अभी इतना ही बता रहा हूं कि उन्होने सिर्फ इतने भर में हमारा दिल जीत लिया कि आप कमरे पर पहुंचो मै लडके को फोन कर रहा हूं और जो जरूरत हो सामान ले जाओ और कोई दिक्कत हो तो मुझे बता देना । हमने उनका कमरा या घर जिसे यहां उत्तरकाशी में ईगल नेस्ट के नाम से जाना जाता है उसे ढूंढने में थोडा समय लगाया जबकि हम सबसे पहले उसी के सामने आकर खडे हुए थे ।

एक बजे के पास हम तिलक भाई के कमरे पर थे और उनका कर्मचारी हमारे लिये चाय बना रहा था । मिश्रा जी नहाने चले गये और मैने और कुलदीप त्यागी जी ने एक कमरे में सोने की कोशिश करने लगे । अमित भाई , एकलव्य और प्रदीप त्यागी जी बाजार में सामान लेने चले गये । हमारे पोर्टर आ चुके थे जिनके बारे में मै बाद में बताउंगा । उन्होने बाजार से सामान बंधवाया और उसके बाद तिलक भाई के घर आकर उनके बंदे से स्लीपिंग बैग और दो टैंट के साथ साथ स्टोव , पतीला , कुकर आदि सब सामान जो कि हमें चाहिये थे निकलवा लिये । चूंकि अब घर जैसा अहसास हो रहा था तो सामान में कोई कंजूसी या सोचना नही किया बस निकलवा लिया और उनके पास हर सामान था । अब हम जल्दी से जल्दी निकलना चाहते थे क्योंकि हमें उत्तरकाशी में नही रूकना था और कम से कम बरसू में तो पहुंचना ही था । उत्तरकाशी से बरसू गांव 40 किलोमीटर दूर है और यहां तक पहुंचना गंगोत्री के रास्ते पर ही आगे चलकर होता है । फिर एक रास्ता गंगोत्री वाले रास्ते से मनेरी बांध से थोडा आगे चलकर बांये हाथ को ​कट जाता है और उपर की ओर चढता है । यहां से बरसू गांव दस किलोमीटर के करीब है । बरसू गांव बहुत ही सुंदर लोकेशन पर है पर उसके रास्ते में से ही हिमालय के कुछ पर्वतो के बहुत ही सुंदर दर्शन होते हैं जैसे द्रोपदी कां डांडा , श्रीकंठा आदि । तो रास्ते में भी हम दोनो गाडियो के लोग कम से कम दो बार रूके और फोटो सेशन किया । इस फोटो सेशन के बाद हम बरसू पहुंच गये और इस गांव की सुंदरता और लोकेशन देश अभिभूत थे । पहाडो की गोद में बसा ये गांव कुदरत का अनमोल तोहफा है ।

Dayara dodital-



तिलक भाई की चहेती
उत्तरकाशी से बरसू के रास्ते में
बरसू के रास्ते में दिखता हिमालय
और नीचे दिखती घाटी
ये बुरांश का सीजन है
और बुरांश इस समय अपने पूर्ण यौवन पर हैं
इसका जूस तो बनता ही है इसे सीधे भी खा सकते हैं
अमित और एकलव्य
दूसरी ओर का चित्र
लकदक बुरांश
दूर सामने की ओर धार पर बसा एक गांव
बरसू गांव और प्रवेश द्धार
ये भी मस्त फूल हैं नाम मुझे पता नही
एकलव्य की सहेली
मेहनती पहाडी महिला
बरसू गांव और इसमें बनी झील
बरसू गांव और इसमें बनी झील
बरसू गांव और इसमें बनी झील
बरसू गांव और इसमें बनी झील
सुंदर , नैसर्गिक सौंदर्य वाला बरसू गांव
सुंदर , नैसर्गिक सौंदर्य वाला बरसू गांव
ये गढवाल मंडल का होटल
अब मोबाईल के फोटोज
सामान तैयार है पैकिंग को
आसमान के अनेक रंग
सैल्फी
दो दीवाने शहर में

COMMENTS

BLOGGER: 7
  1. गाडी लगभग नॉन स्टॉप सी ही चलाई आपने, आगे की यात्रा बहुत जानदार होने वाली है,ऐसा आगाज से ही लग रहा है, इस यात्रा में कई धुरंधर हो है साथ।

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    1. हाँ सचिन जी नॉन स्टॉप ही चलाई गाड़ी मनु मास्टर हैं पहाड़ों पर गाड़ी चलाने के । एक सिर्फ एक जगह चाय पी ।

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  2. बढ़िया मनु भाई....उत्तरकाशी तो हमलोग 11 तक पहुँच गए थे बाकी ईगल नेस्ट तलाशने में एक घण्टा लग गया

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  3. एकलव्यx2 की सहेली भी बढ़िया है ! बाकी सब तो है ही !

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  4. enjoyed your post ! usually mein raat ko drive nahi kartha , subah 4 baze chal saktha hun....chasme ke karan problem hothi hai raat mein.

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  5. चलिए बरसु पहुँच गए ! मनु भाई कैमरा के कलर कुछ ज्यादा डार्क नहीं हैं ? इतनी देर गाडी चलाना भी मेहनत का काम है !!

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