How to trek in Himalayas

ट्रैकिंग ऐसा शब्द है जिसे बहुत हल्के में भी लिया जा सकता है और भारी में भी । ट्रैकिंग शब्द की कोई बंधी हुई सीमा नही है । किसी बंधे बंधाय...

ट्रैकिंग ऐसा शब्द है जिसे बहुत हल्के में भी लिया जा सकता है और भारी में भी । ट्रैकिंग शब्द की कोई बंधी हुई सीमा नही है । किसी बंधे बंधाये रास्ते को भी ट्रैक कह सकते हैं और आप पैदल अपना ही कोई रास्ता बनायें उसे भी । ट्रैक एक घंटे का भी हो सकता है एक दिन का भी और एक महीने का भी । ये सब करने वाले की मानसिक और शारिरीक स्थिति पर निर्भर करता है कि वो कैसा ट्रैक करना चाहता है ।

ट्रैक को वैसे तीन श्रेणियो में बांटा जाता है 

इजी या सरल ट्रैक — साधारण ट्रैक जिसमें बहुत ज्यादा उंचाई या उतराई ना हो । एक या दो से लेकर तीन दिन तक लगें और उंचाई से संबंधित समस्या ना हो । इसी श्रेणी में टी हाउस ट्रैक भी आते हैं । टी हाउस ट्रैक उसे कहा जाता है जहां पर रहने और खाने की परेशानी ना हो और रूकने खाने के ठिकाने मिलते रहें । ऐसी जगहो पर अपना स्लीपिंग बैग भी लेकर जाने की जरूरत नही होती है । यदि ले जाना चाहें तो भी बढिया है ।
ऐसे ट्रैक की एक लिस्ट उत्तराखंड की मैने अभी दी है आप इसे चैक कर सकते हैं । इसमें देवरिया ताल , नाग टिब्बा , देवरिया ताल , तुंगनाथ , चंद्रशिला , कार्तिक स्वामी , हर की दून , त्रियुण्ड , बिजली महादेव आदि हैं ।

माडरेट या मध्यम कठिनाई के ट्रैक — ऐसे ट्रैक जिनमें उंचाई , चढाई और थोडा ट्रैक के रास्ते में पडने वाली कठिनाईयां भी मायने रखती हैं । जैसे कि गौमुख से तपोवन का ट्रैक जिसमें ग्लेशियर के उपर चलना पडता है तो बहुत सावधानी रखनी पडती है । कई लोग हर वर्ष इनमें अपनी जान भी गंवा देते हैं । साथ ही इन ट्रैक में शारीरिक क्षमता भी जरूर चाहिये । ट्रैक पर जाने से पहले अभ्यास भी चाहिये । इन ट्रैक में टी हाउस वाली सुविधा अक्सर नही होती है और अपना टैंट और स्लीपिंग बैग के अलावा अन्य सामान भी लेकर चलना पडता है अक्सर । कई बार इन सुविधाओ के लिये आपको पोर्टर और गाइड भी चाहिये होता है । एवरेस्ट बेस कैम्प इसका बढिया उदाहरण है जहां उंचाई भी है और रूकने खाने के ठिकाने भी लेकिन इसकी दूरी और समय इतना है कि इसके लिये अभ्यास की जरूरत होती है । हमता पास , तपोवन , पंवाली कांठा , डोडीताल , केदारकांठा , रूपकुंड , हेमकुड साहिब , फूलो की घाटी और अन्य बहुत सारे ट्रैक हैं । इनमें से कुछ ट्रैक ऐसे हैं जिनमें यात्रा के सीजन में जायें तो सिवाय चलने के और बाकी समस्याऐं कम होती हैं जैसे केदारनाथ , हेमकुंड साहिब , मणिमहेश आदि
कठिन ट्रैक — ऐसा ट्रैक जिसमें दिन भर में कम 6 से 8 घंटे चलना पडे , वो भी ऐसी परिस्थितियो में जिसमें शारीरिक क्षमता होने के बावजूद यदि मानसिक स्थिति मजबूत ना हो तो आदमी वापिस जाने की सोचने लगे । हां ऐसे ट्रैक में शारीरिक क्षमता बहुत मायने रखती है पर ऐसे ट्रैक अक्सर 5000 मीटर का लेवल छूते हैं जिसमें शारीरिक रूप से फिट होना पहली शर्त है लेकिन ऐसी जगहो पर अक्सर बिना बताये या बिना सोची परिस्थितियां सामने आती है जिनके लिये मानसिक लेवल बहुत ताकतवर होना चाहिये । हां ये भी पक्की बात है कि ऐसे ट्रैक पर अक्सर सारे सामान और खाने पीने के अलावा आपके पास ट्रैकिंग के लिये इस्तेमाल होने वाली बढिया एसेसरीज भी होनी चाहियें जैसे कि बढिया जूते , बढिया जैकेट और रस्सी आदि

