Pangong-man-Merak-Chushul

पेंगोंग को देखकर दर्द को कुछ समय के लिये भूल गये थे उपर से रात की नींद सही से नही पूरी हो पाने की वजह से आराम करने के लिये भी शरीर...



पेंगोंग को देखकर दर्द को कुछ समय के लिये भूल गये थे उपर से रात की नींद सही से नही पूरी हो पाने की वजह से आराम करने के लिये भी शरीर कह रहा था इसलिये मैने मिश्रा जी से थोडी देर पहले झील के शूटिंग प्वांइट को छोड दिया । मिश्रा जी का अभी और भी फोटो खींचने का मन था । मै टैंट में आया और सो गया । आज हमें कहीं नही जाना था और यहां के आराम के बाद आगे लगातार चलना था । सोकर उठा तो भी सिर का दर्द नही गया । मित्र डा0 प्रदीप त्यागी जी को फोन मिलाकर पूछा तो उन्होने दवाई बतायी वो लेकर फिर से लेट गया । थोडी ही देर में सिरदर्द गायब था । मिश्रा जी भी अब साथ ही थे । शाम का समय हो चुका था और हम दोनो लुकुंग के शुरूआत में बने आर्मी के कैम्प में गये जहां मैडिकल सुविधा थी । यहां पर केबिन बने थे जो कि अंदर से गर्म थे । यहां मौजूद डाक्टर ने मेरी पटटी बदली और मिश्रा जी को भी दवाई लगायी ।

मैने मिश्रा जी को बता दिया कि हमें सुबह चलना है क्योंकि कल हमें लम्बा सफर तय करना है इसलिये सवेरे उठना है । दोनो ने जल्दी खाना खाया और अंधेरा होने के समय तक हम सो गये थे । रात को यहां पर दस बजे तक ही इमरजेंसी लाइट की सुविधा मिलती है । कैमरा बैट्री और फोन भी चार्ज कर लिये गये थे । सुबह मै पांच बजे ही उठ गया और फ्रेश होने के लिये होटल वालो के टायलेट में गया । वैसे तो अटैच टायलेट था पर यहां पर धोने के लिये जेट पम्प तो था नही और ऐसे में अंग्रेजी टायलेट बनाना मुझे मूर्खता लगता है । या तो फिर टायलेट पेपर से पोंछोयहां लोकल लोग अपना जो टायलेट बनाते हैं उसमें एक गढढा खोदते हैं और उसके उपर लकडी के तख्ते रख देते हैं किसी टायलेट शीट की जरूरत नही । मल जो है वो बहुत उपर से गिरता है और उसके बाद मल के उपर राख या मिटटी डाल दी जाती है तो अशुद्धता ना महसूस होती है ना दिखती है । हालांकि इस शौचालय में जाने के लिये खुले आसमान के नीचे बैठना था जो कि सुबह के समय यहां पर कठिन काम था । बस राहत ये थी कि तीन तीन फिट की दीवारे बना रखी थी जिससे ठंडी हवा से बचाव हो रहा था ।

मै तैयार होकर मिश्रा जी को जगाने लगा तो वो बोले कि गरम पानी मिलेगा ऐसा बोला था होटल वाले ने तो जब गरम पानी मिलेगा तभी मै उठूंगा । मुझे बहुत गुस्सा आया क्योंकि रात के 12 बजे तक उस होटल वाले और उसकी पत्नी ने बोनफायर का इंतजाम किया था । हम तो नही गये पर अन्य सभी लोग वहां पर थे । उसके बाद वो सोये होंगे और दूसरी बात कि ऐसी जगहो पर आने वाले पर्यटक देर तक सोने वाले होते हैं इसलिये होटल वाले भी छह बजे उठने से रहे । कर कुछ नही सकता था इसलिये चुपचाप लेटा रहा और सात बजे मिश्रा जी उठे और तब गरम पानी लेकर फ्रेश हुए । कारण वही कि जब मिल रहा है तो क्यों ना लिया जाये । गरम पानी आया तो बोले मुझे तो नहाना नही है बस पानी पीना है गरम । मिश्रा जी ही थे जो टैंट लगाने की जिद कर रहे थे । अगर हम टैंट लगाते तो गरम पानी कहां से मिलता पर उनकी जिद थी कि जब सुविधा उपलब्ध है तो क्यों ना ली जाये । एतराज मुझे भी नही था पर उसके लिये हमारा सुबह सवेरे का बेहतरीन समय निकला जा रहा था क्योंकि ट्रैकिंग हो या बाइकिंग पहाडो का एक ही उसूल है कि सवेरे निकलो और सवेरे पहुंचो क्योंकि मौसम का कुछ पता नही होता ।


