madurai, meenakshi temple. मदुरै , मीनाक्षी मंदिर ,दक्षिण भारत

कहा जाता है कि जिस दिन इस शहर का नामकरण होना था उस दिन भगवान शिव के आर्शीवाद से यहां पर मधु (शहद ) की वर्षा हुई । इस शहर का नाम मधुरपुरी रख दिया गया । बाद में ये मदुरै हो गया । इस शहर में शुद्ध तमिल बोली जाती है । नालंदा की तरह तमिल भाषा सीखने के लिये यहां दूर दूर से छात्र आया करते थे । 2500 साल के इतिहास में यहां पर कई वंश के राजाओ ने शासन किया ।


मदुरै , दक्षिण भारत का मंदिरो के रूप में प्रसिद्ध शहर , खासतौर पर मीनाक्षी मंदिर के लिये , इस अकेले एक मंदिर ने इस शहर को विश्व के मानचित्र पर ला दिया है । हमने बचपन में अपनी पाठयपुस्तको में इसके बारे में पाठ पढा था । अब का तो पता नही कि है या नही पर जिस तरह कहते हैं कि सुबह सुबह याद किया हुआ भूलते नही उसी तरह उस पाठ को भी कभी नही भूल पाये । जब दक्षिण की यात्रा का कार्यक्रम बना तो मदुरै जाने के लिये बहुत मन था पर हमारे कार्यक्रम में ये ट्रेन के रास्ते में फिट नही हो रहा था इसलिये इसके बारे में यही तय किया गया कि इसे बाद में गाडी से करेंगे चाहे इसके लिये थोडा घूम फिरकर भी जाना पडे । वैगई नदी के किनारे पर बसा ये शहर सांस्कृतिक विरासत के मामले में काफी समृद्ध है ।


ये शहर प्राचीन काल से केन्द्र में रहा है । दक्षिण का इतिहास इसके बिना पूरा नही होता । पांडया राजाओ की तो ये राजधानी था । एक पांडया राजा ने एक मंदिर का निर्माण कराया और इसके चारो ओर कमल के पत्तो की तरह नगर का निर्माण कराया । कहा जाता है कि जिस दिन इस शहर का नामकरण होना था उस दिन भगवान शिव के आर्शीवाद से यहां पर मधु (शहद ) की वर्षा हुई । इस शहर का नाम मधुरपुरी रख दिया गया । बाद में ये मदुरै हो गया । इस शहर में शुद्ध तमिल बोली जाती है । नालंदा की तरह तमिल भाषा सीखने के लिये यहां दूर दूर से छात्र आया करते थे । 2500 साल के इतिहास में यहां पर कई वंश के राजाओ ने शासन किया । अंग्रेजो के राज में भी यहां पर काफी प्रगति हुई ।

मीनाक्षी मंदिर के अलावा भी यहां इस शहर में कई मंदिर हैं पर ज्यादातर पर्यटक यहां पर मीनाक्षी मंदिर देखने ही आते हैं । इस मंदिर को मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर या मीनाक्षी अम्मा मंदिर भी कहते हैं । वैसे मीनाक्षी देवी भगवान शिव की पत्नी पार्वती का ही रूप हैं और ये मंदिर देवी के इक्यावन शक्तिपीठो में से एक है । ये मंदिर प्रसिद्ध है अपने स्थापत्य कला के लिये । इस भव्य मंदिर की शैली विश्व में अनूठी है । इस मंदिर में 12 गोपुरम हैं जो कि काफी कारीगरी से बनाये गये हैं । इस कारीगरी मे शिल्प के अलावा चित्रकारी भी है और सुंदर रंगो का संयोजन है । पूरा मंदिर लगभग 45 एकड में बना है और इसका मुख्य मंदिर का निर्माण काफी बडा और उंचा है । उसकी लम्बाई 254 मी0 और चौडाई 237 मी0 है । इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि भगवान शिव यहां पर मीनाक्षीदेवी जो कि यहां के राजा के रूप में पार्वती का अवतार अवतरित हुई थी , से सुंदरेश्वर के रूप में विवाह रचाने आये थे । और इस विवाह के साक्षी बनने के लिये पूरी देव मंडली पृथ्वी पर आयी थी । स्वयं भगवान विष्णु ने मीनाक्षी देवी के भ्राता बनकर उनका पाणिग्रहण कराया था । इस क​था को दर्शाने के लिये यहां पर हर साल उत्सव भी होता है ।


