Ujjain maheshwar yatra by Aditya vashishth

आदित्य वशिष्ठ मित्र हैं फेसबुक पर और अपनी यात्राऐं फेसबुक पर ही लिखते रहते हैं । पहली बार उनकी एक यात्रा को मै यहां पर ब्लाग में आपके सामने ...

आदित्य वशिष्ठ मित्र हैं फेसबुक पर और अपनी यात्राऐं फेसबुक पर ही लिखते रहते हैं । पहली बार उनकी एक यात्रा को मै यहां पर ब्लाग में आपके सामने रख रहा हूं । गेस्ट पोस्ट के रूप में इनका उत्साह बढाईयेगा । लेखनी अनगढ है और जहां तक मुझसे हो सका मैने कुछ सुधार किये हैं । पर पहली बार में बहुत सारी बातें होती ही हैं । आपके प्रेम से ही भरोसा और उत्साह बढेगा
आदित्य वशिष्ठ जी के बारे में -आदित्य वशिष्ठ जी फिरोजाबाद उ0प्र0 के रहने वाले हैं । अन्य कार्यो के अलावा घुमक्कडी भी इनके मन में बसी है और अक्सर नयी जगहो की तलाश में निकल पडते हैं । आप इनसे सम्पर्क कर सकते हैं ।

ये इनके फेसबुक , यू टयूब चैनल , और ई मेल का लिंक हैं

उज्जैन और महेश्वर यात्रा  

मई कि शुरूआत में ही एक दिन आश्रम पर र्बैठे बैठे विचार बना कि चलो उज्जैन में कुम्भ स्नान के लिए चला जाए | मेरे साथ मेरे ही परिचित हरिवंश जी चौहान थे जिन्हे हम स्वामी जी भी कहते हैं क्योंकि चौहान जी फक्कड प्रवृत्ति के हैं मनमौजी आदमी । हम दोनो टीवीएस की स्पोर्टस मोटरसाईकिल से इस सफर को शुरू करने वाले थे । घर से निकलते निकलते शाम के 4 बज गये और अँधेरा हो जाने के कारण भाई सत्यपाल चाहर जी के घर पर धौलपुर में  प्रथम रात्रि विश्राम हुआ । जितना भाई को जाना और समझा था वो भी केवल सोशल मीडिया के माध्यम से आज जाना के आभासी दुनिया के भी बड़े भाई का प्यार और स्नेह वास्तबिक दुनिया के भाई जैसा ही होता है। पूरी तरह अभिभूत कर दिया भाई ने | आभासी दुनिया से निकालकर बास्तबिक दुनिया में ऐसा स्नेह और प्यार शायद कोई वास्तविक दुनिया का संबंधी नही दिखला पाता जैसा प्यार भाई सत्यपाल ने दिखाया । भाई से अब जीवन भर का सम्बन्ध हो गया है| शब्दों की कमी से जूझ रहा हूँ कैसे वर्णन करूँ भाई के प्रेम का, स्नेह का और उस इज़्ज़त अफजाई का जो भाई ने मुझे दी  अगली सुबह यात्रा फिर से शुरू हुई और एक नया पड़ाव आया लेकिन सत्यपाल भाई को शायद कभी न भूल पायेंगे क्युकी इस यात्रा कि सफलता बिना सत्यपाल भैया के हो ही नही सकती थी ये पूरे सफर में हमारे गूगल मैप बने रहे और इनके बिना हम एक कदम भी आगे न जा पाते
दूसरा दिन
सुबह सत्यपाल चाहर भाई भाई के घर से निकले और उनके  बताये अनुसार सबसे पहले शेरगढ़ किला और प्राचीन हनुमान जी मंदिर देखा फिर तो सीधा ग्वालियर जाकर रुके। ग्वालियर में थोड़ा चाय नाश्ता किया और गाडी आगे बढ़ा दी | पहले विचार था कि ग्वालियर का किला देख कर ही आगे बढ़ा जाए पर हमारे स्वामी जी कि जिद थी कि जल्द से जल्द उज्जैन पहुंचना है और इसीलिये हमने वापसी में ग्वालियर किला देखने का निर्णय लिया | धूप काफी तेज़ हो गयी थी और हवाऐं तो जैसे हमें रोकने के लिए ही चल रही थी । रास्ते में घाटीगांव नामक जगह पर गुर्जर समाज का भव्य मंदिर देखकर कुछ देर आराम के लिए रुके तो फिर शाम को 3 बजे तक वहां से निकलने का मन ही नही हुआ लेकिन फिर वही रास्ते में अँधेरा होने का डर हमें मंदिर से बाहर आकर अपनी मंजिल के लिए निकलना पड़ा |

