Kedarkantha trek केदारकांठा ट्रैक , दिल्ली से सांकरी तक

सर्दियो में ट्रैक करना हमेंशा एक सपने जैसा होता है जिसके पूरे होने पर ही हकीकत का भान होता है । कई जगह तो ऐसी हैं जहां पर मई जून में ...


सर्दियो में ट्रैक करना हमेंशा एक सपने जैसा होता है जिसके पूरे होने पर ही हकीकत का भान होता है । कई जगह तो ऐसी हैं जहां पर मई जून में भी सर्दियो के स्नो ट्रैक जैसा हाल होता है । फिर भी अगर जनवरी की कडकती ठंड में ट्रैक करने की पूछी जाये तो कई लोग तो इसे बेवकूफी बताते हैं । पिछले साल जनवरी के महीने में हम हर की दून गये थे तो वहां पर हमने गांव वालो से पूछा कि क्या इन दिनो में कोई यहां पर आता है तो उन्होने जवाब दिया कि इन दिनो में तो हम ही यहां से हिल नही पाते लेकिन हमारी किस्मत बढिया थी या पहाडो की खराब कि पिछले साल बर्फबारी नाम मात्र को हुई थी । जनवरी के महीने में भी बर्फ का नामोनिशान हर की दून में नही था जो कि स्नो लाइन से मिली हुई जगह है । वहीं मार्च में दयारा बुग्याल से डोडीताल जाते हुए इतनी बर्फ मिली कि उसने सारे जोड हिला दिये और अनुमान फेल कर दिये । अब इस साल बातो ही बातो में किसी स्नो ट्रैक की योजना बनी और उसमें केदारकांठा का नाम सबसे पहला था ।

केदारकांठा ट्रैक तो हम पिछले साल भी कर आ सकते थे पर मेरी सबसे बडी कमी है किसी भी ट्रैक को भागमभाग में करना । जो ट्रैक कम्पनीज बनाती हैं उनमें बडा आराम होता है । हमारे एक मित्र अमित तिवारी भी उसी तरह के कार्यक्रम बनाते हैं जिनमें एक दिन में बमुश्किल 5 से 10 किलोमीटर के बीच में चलना होता है । ऐसे में व्यक्ति को बडा आराम मिल जाता है । हमने हर की दून को ढाई दिन में किया और उसके बाद पैरो की हालत ऐसी नही थी कि केदारकांठा कर पाते सो हम वापस चले आये । इसके अलावा केदारकांठा ट्रैक को उत्तराखंड के सुंदर ट्रैक में से एक माना जाता है । आप साल के किसी भी समय में यहां पर जा सकते हैं बरसात के एक या दो महीने को छोडकर । सर्दियो में बर्फ भरपूर मिलेगी तो गर्मियो में भी आपको पीक पर बर्फ मिलने के पूरे चांस हैं । चीन की सीमा और स्नो लाइन के नजदीक होने के कारण इस पीक पर बर्फ रहती ही है । बीच का रास्ता घने जंगल का है जहां पर धूप मुश्किल ही दिखायी देती है तो बर्फ जून तक भी जमी रहती है । केदारकांठा की चोटी से 360 डिग्री का व्यू दिखता है इसलिये ये लोगो की पसंदीदा जगह बनती जा रही है और इसके सामने हर की दून पिछडता दिख रहा है । केदारकांठा का ट्रैक अपेक्षाकृत हर की दून के छोटा है पर हर की दून से कठिन है । इसका कारण है कि दोना जगह की उंचाई लगभग बराबर ही है लेकिन जहां हर की दून में सांकरी से जाने में 30 किलोमीटर का रास्ता है एकतरफ से वहीं केदारकांठा में ये दूरी ज्यादा से ज्यादा 12 किलोमीटर है इसलिये चढाई लगातार है जबकि हर की दून में चढाई उतराई चलती है ।