इन सबसे अलग एक बात और कहना चाहता हूं कि शारीरिक क्षमताओ के उपर भी ट्रैक का निर्धारण लोग करते हैं । तुंगनाथ चंद्रशिला का ट्रैक लोग किसी एजेंसी के साथ भी करते हैं और फक्कड घुमक्कड लोग उसे ऐसे ही कर आते हैं । अगर शारीरिक क्षमता ठीक हो तो आप इस ट्रैक को अन्य ट्रैक के साथ लुभाव के रूप में भी कर सकते हैं । मै और जाट देवता रूपकुंड गये और उसके बाद वहां से जब वापस लौट रहे थे तो तुंगनाथ और चंद्रशिला तक भी हो आये । रूपकुंड होने के बाद हम भी थके हुए थे पर कर लिया क्योंकि शारीरिक अभ्यास उस समय ऐसा ही था । बैडमिंटन खेलने की वजह से शरीर चुस्ती और फुर्ती से भरपूर था इसलिये पता ही नही चला । आजकल खेलना नही हो पाने की वजह से वजन बढ गया और केदारकंठा के 6 किलोमीटर में ही थकान भारी हो गयी । सब कुछ शारीरिक क्षमताओ पर काफी हद तक निर्भर है ।

पर इन सबसे इतर एक फार्मूला और भी काम करता है मेरे लिये तो । मै अपने साथ कई बार नये लोगो को ले गया और कई लोगो को जिन्हे उम्मीद नही थी कि वो इस ट्रैक को कर पायेंगें उन्होने कर दिया । बाद में उन्होने इस बात को माना भी कि ये सब इसलिये संभव हो पाया कि मैने उन्हे जो सलाह दी थी वो उन्होने मानी मैने कोई कोर्स नही किया है पर नये हों या पुराने ट्रैकर शायद हर कोई इससे सहमत होगा कि उंचाई पर चढते हुए यदि आप तेज चलते हैं तो आपकी सांस जल्दी फूलने लगती है और यदि एक बार आप आराम करने लगे तो फिर हर पन्द्रह मिनट बाद आपको आराम करने की जरूरत पडेगी । मै हमेशा कछुए की चाल चलने की सलाह देता हूं और खुद भी यही करता हूं । कछुए की चाल से मेरा मतलब है कि मै अपने एक पैर की लम्बाई जितना ही कदम रखता हूं बस । इस तरीके से सांस बहुत कम फूलता है और कम से कम दो घंटे चलने के बाद ही मुझे आराम करने की जरूरत पडती है ।

इस तरीके में एक और बात याद रखने लायक है कि यदि आराम करने का मन हो तो कोशिश करें कि बैठे नहीं । आप इस तरीके से चलेंगें और 5 मिनट यदि खडे होकर सुस्ता लेंगें तो आपकी सांसे नार्मल हो जायेंगी । जितनी दूर तक हो सके खडे खडे ही आराम करने की कोशिश करें । एक बार बैठने पर आपको उठने के बाद बहुत जोर पडेगा और दोबारा बैठने की ललक रहेगी ।

मेरा सबसे पहला ट्रैक था हेमकुंड साहिब और फूलो की घाटी का । मै बहुत नाजुक से शरीर वाला हूं और कभी मेहनती नही रहा । उसके बाद भी अबसे दस साल पहले मै और मेरे दोस्त भाग भाग कर चढ रहे थे । गोविंद घाट से हमारे साथ एक अंग्रेज जोडा भी था जो शुरूआत से ही बहुत धीमे चल रहे थे । हम अपने मन में सोच रहे थे कि ये गोरे कहां चढ पायेंगें । घांघरिया पहुंचने पर वो हमें पहले से होटल लिये हुए मिले क्योंकि हमारी भागने की स्पीड बहुत देर कायम नही रह पायी जबकि वे कछुआ चाल से चलते रहे । मै इस स्पीड में आराम करने के लिये कभी नही रूकता हूं बस फोटो खींचने के लिये रूकता हूं और वही मेरा आराम होता है । ये समय का सदुपयोग भी है और यकीन मानिये आप अपने हष्ट पुष्ट साथी से बहुत पीछे नही रहेंगें ।

इसके बाद भी यदि आप चाहते हैं कि आप ट्रैक पर मस्ती से चलें और कोई दिक्कत ना आये तो कुछ तैयारियां भी जरूरी हैं । खासकर यदि ट्रैक मोडरेट या हार्ड श्रेणी का हो तो । 