लुकुंग से दस किलोमीटर आगे स्पंगमिक गांव है । ये गांव कम और टूरिस्ट हब ज्यादा है क्योंकि यहां पर अधिकतर टैंट और होम स्टे ही हैं । ज्यादातर पर्यटक यहीं पर रूकते हैं । दस मिनट में यहां पर पहुंच गये और उसके बाद यहां से थोडा आगे ही मान गांव तक । यहां के रास्ते रास्ते नही हैं । चुशुल तक कोई सडक नही है सिर्फ कच्चा रास्ता है । वो कच्चा रास्ता भी एक नही है कई जगहो पर वो रास्ते अलग अलग बंट जाते हैं और आपको अपने विवेक से फैसला करना पडता है कि किधर को जाया जाये । वैसे मैने ये अनुभव किया कि आपको बस झील के किनारे किनारे चलना है तो जो रास्ता झील के किनारे जा रहा है उसी को चलना ठीक है । हालांकि फिर भी विवेक सबसे उपर है क्योंकि कई बार झील के नजदीक वाले रास्ते पर पानी मिला जिसमें से बडी गाडी ही पार हो सकती थी तो दूसरा कोई भी रास्ता चुना जायेगा तो वो भी आगे जाकर उसी में मिलेगा ।


बडी गाडियो जिनमें से आर्मी के ट्रक मुख्य है उन्होने यहां पर अपनी मर्जी से रास्ते बना लिये है । अक्सर इस पूरे रास्ते पर बारीक बजरी मिलती रहती है जिस पर तेजी से बाइक चलाने से फिसलने का खतरा रहता है इसलिये स्पीड को नियंत्रित रखना ही पडता है । कई बार बहुत दूर तक कच्चा बढिया रास्ता आ जाता है तो स्पीड अपने आप बढ जाती है पर कहां अचानक से बजरी आ जायेगी पता भी नही चलता । मान गांव भी बहुत छोटा सा नाम भर का गांव है और यहां से दस किलोमीटर आगे मेरक गांव है । ये गांव काफी बडा है मान से और यहां पर टूरिस्ट वाला हल्ला भी नही है । मान गांव तक ही कोई कोई आता है । हमें मान गांव से लेकर पेंगोंग के दिखना बंद होने तक एक भी वाहन नही दिखा । हालांकि बाइक चलाने के पिछले 15 से भी ज्यादा साल के अनुभव ने मुझे कहीं भी फिसलने या बाइक धंसने और उतरने की नौबत नही आने दी । कल चांगला पास पर भी दो बंदे और 40 किलो से उपर वजन का सामान होने पर भी हमने कहीं पैर नही टिकने दिये । हालांकि इसमें मुख्य रोल इस बात का भी था कि हमें कहीं भी किसी गाडी के पीछे नही चलना पडा वरना गाडी का जो प्रवाह बना हुआ था वो टूट जाता । खाली सडक मिलती गयी और पहले गियर में भी गाडी चढती गयी । यहां रेत में भी ऐसा ही था कि कई जगह धंसने की नौबत आयी भी तो वहां पर रेस बढाकर तेजी से निकाल लिया ।