तो मै , जाट देवता संदीप पंवार और स्पीति यात्रा और करेरी धर्मशाला यात्रा के साथी राकेश विश्नोई , कुल मिलाकर तीन लोग तैयार हो गये चलने के लिये । एक मित्र और भी तैयार थे और घर से ट्रेन में बैठ भी लिये थे पर उन्हे मना करना पडा क्योंकि उनकी वजह से हमें एक दिन और घर पर रूकना पडता और मेरे साथ ऐसा तीन दिन तक होता रहा कि मै सामान बांधकर तैयार बैठा था कि कल चलेंगें और तभी किसी मित्र ने कह दिया कि एक दिन और रूक जाओ तो मै भी चलूंगा । इस चक्कर में श्याम भाई का भी ट्रैक रह गया । इसलिये मन को कठोर बनाना पडा और भारी जी से कहना पडा कि अब हमारा कार्यक्रम फिक्स है और कोई इसी में चलना चाहे तो स्वागत है वरना हम तो जा ही रहे हैं । पहले हमारा कार्यक्रम रात को निकलने का था पर बाद में इसे सुबह का बनाना पडा क्योंकि राकेश भाई एक दिन पहले तक धर्मशाला हिमाचल में थे और वो वहां से रात को बस से सुबह दिल्ली पहुंचने वाले थे । उनकी बस सुबह 6 बजे के आसपास आनी थी और उसके बाद उन्हे अपने घर जाकर अपना सामान भी पैक करना था और दक्षिणी दिल्ली से मुकरबा चौक आने में एक घंटा और भी लग जाना था ।

केदारकांठा जाने के लिये हमें सांकरी जाना था जहां हम पिछले साल इसी समय में गये थे जनवरी में । हम उस समय रात को गये थे और हमने देहरादून से मसूरी और मसूरी से कैम्पटी फाल को होकर नौगांव से पुरोला मोरी वाला रास्ता पकडा था । नौगांव से तो एक ही रास्ता है पर नौगांव या पुरोला तक तीन रास्तो से आया जा सकता है । एक तो देहरादून — मसूरी — यमुना पुल —नौगांव —पुरोला और दूसरा है रिषीकेश से होकर और तीसरा है दिल्ली —यमुनानगर —विकासनगर —यमुना पुल से होकर । इन में से जिस रास्ते को हम गये थे यानि देहरादून मसूरी से होकर वो रास्ता रात के लिये ही सही है । हम रात को 12 बजे मेरे घर से निकले थे और सुबह 5 बजे देहरादून थे । मेरे घर यानि मुरादनगर से । भारी धुंध में भी 5 घंटे यानि दिल्ली से एक या डेढ घंटा और मान लीजिये । इसके बाद देहरादून से मसूरी और मसूरी से यमुना पुल पहुंचना भी बडा मजेदार है क्योंकि इस समय पर हमें कहीं भी ट्रैफिक या जाम नही मिला और ना ही इस रास्ते पर कहीं बैरियर मिला । इस बार हम सुबह से शुरूआत करने वाले थे और दिल्ली से अगर हम 7 बजे भी निकलें तो देहरादून , मसूरी या रिषीकेश किसी भी जगह पर जाम से परेशानी के अलावा फालतू समय भी लगना तय होता है । इसलिये इन दोनो रास्तो की तो ना ही हो गयी । इसके अलावा एक कारण और भी था कि मै अपनी कार लेकर चल रहा था तो संदीप भाई और राकेश भाई मेरे पास आते तो उन्हे दस बज जाने थे या उससे भी ज्यादा क्योंकि मेरे घर आने में दिल्ली और गाजियाबाद दोनो पार करने पडते । इसलिये यमुनानगर वाला रास्ता फाइनल हुआ और उसमें मुझे दिल्ली के ट्रैफिक से चिढ होती है इसलिये मुझे दिल्ली को सुबह सवेरे ही पार करना था तो मै अपने घर से सुबह 6 बजे चल दिया । मेरे घर से मुकरबा चौक करीब 40 किलोमीटर पडता है जिसमें से 30 किलोमीटर बाद जाट देवता का घर है जगतपुर दिल्ली में यमुना किनारे । एक घंटे में बडे आराम से बिना किसी जाम के मै जाट देवता के घर पहुंच गया ।