 ऐसा भी कहा जाता है कि भगवान शिव की मूर्ति इन्द्र को मिली और उन्होने यहां पर मंदिर निर्माण कराया । एक और बात यहां मै बताना चाहूंगा कि मंदिर मे एक जगह देवी मीनाक्षी की एक प्र​तिमा लगी है जिसके तीन स्तन हैं । ऐसा क्यों है इसके बारे में वहां पर लिखा है कि राजा मलयध्वज ने जब काफी तपस्या की और विशेष यज्ञ कराया तो यज्ञ से 'अयोनिजा' यानि की तीन वर्ष की पुत्री पैदा हुई जिनके शारीरिक विकृति थी जो मैने उपर लिखी है । 'अयोनिजा ' का अर्थ है कि वे गर्भ से बाहर पैदा हुई थी । राजा ने अग्नि देव से पूछा कि मुझे पुत्र भी नही मिला और कन्या मिली तो ऐसी जिसके शारीरिक विकृति है । इस पर अग्नि देव ने उन्हे कहा कि जिस दिन ये अपने भावी पति से मिलेंगी उस दिन इनकी शारीरिक विकृति अपने आप दूर हो जायेगी तब तक आप इनका लालन पालन लडके की तरह करेा ।

ऐसा ही हुआ और सुंदर मछली से नैनो वाली इस लडकी का नाम मीनाक्षी रखा गया और राजा की मृत्यू के बाद इस लडकी यानि मीनाक्षी ने ही राज्य की बागडोर संभाली बाद में शिव से मिलते ही इनकी शारीरिक विकृति भी जाती रही । इस मूर्ति को परिसर में ही लगाया गया है और ये कौ​तुहूल का कारण बनी रहती है । मंदिर में भगवान शिव की मूर्ति भी है और नटराज के रूप में भी उनकी एक मूर्ति यहां पर है जो एकमात्र है जिसमें उनके पैर जो कि उपर उठा हुआ रहता है उसकी जगह दूसरा पैर उठा है जो कि आमतौर पर नही मिलता । मंदिर के अंदर हजारेा की संख्या में शिल्प हैं जिनमें खासतौर पर शिव से मीनाक्षी देवी के विवाह को दर्शाया गया है । ड्राइवर ने हमें मंदिर के ​दक्षिणी द्धार पर पार्किंग के पास छोड दिया । उसने पार्किंग दिखाकर कहा कि आप यहीं पर आ जाना दर्शन करके मै यहीं पर मिलूंगा । हम सबको मंदिर का मुख्य द्धार तो दूर से दिखायी दे ही रहा था सो हम लोग उधर ही चल दिये । मंदिर के आसपास बाजार ही बाजार था ।

मंदिर के द्धार के पास बने जूता स्टैंड में जूते उतारकर हम लोग द्धार में प्रवेश कर गये । जब हम मंदिर पहुंचे तो वहां पर मौजूद पुलिसकर्मी शोर मचा रहे थे कि जल्दी चलो नही तो दर्शन बंद हो जायेंगे शायद दोपहर में पूजा वगैरा के लिये बंद होते हों । पर एक बात अच्छी थी कि इस वक्त को लोकल के लोग ध्यान रखते होंगे शायद इस वजह से भीड नाममात्र को थी और हम लोग मंदिर में घुसते चले गये ।

कई जगह अन्य पुलिसवालो ने भी कहा कि आप मुख्य मंदिर के दर्शन कर लो बाद में बाकी मंदिर में आराम से घूम लेना । भागादौडी करते मुख्य मंदिर में पहुंचे और मीनाक्षी माता के दर्शन कियेबस उसके थोडी देर बाद ही मंदिर के कपाट बंद हो गये । बाकी मंदिर परिसर सारा खुला हुआ था । शिव भगवान की मूर्ति आदि पर कोई रोक नही थी दर्शनो की । जब तक हम मंदिर परिसर में रहे तब तक बस इधर उधर को सिर और आंखे घूमती रही क्योंकि जिधर देखो उधर देखने के लिये काफी कुछ था । यहां इस मंदिर को देखने के लिये वैसे तो पूरा दिन चाहिये पर हम घूमते घूमते एक घंटे बाद मंदिर के दूसरे परिसर में पहुंच गये जहां पर हजारो खम्बे बने हुऐ थे । वैसे इस मंडप में 985 खम्बे हैं पर इसे सहस्त्र मंडपम ही कहते हैं । इन खम्बो को किसी भी कोण से देखो तो ये सीधे दिखायी देते हैं बिलकुल ऐसे जैसे कि सुडोकू में किधर से भी जोडो नौ ही उत्तर आता है इसमें घूमने के लिये भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का 5 रू का टिकट लेना पडता है । मंदिर में कोई शुल्क नही है पर इस मंडप में है और सच पूछो तो इस मंडप का भी अपना एक अलग रूआब है । सारे खंभे लाइनो में हैं और हर खम्बे पर शिल्पकारी हो रही है । छतो पर सुंदर किनारी के डिजाइन जैसी कलाकृति हो रखी है । यहीं पर एक म्यूजियम भी हैं जिसमें मंदिर परिसर में से निकाली गयी या खंडित या फिर पायी गयी मूर्तिया देख सकते हैं । खम्बो वाले मंडप में सामने की ओर एक सुंदर मूर्ति रखी थी जो काफी सुंदर लग रही थी आप फोटो में भी देख सकते हैं । यहां मंडप के बाहर काफी बडा बाजार लगा है जो कि मंदिर परिसर में ही है जहां से आप चूडी , फोटो ,प्रसाद ,माला आदि खरीद सकते हैं । यहां पर हमारे साथ एक गलती हो गयी ।