मेरक से आगे निकलने के बाद पेंगोंग की खूबसूरती और भी बढ जाती है क्योंकि हमें वो दोनो तरफ से पूरी दिखती है । आप भारतीय हिस्से को एक ही जगह से पूरा निहार सकते हो । वो जगह मेरक से आगे चलकर आती है जहां झील के किनारे पहाड है और बस छोटा सा रास्ता है । वहां से खडे होकर लुकुंग तक दिखेगी और दूसरी ओर चीन की दिशा में मुझ जाने तक पर मेरक तक ही आप बिना परमिट के आ सकते हो । इस बात का पता भी ज्यादातर लोगो को नही होता और वो मान गांव तक भी नही जाते । मेरक गांव में तो कई सारे रास्ते थे और कोई साइन बोर्ड भी नही था इसलिये गांव में एक बार पूछना भी पडा । मेरक गांव में भी कई होमस्टे हैं तो मेरे हिसाब से तो अगर आपको पेंगोंग झील का पूरा आनंद उठाना है तो मेरक में रूकिये जहां ना तो भीडभाड होगी और ना लूटखसोट और आपको पूरा लदाखी होम स्टे मिलेगा ।मेरक गांव में पुलिस चौकी बताते हैं पर अभी ये चौकी शुरू नही हुई थी । इसका मतलब ये था कि अगर कोई यहां आ जाये तो चुशुल तक भी बिना परमिट के जा सकता था । आगे चुशुल तक कोई चौकी नही थी रास्ते में । मेरक से आगे जिस पहाड का मैने जिक्र किया वो झील के सबसे पास है जहां से पूरी झील को दोनो तरफ से देखा जा सकता है । इस पहाड के किनारे को पार करने के बाद झील का लुकुंग , मेरक वाला हिस्सा दिखना बंद सा हो जाता है और उल्टे हाथ पर झील चीन की तरफ को मुडती दिखती है । यहीं पर झील के किनारे एक चौकी और कुछ आदमी भी दिख रहे थे । शायद वो सेना की चौकी हो या आईटीबीपी की । झील के आखिरी कोने पर जाकर दो रास्ते दिखायी देते हैं । एक जो कि सीधा जा रहा है धीरे धीरे चढाई के साथ और एक पहाड पर घुमावदार रास्ता बना दिखता है । वो जो पहाड पर घुमावदार रास्ता है वो किसी और तरफ जा रहा होगा क्योंकि हमारा रास्ता तो सीधा वाला ही था । मैप ने वही रास्ता बताया वरना यहां तो कोई बताने वाला भी नही मिलता । रास्ता कच्चा तो था ही साथ में छोटे छोटे पत्थरो से भरा हुआ था जिसमें से कई तो बाइक में उछल कर लग रहे थे ।

चढाई को पार करने के बाद एक लम्बी चौडी घाटी दिखी जिसमें पानी और हरियाली दिख रही थी और साथ ही बहुत सारे फयांग और अन्य जानवर भी । हमें सीधे हाथ की तरफ ही चलते जाना था क्योंकि इसी चढाई से चुशुल दिखायी देने लगता है । अब हमे आर्मी के ट्रक भी मिलने लगे थे जो कि चुशुल की तरफ से आ रहे थे । मेरक से चुशुल के रास्ते में एक से बढकर एक नजारे मिले जिनसे नजरे हटाना भी मुश्किल था । ये रास्ता भी यादगार रास्तो में से एक रहेगा । जब कभी हिमालय में ट्रैक पर गये तो अक्सर ऐसा होता है कि ट्रैक करने में किसी झील या किसी पर्वत को लक्ष्य बनाकर चला जाता है और दो तीन ,पांच दिन उसी पर्वत को देखते रहते हैं । यही नही कई बार कई जगहो पर जाते हैं जहां से पर्वतमाला दिखती है । लददाख में ये अलग अनुभव हैं कि अब तक इतने बर्फ के पहाड और ऐसे पर्वतमालाऐं देख चुके हैं कि लगता नही कि इतनी चोटियो का किसी ने नामकरण भी किया होगा । संभव ही नही लगता है ऐसा होना क्योंंकि यहां पर पहाड के अलावा है ही क्या और चूंकि वाहन से चलने में बंदा एक ही दिन में सैकडो पहाड देख लेता है । हां एक बात और कि इस रास्ते पर चलने में दिन का समय तो होना ही चाहिये । रात के समय या फिर शाम को जब अंधेरा गहराने लगे तब यहां पर चलने में आप इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति को कभी समझ नही सकते है और ना ही आपको वो अलग अलग वाले रास्ते सही से दिखेंगें ।

