बिन तेल ,बाती ,दिये के जले मां की ज्वाला

अब कहां चले इस पर विचार हुआ । जाट देवता का विचार था कि रास्ते में वैसे तो कांगडे वाली माता और ज्वाला माता का मंदिर पडेगा पर ज्वाला देवी होक...

अब कहां चले इस पर विचार हुआ । जाट देवता का विचार था कि रास्ते में वैसे तो कांगडे वाली माता और ज्वाला माता का मंदिर पडेगा पर ज्वाला देवी होकर चलते हैं । पर राजेश जी कह रहे थे कि सीधे चम्बा चलो तो चम्बा का ही प्रोग्राम बन गया । थोडी दूर चलने पर ही फोन आ गया महाराष्ट्र वालो का कि हम ज्वाला देवी पहुंच गये हैं । दरअसल जाट देवता ने उन्हे पहले ज्वाला देवी का प्रोग्राम ही बताया था तो वे तो हमसे आगे निकलकर सबसे पहले वहीं पर पहुंचे । अब साथियो के साथ तो जाना चाहिये इसलिये हम सब लोग भी ज्वाला देवी के लिये चल पडे । रास्ते में एक चौराहा आया जहां से ज्वाला देवी का मंदिर 10 किलोमीटर लिखा था । इसी चौराहे से कटकर हम ज्वाला देवी पहुंचे । ये रास्ता बडा चौडा है । वैसे तो पहाडियो के बीच है पर कम से कम फोर लेन जितना है । इस रास्ते से होकर हम लोग मंडी वाले हाइवे पर मिल गये जहां से मंदिर बस थोडी ही दूर है । जैसा कि आप सब जानते ही हैं कि भगवती सती के पिता दक्ष महाराज ने अपनी राजधानी में किसी समय एक महायज्ञ का आयोजन किया था जिसमें उन्होने सभी देवी देवताओ को आमंत्रित किया पर शिवजी से शत्रुता होने के कारण उनको आमंत्रित नही किया । उस समय सती अपने पिता दक्ष के न बुलाने और पति के विरोध करने पर भी अपने पिता के घर चली गयी । यज्ञ में अपने पति का उचित भाग ना देखकर सती ने इसे अपने पति का अपमान माना । पिता से अपमानित होने पर सती ने उसी यज्ञ कुंड में कूदकर अपनी जान दे दी । यज्ञाग्नि में भस्म होते ही सती के देह के आलोक से भय देने वाली ज्वाला उत्पन्न हुई । सर्वप्रथम वह ज्वाला एक पर्वत पर गिरी । इसी पर्वत को ज्वालामुखी कहा जाता है । सती के शरीर से ज्वाला निकल जाने के बाद मात्र स्थूल शरीर रह गया । इसके बाद शिव के गणो ने उस यज्ञ का पल भर में नाश कर दिया पर शिव का क्रोध इससे शांत नही हुआ । सती के शरीर को कंधे पर उठाकर शिवजी भ्रमण करने लगे । ऐसी स्थिति देखकर और शिव का मोह दूर करने के लिये विष्णु ने सती के शरीर के अंगो को काट दिया जिससे वे 51 अलग अलग स्थानो पर गिरे । इन्ही स्थानो पर शिव ने भी अलग अलग रूपो में निवास किया । इन्हे शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है । ज्वालामुखी में सती की महाजिव्हा गिरी थी । इस मंदिर के इतिहास के बारे में ऐसा बताते हैं कि सतयुग में सम्राट भूमिचन्द्र को किसी ग्वाले ने बताया कि उसने हिमालय के धौलाधार के पहाडो में ज्वाला निकलती देखी है जो कि निरंतर जलती रहती है । महाराज ने स्वयं दर्शन किये और घोर वन में मंदिर का निर्माण कराया । उन्होने शाक द्धीप से भोजक जाति के दो पवित्र ब्राहणो को लाकर उन्हे यहां का पूजन अधिकार सौपा । तब से आज तक उन्ही के वंशज यहां पर पूजा अर्चन करते आ रहे हैं । महाभारत के एक प्रसंग के अनुसार यहां पर पांडवो ने भी पूजा अर्चना की थी । यहां पर माता की नौ से चौदह की संख्या में ज्योतियां जलती रहती हैं । कभी कभी इनकी संख्या तीन भी रह जाती हैं । इन ज्योतियों के अलग अलग नाम हैं । मंदिर के मुख्य द्धार क सामने चांदी के जाले में जो सबसे बडी ज्योति है उसको महाकाली का रूप माना जाता है । यही पूर्ण ब्रहम ज्योति ज्वालामुखी के नाम से विख्यात हैं । इसके कुछ नीचे ही महामाया अन्नपूर्णा हैं । दूसरी ओर चंडी माता , हिंगलाज भवानी ,विंध्यवासिनी , महालक्ष्मी , सरस्वती ,अम्बिका ,अंजना ज्योतियां हैं । कहा जाता है कि इस कलयुग में भगवती ज्वाला जी के सदृश्य अन्य कोई