जाट देवता के घर से मुकरबा चौक दस किलोमीटर है और दस ही मिनट का रास्ता है रिंग रोड की वजह से , जाम की भी इतनी दिक्कत नही होने वाली थी । राकेश भाई सुबह सवेरे दिल्ली आ चुके थे और घर जाकर वहां से मुकरबा चौक आने में उन्हे काफी समय लग गया । जहांगीर पुरी मैट्रो स्टेशन से हमें उन्हे लेना था जो कि मुकरबा चौक के नजदीक है । उनके आने से पहले हमने सीएनजी की टंकी फुल करा ली । राकेश भाई सवा नौ बजे आये और उनका सामान गाडी में रखने के बाद हल्के से जाम से निकल कर दिल्ली अमृतसर रोड पर आने तक हमें लगभग दस ही बज गये थे । हम अपने समय से लेट हो गये थे और ऐसे में 450 किलोमीटर दूर वो भी पहाडो में अपनी मंजिल तक आज ही पहुंचना मुश्किल लग रहा था । अब यहां से रोड बडी शानदार थी पर राकेश भाई कुछ खाकर नही आये थे और मै सुबह 6 बजे बस एक चाय पीकर चला था इसलिये भूख लग आयी थी जो दिल्ली से बाहर निकलते ही रोड किनारे बढिया अमरूद बेच रहे बालको को देखकर और जग आयी । पहले दो किलो अमरूद लिये और वाकई में ​अमरूद बहुत स्वादिष्ट थे तो गाडी और हमारे दोनो के अंदर जान सी पड गयी । गाडी सौ की स्पीड पर चल रही थी सो सफर तेजी से तय होने लगा । यहां इस रोड पर दो टोल नाके पडते हैं । पहले पर 30 रूपये का और दूसरे पर 110 रूपये का टोल लगा । हरियाणा शुरू होते ही पैट्रोल की टंकी भी फुल करा ली थी । अब तो बस चलना ही चलना था । कुरूक्षेत्र से थोडा पहले ही रास्ता बदल दिया गया । मेन हाईवे को छोडकर यमुनानगर के लिये दूसरा रास्ता पकड लिया । ये हाईवे जितना बडा तो नही था पर सडक ठीक थी और ट्रैफिक भी ज्यादा नही था । लाडवा तक आराम से आ गये पर यमुनानगर में आते ही देहरादून और रिषीकेश की याद आ गयी । इस शहर का तो बाईपास बननाा चाहिये । इतना लम्बा और बडा शहर और उपर से भयंकर वाला जाम

यमुनानगर में आते आते गर्मी भी काफी हो गयी थी और जाम ने चिढन और कुढन दोनो बना दी । यमुनानगर में करीब 240 किलोमीटर आ गये थे मेरे घर से और उसमें से मेरे घर से मुकरबा चौक के 40 किलोमीटर निकाल दें तो दिल्ली से या एन एच 1 की शुरूआत से 200 किलोमीटर तीन घंटे में । यमुनानगर पार करते ही एक रैस्टोरैंट पर रूक गये खाना खाने के लिये और बजाय खाने के यहां पर तंदूरी परांठे और दही का आर्डर दे दिया । दो दो परांठे तीनो पेल गये डकार ले लेकर गाडी में दोबारा बैठ गये । यमुनानगर से थोडा आगे से पोंटा साहिब आने से पहले चढाई शुरू हुई जो इ​तनी है जितनी देहरादून जाने से पहले पडती है सहारनपुर से । इसी रास्ते में एक जगह सडक पर पेडो की सुरंग सी बनी दूर तक दिख रही थी । फोटो खींचने के लिये शानदार लोकेशन देखकर यहां सभी ने फोटो खिंचवाये । आज दिन में बस यही फोटो लिये थे अपने ।