चुशुल गांव एक कोने से में को जाकर है । जिधर से हम आये वहां से जो घाटी दिख रही थी हमें उसी घाटी के दाहिने तरफ ही चलकर सागाला दर्रा जाना है । चुशुल भी एक दर्रा है और वो उसी उंचाई वाली जगह पर था जहां से गांव दिखता है । ये अलग बात है ​कि यहां पर दर्रो की पहचान के लिये लगी होने वाली झंडिया बहुत छोटी सी लगी हुई थी । गांव काफी दूर तक फैला है और गांव वाले गांव में ही अपने घरो के पास थोडी बहुत जमीन में खेती कर रहे हैं । यहां स्कूल भी है और आर्मी पोस्ट भी । हम गांव में नीचे जाने वाले रास्ते जिस पर पुल बना था और उपर जाने वाले रास्ते पर भ्रमित थे और हम उपर वाले रास्ते को मुड गये । ये रास्ता पहुंच गया आर्मी पोस्ट पर और वहां मौजूद आर्मी वाले बहुत देर तक आवाज लगाने पर निकले । पहले तो हमें देखकर हैरान हुए और फिर परमिट मांगने लगे । परमिट को हमने टैंक बैग के उपर ही रखा हुआ था वो दिखा दिया । उन्होने बताया कि यहां से नीचे का पुल पार करके उल्टे हाथ को जाना और उसके बाद सीधे हाथ की साइड ही चलते रहना गांव से बाहर निकल के स्मारक के पास से

Leh laddakh-


पटटी उखडने में बडा दर्द हुआ
सीधे हाथ की साइड का  पोज
स्पंगमिक गांव
अब सडक ही नही है
लेकिन खूबसूरती और ज्यादा है
अब साइड से होकर जाना पडेगा
मान गांव
यही है वो जगह जहां से पूरी झील दिखती है
पानी बिलकुल साफ है
ये दूसरी साइड से दिखती झील
मेरक गांव
चीन की साइड को जाती झील
रेत बजरी से भरा रास्ता
यहां से झील चीन में प्रवेश कर  रही है
सीधे हाथ पर कोने में चुशुल दिख रहा है
chushul village
chushul village
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COMMENTS

BLOGGER: 2
  1. लेख पढ़कर मजा आया मनु भाई , फोटो तो खूबसूरत हे ......मुझे भी सुबह सवेरे सफर शुरू करने में आनंद आता हे ,ऐसा करनेसे पुरे दिन का उपयोग हो जाता हे अगर सफर लंबा हो तो आराम से पूरा किया जा सकता हे ...,
    .मिश्रा जी ऐसे क्यू कर रहे थे समझ नहीं आया .शायद .
    (अविश्वास ,ईगो प्रॉब्लम ,चोट की वजह से या क्लाइमेट )
    सफर टीमवर्क से यादगार बन जाता हे ...

    आगे की पोस्ट का इंतजार रहेगा
    ( लेह लद्धाख पोस्ट का लालची हु में )

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  2. वाह. क्या बात है. ग़ज़ब के चित्र हैं.

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