देवी या देवता नही है । ज्वालामुखी में ऐसा बताते हैं कि एक बार फिरोज शाह तुगलक आया था । चौदहवी सदी में उसने हिंदुओे के बहुत सारे मंदिरो को नष्ट कर दिया और बहुत सारे मंदिरो से कर वसूला जाने लगा । ज्वालामुखी में भी उसने हिंदुओ पर सवा सवा रूपये प्रति मोहर लगवाकर वसूल किये । एक बार झगडा हो जाने पर उसकी सेना ने यात्रियो को मारना शुरू कर दिया और मूर्तिया तोडने के इरादे से उसने भगवान दत्तात्रेय भगवान की मूर्ति पर हमला किया । तब भगवती के कोप से प्रतिमा से लाखो शहद की मक्खियो ने निकलकर उसकी सेना को डस लिया जिससे सारी सेना भाग गयी और उसके बाद उसने दोबारा इधर का रूख नही किया । अकबर की कथा कहे बिना ना तो ज्वालामुखी माता का वर्णन पूरा होता है ना ही यहां का इतिहास । ये कथा हम भी बचपन से सुनते आये हैं । जिन दिनो अकबर का शासन था । नदोन ग्राम का निवासी माता का एक भक्त ध्यानू अन्य यात्रियो सहित माता के दर्शनो के लिये जा रहा था । इतना बडा जत्था देखकर सिपाहियो ने उसे पकडकर अकबर के सामने पेश किया तो अकबर ने पूछा कि तुम कहां जा रहे हो तो उसने बताया कि हम ज्वाला देवी के दर्शनो को जा रहे हैं । अकबर ने माता के बारे में और जानना चाहा तो ध्यानू ने माता की शक्ति के बारे में उन्हे बताया । राजा को थोडी ईष्र्या हुई कि हिंदुस्तान के राजा के सामने खडे होकर किसी की शक्ति का इतना बखान कर रहा है तो उसने कहा कि तुम कोई चमत्कार दिखाओ तेा मै मानूंगा कि तुम्हारी माता शक्तिशाली है इस पर ध्यानू ने कहा कि मै तो माता का भक्त हूं मै क्या चमत्कार दिखा सकता हूं तो अकबर ने कहा कि तुम माता के भक्त हो तो माता अपने भक्त की लाज जरूर रखेगी । ऐसा करो मै तुम्हारे घोडे की गर्दन कटवा देता हूं । अगर तुम्हारी माता में शक्ति है तो वो इस घोडे की कटी गर्दन दोबारा जुडवा देगी । अगर तुम्हे मंजूर हो तभी यात्रा की अनुमति मिलेगी । ध्यानू ने कोई और उपाय ना देखकर एक महीने तक घोडे के शरीर और गर्दन को एक महीने तक सुरक्षित रखने को कहा । ऐसा ही हुआ और घोडे की गर्दन काट दी गयी और यात्रा की अनुमति दे दी गयी । ध्यानू भक्त जब मंदिर में पहुंचा तो उसने वहां रात भर जागरण किया और माता से प्रार्थना कि कि आप के भक्त की लाज पर प्रश्न खडा किया गया है सो आप मेरी लाज रखें । कुछ समय तक इंतजार करने के बाद उसने कहा कि यदि माता मेरी प्रार्थना स्वीकार ना करेंगी तो मै जीकर क्या करूंगा क्योंकि लज्जित होकर जीने से मर जाना अच्छा है इसलिये ध्यानू ने अपना शीश काटकर देवी के चरणो में चढा दियाउसी समय साक्षात ज्वाला माई प्रकट हुई और ध्यानू का सिर धड से जुड गया । माता ने भक्त से कहा कि दिल्ली में घोडे का सिर भी धड से जुड गया है । तुम दिल्ली पहुंचो । कोई और इच्छा हो तो मांगो तब ध्यानू ने कहा कि आप अपने भक्तो की इतनी कठिन परीक्षा ना लिया करें क्योंकि हर कोई आपको अपने सिर की भेंट नही दे सकता तो माता ने वर दिया कि जो कोई नारियल भी चढायेगा और सच्चे मन से मांगेगा मै उसकी मुराद पूरी करूंगी ।

COMMENTS

BLOGGER: 4
  1. उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

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  2. मनु भाई आपने काफी सारी और काम की जानकारी दी है माता जी के बारे में !!अच्छा लिख रहें हैं आप !!

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  3. माता के दर्शन कराता है
    फोटो शोटो सुंदर सुंदर
    लाकर भी लगाता है
    जाट देवता देखिये जरा
    कहाँ कहाँ हो कर आता है !!

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  4. वाह मनु भाई पूरा आँखों देखा हाल बता दिया।

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