खाना खाने और सुबह सवेरे उठने की वजह से मुझे नींद आने लगी थी । पोंटा साहिब और विकासनगर तो आराम से आ गया उसके बाद मुझे लगा कि अब एक झपकी ले लेनी चाहिये । मैने गाडी राकेश भाई को थमाई और अपनी झपकी लेने की तैयारी कर दी । थोडी देर में ही जब उठा तो यमुना पुल भी पार हो चुका था । हंसी मजाक और बातो में समय बढिया गुजर रहा था । शाम भी हो गयी और सूर्यास्त भी । हम पुरोला तक पहुंचने की सोच रहे थे 6 बजे के करीब जब पुरोला 16 किलोमीटर बचा हुआ था । इसी बीच एक मजेदार घटना हुई कि हमारी गाडी के सामने तेंदुआ दिखायी दिया । तेंदुआ बडा स्वस्थ , युवा था और शानदार लग रहा था लाइट पडने पर । लाइट पडने पर भी वो भागा नही बल्कि एकटक देखता रहा । गाडी करीब 50 की स्पीड पर रही होगी इसलिये मैने जब तक रोकी तो हम उससे आगे निकल चुके थे । सडक पर कोई वाहन दूर दूर तक नही था और नीचे नदी थी । हो सकता है कि वो पानी पीने जा रहा हो । हमने गाडी बैक की तो वो धीरे धीरे नीचे उतर गया । हम वहां से आगे आये तो एक चौकी पर वन विभाग वालो ने अपने एक बंदे को बिठाने को हाथ दिया । हमने उन्हे बिठा लिया और तेंदुए के बारे में बताया तो उन्होने बताया कि इस इलाके में हैं तो लेकिन तेंदुआ दिखना बहुत मुश्किल होता है । पुरोला तक पहुंच गये और यहां से बाजार में से राकेश भाई ने अपने​ लिये छतरी खरीदी क्योंकि उनके पास पोंछू नही था । जाट देवता का मन था कि अब यहीं कहीं रूक लेते हैं पर मैने उन्हे कहा कि जब तक कोई बढिया ठिकाना नही मिलता तब तक चलते हैं । इस चलने चलने में ही मोरी पहुंच गये और यहां पर सन्नाटा था । एक चिंता ये भी थी कि अगर हम सांकरी जाते हैं तो वहां पर हम नौ बजे तक पहुचेंगें तो वहां पर खाना मिलेगा या नही । हम मोरी से भी चल दिये और यहां से सांकरी तक का रास्ता बहुत ही गंदी स्थिति में है । पिछले साल भी ये जैसा था उससे भी ज्यादा बेकार हालत में आ चुका था ।

यहां पर कई जगह तो गाडी नीचे से लगी और कई जगह कीचड ने बुरी हालत की हुई थी । मोरी से सांकरी तक सडक तो ख्रराब ही है और लगातार चढाई भी चलती रहती है जो स्थिति को और भी बिगाड देती है । रात में सब कुछ इतना स्पष्ट भी नही दिखायी देता पर जैसे तैसे हम सांकरी 9 बजे के आसपास पहुंच गये । मेरे घर से 482 और मुकरबा चौक से 442 किलोमीटर हमने आज के सफर में तय कर लिये थे । 11 घंटे में हम सांकरी आ गये थे और हमारे लिये राहत की बात ये थी कि हमें खाना भी मिल जायेगा ।

जाट देवता सर्वश्रेष्ठ का चुनाव करते हुए
ये हैं उम्मीदवार हमारे पेट में जाने के
हथनी कुंड बैराज
यही है वो मन ललचाने वाली लोकेशन
दो बेहतरीन ट्रैकर
और मै , त्यागी
राकेश विश्नोई
राकेश विश्नोई और जाट देवता
पौंटा साहिब गुरूद्धारा
विकास नगर से पहले
यमुना पुल के आसपास
सूर्यास्त होता हुआ पहाडो के कहीं पीछे
शाम के 6 बजे
अगले दिन सुबह सांकरी का दृश्य
हर की दून साइड का नजारा
हर की दून साइड का नजारा
ये केदारकांठा साइड की तरफ का नजारा
सुबह जाट देवता और राकेश भाई मंत्रणा करते हुए
सांकरी गांव ​ से तालुका के रास्ते पर
सांकरी गांव ​ से तालुका के रास्ते पर
बर्फ से आच्छादित चोटियां
यूथ होस्टल वालो का कैम्प सौढ गांव में
ये जो मोड है दाहिने हाथ पर ये ही केदारकांठा का रास्ता शुरू होता है
ट्रैक की शुरूआत में ही बर्फ इतनी देख मन खिलखिला उठे
ट्रैक की शुरूआत में ही बर्फ इतनी देख मन खिलखिला उठे
Kedarkantha trek

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Kedarkantha trek केदारकांठा ट्रैक , दिल्ली से सांकरी तक
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