असल में अंदर घूमते घूमते पता ही नही चला कि कब हम लोग दूसरे गेट के पास पहुंच गये जो कि हमें ऐसा ही लगा जैसे गेट से हम एंट्री करके आये थे तो हम तो उससे बाहर निकल गये । अब बाहर निकलकर अहसास हुआ कि यहां तो जूता स्टाल नही है तो ये वो गेट नही है । उसके बाद फोन पर लालाजी और मा0 जी से सम्पर्क किया तो उन्होने बताया कि वो तो बाहर निकल गये उसी गेट से । इस गेट से जहां से हम निकले थे कई लोगो से पूछा तो कोई भी हिंदी नही जानता था । तभी एक होटल का बोर्ड लगा देखा जिस पर राजस्थानी खाना लिखा था खाना तो हमें खाना ही था समय भी हो चला था तो हम उपर होटल में गये और होटल वाले से खाने का आर्डर दिया । साथ ही उस होटल वाले से अपने ड्राइवर की बात करायी क्योंकि ड्राइवर राजेश काफी कम हिंदी जानता था और बार बार एक ही बात कहकर फोन काट देता कि आप यहां पर ही आ जाओ वहां गाडी नही जायेगा । जब होटल वाले ने उससे पूछा कि क्यों नही आयेगी गाडी तब जाकर वो गाडी और गाडी में पहुंचे मा0 जी और लालाजी को लेकर आया । खाने का आर्डर हमने दे ही रखा था और यहां पर हमें तवे की रोटी मिल गयी । काफी बढिया खाना था और खाना खाने के बाद महिलाये नीचे उतरी तो यहां पर दक्षिण भारतीय साडियो की दुकान करने वाले दुकानदार ने उन्हे आवाज लगाकर बिठा लिया । उसके बाद क्या होना था कुछ जेब कटी और सबने एक एक दो दो साडी ली जो कि यहां की पहचान मानी जाती हैं यहां मिलने वाली साडी और सूट की खास बात ये थी कि ये चटख रंगो में थे । हमारे यहां सूती कपडे में जो साडी और सूट मिलते हैं वे अक्सर चटख रंगो में नही होते इसलिये महिलाये उन्हे लेने से कतराती हैं पर यहां देखकर लग ही नही रहा था कि ये कपडे पूरी तरह सूती हैं । खैर खाना खाकर और खरीददारी करके हम सब लोग वापस गये उसी पुराने गेट पर और वहां से हमने अपने जूते लिये और तब हम अपने अगले पडाव के लिये चले

COMMENTS

BLOGGER: 7
  1. Praveen Kumar GuptaNovember 9, 2012 at 4:23 AM

    मनु जी बहुत ही खूबसूरत और सूचनात्मक पोस्ट हैं...धन्यवाद बहुत बहुत.....वन्देमातरम...

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  2. bas yahi main bhi kehna chah raha tha,jaisa aapne likha hai,ki rasta galat ho gaya,to yahi mere saath bhi hua tha.main bhi mandir me ghumte hue galat raste se nikal gaya aur kaafi der hui sahi jagah pahunchne me. aapka lekh to khair kutchh kahna hi nahi,sidhe saral shabdo me live show.thakyou manu bhai.

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  3. सुन्दरम मनोहरम .छायांकन और इतिहास के झरोखे से आदि कथानक ,रुचिकर पोस्ट .

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  4. The Gopurams of this temple are very beautiful 

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  5. i read all story and seen all pic v good yaar
    i feal amazed..
    there no bdy know hindi language ..its v big challenged for u n me because i know only hindi language but some english...
    i want to go there ..i hope

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कहा जाता है कि जिस दिन इस शहर का नामकरण होना था उस दिन भगवान शिव के आर्शीवाद से यहां पर मधु (शहद ) की वर्षा हुई । इस शहर का नाम मधुरपुरी रख दिया गया । बाद में ये मदुरै हो गया । इस शहर में शुद्ध तमिल बोली जाती है । नालंदा की तरह तमिल भाषा सीखने के लिये यहां दूर दूर से छात्र आया करते थे । 2500 साल के इतिहास में यहां पर कई वंश के राजाओ ने शासन किया ।
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