बर्फ में चलने का सपना सबका होता है पर जब बर्फ में चलना पडता है तब पता चलता है कि बर्फ में चलना कितना ​कठिन है । एक बर्फ तो होती है जमी हुई उस पर ज्यादातर फिसलने का ध्यान रखना होता है जबकि एक बर्फ होती है ताजी गिरी हुई । इस बर्फ पर भी इतनी दिक्कत नही होती है । एक बर्फ होती है ताजी गिरी हुई लेकिन जिस पर पहले ज्यादा चला ना गया हो या रास्ता काटकर चलने की बजाय आप सीधे उसी में पैर रखकर चल रहे हों । ऐसी बर्फ जहां दो फुट भी हो और धूप पडने की वजह से मुलायम हो गयी हो और आपका पैर उसमें रखते ही धंस जाये ऐसी बर्फ सबसे ज्यादा खतरनाक और मेहनत वाली होती है । इस बर्फ में चलने पर थकान ज्यादा होती है क्योंकि आपको पैर बहुत उंचा उठाना पडता है बर्फ से निकालने के लिये ।

तो मै बता रहा था कि फिर भी तैयारी करनी चाहिये । उन तैयारी में सबसे मुख्य बात होती है स्टेमिना बढाने की । ट्रैक करते समय ध्यान रखने वाली कुछ बाते —

1-  ट्रैक से कुछ दिन पहले पैदल चलना चाहिये । पैदल चलने की क्षमता आपके ट्रैक के अनुसार हो सकती है । पुराने मैनुअल तरीके वाला ट्रैडमिल यानि जो मोटर के बिना चलता है वो इसमें आपके बहुत काम आयेगा । इसके अलावा साईकिल चलाना बेस्ट आप्शन है खासकर उनके लिये जिन्हे उतरते समय परेशानी होती है । पन्द्रह दिन पहले से साईकिल चलाईये और आप ट्रैक पर आसानी से चलते जायेंगें । हां एक बात ध्यान रखने की है कि शुरूआत में कम चलें या साईकिल चलायें और बीच के दिनो तक उसे बढाकर ज्यादा से ज्यादा करें । इसके बाद ट्रैक का समय नजदीक आने पर उसे घटाना शुरू कर दें जो भी अभ्यास आप कर रहे हैं । ट्रैक पर जाने से तीन दिन पहले बहुत ज्यादा थकान वाला अभ्यास नही करना चाहिये ।

2-  मध्यम या उससे उपर की श्रेणी के ट्रैक के लिये आपको धूम्रपान और शराब को छोड देना चाहिये तो और ज्यादा बढिया रहेगा । इसके अलावा 2000 मीटर के उपर शराब बिलकुल नही लेनी चाहिये ।


3 - बढिया कम्पनी की स्टिक साथ रखनी चाहिये । ये कई मामलो में मददगार होती है सिर्फ सहारा देना ही इसका काम नही होता । बर्फ वगैरा में इससे गहराई देखी जा सकती है , उतरते समय फिसलने से बचने के लिये पहले इसे रखकर अपना भार इस पर दिया जा सकता है और भी बहुत सारे काम ये करती है । आपके साथी को हाथ पकडने की तरह आप इसे काम में ले सकते हैं और किसी जानवर के सामने आने पर भी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं ।

4- ट्रैक पर पानी पीने में ये ध्यान रखें कि पानी एक साथ ना पियें । घूंट घूंट करके पानी पीना बेहतर होता है क्योंकि शरीर गर्म हो जाता है और अक्सर पहाडो में पानी का तापमान ठंडा होता है । टाफी जरूर रखनी चाहियें अपने साथ क्योंकि यदि पानी कम हो तो कुछ देर टाफी चूसकर आप काम चला सकते हैं । टाफी चूसते रहने से एकदम से गला खुश्क नही होता है क्योंकि कई ट्रैक ऐसे हैं जहां पर पानी की दिक्कत होती है । इलैक्ट्राल पाउडर का पैकेट पानी में डालकर पीने से कई फायदे होते हैं और ये ज्यादा वजन या पैसे का भी नही होता है । इस पाउडर में कई स्वाद भी आते हैं तो इसे अपनी पानी की बोतल में डाल कर पीते रहिये और आपको पानी की कमी महसूस नही होगी साथ ही एनर्जी भी मिलेगी । ये आईडिया पैकेटबंद जूस या माजा आदि की बोतलो को ढोकर ले जाने से ज्यादा बढिया है ।

5-  आपको अपना सामान कम से कम रखना चाहिये । ट्रैक पर जाने का मतलब है फैशन से बिलकुल मुक्ति । इसके चक्कर में आपका वजन ज्यादा हो जाता है भले आप के साथ पर्सनल पोर्टर ही क्यों ना हो वो भी इंसान ही होता है और खच्चर भी जानवर होता है इनमें से कोई भी मशीन नही होती जिस पर आप अनलिमिटेड ट्राई कर सकें ।

तो ये तो थी ट्रैक पर जाने और उसकी तैयारी करने से संबंधित बातें  किसी कमी या सुझाव का इंतजार रहेगा । 



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