रास्ते में 11 मुखी हनुमान जी के दर्शन हुए और उसके तुरंत बाद हलकी बारिश होने लगी गुना अभी भी 55 km दूर था | रास्ते में एक दूकान पर बारिश से बचने के लिए रुके तो पाया कि दूकान के अंदर छोटा सा ढाबा भी है भाई अंधे को क्या चाहिए 2 आँखे , हमने और स्वामी जी ने वहीँ पर आसन जमाया और भर पेट खाया | बारिश रुकने पर हमने जब अपनी गाडी उठायी तो पता चला गाडी पंचर हो गयी है फिर तो जो स्वामी जी ने मुझे लेक्चर सुनाया  | लगभग 5 किलोमीटर गाडी खींची फिर सडक किनारे एक दूकान के बाहर सो रहे एक आदमी को जगाकर काफी मन मनौवल और मुंहमांगे पैसे देने पर पंक्चर जुड़वाया | रात्री को जब हम गुना पहुंचे तो लगभग १० बज चुके थे | हमारे सामने समस्या कड़ी हो गयी कि हम इतनी रात को जब सारा बाज़ार भी लगभग बंद हो चूका था कहाँ जाएँ ? ऐसे समय पर एकबार फिर से काम आये हमारे सत्यपाल दादा
दादा ने हमें गुरूद्वारे जाने को कहा और हम तुरंत गुरूद्वारे पहुँच भी गये | वहां पहुंचकर रुकने कि बात करली लेकिन एक बार फिर स्वामी जी ने अपना प्रचंड रूप दिखाया और गुरूद्वारे के सेवक के मना करने पर भी  अपनी चिलम हाथ में ले ली ।  सेवादार हमें धक्के मारकर बाहर निकाल ही देता अगर वहां स्वामी जी से मांफी मंगाकर उनकी चिलम तम्बाकू सहित  कूड़ेदान में न फिकवा देता , खैर सेवादार को दया आई और हमको सर छुपाने कि जगह मिल गयी

तीसरा दिन  

सुबह उठाकर हम दोनो लोग नहाकर तैयार हुए और जब मै गाडी बाहर निकाल रहा था तो मैंने देखा कि स्वामी जी उसी कूड़ेदान से अपनी चिलम तम्बाकू निकाल रहे है | मैंने तत्क्षण स्वामी जी को साष्टांग प्रणाम किया और आगे का सफर आरम्भ कर दिया
उज्जैन यात्रा के क्रम में मध्य प्रदेश की ग्रामीण संस्कृति को करीब से जानने का मौक़ा मिला । मैंने पाया कि हर गाँव में एक भव्य और विशाल मंदिर या गाँव के बाहर किसी सन्यासी का आश्रम अवश्य है ।ये मंदिर गाँव के सांस्कृतिक माहौल को श्रद्धामय और धार्मिक आकार प्रदान करते है । गाँव के इन मंदिरो में नियमित पूजा अर्चना लोगो को साथ रहने के लिए प्रेरित करती है । मैंने अपनी यात्रा के दौरान धूप से बचने के लिए इन मंदिरो में ही आश्रय लिया और अपने आध्यात्मिक ज्ञान में भी थोड़ी सी वृद्धि की । इन मंदिरों पर रहने वाले साधू सन्यासी यहाँ आने वाले सभी आगुन्तको का यथायोग्य सत्कार और जिज्ञासा निवारण भी करते हैं |
उज्जैन से 7 किलोमीटर पहले से ही भीड़ दिखना शुरू हो गई । ये भीड़ जिसमे बमुश्किल 10 % पुरुष और बाकी महिलायें थी जो  सर पर बोझ लेकर पिंगलेश्वर महादेव की पंचकोसीय परिक्रमा कर रहीं थी । हम उज्जैन पहुँच तो गए थे लेकिन हमने इस यात्रा कि कोई पूर्व योजना नहीं बनाई थी लेकिन इसे भोलेनाथ का आशीर्वाद ही कहा जाएगा कि इतना लम्बा ये सफर बगैर किसी बाधा  के पूरा हो गया | उज्जैन पहुंचते पहुंचते  पहुँचते रात हो गयी थी और एक बार फिर हमारे काम आये बड़े भाई सत्यपाल चाहर
जब हम धौलपुर से निकले थे तभी सत्यपाल दादा ने हमें कुछ लोगों से अवश्य मिलने को कहा था | भाई की सहायता से हमारा संपर्क हुआ कुम्भ मेले में उज्जैन में ही पोस्टेड भाई जितेन्द्र सिंह से | आज के इस समय में जब रिश्ते नातों से इंसान का भरोसा उठता जा रहा है तब जितेन्द्र भाई और सत्यपाल दादा जैसे लोगों का मिलना भारी सूखे के बाद हुई बारिश जैसा अहसास दिलाता है । दुनिया अच्छे लोगों से भरी पड़ी है बस जरुरत है तो उन लोगों तक पहुँचने की । जीतेन्द्र भाई कुम्भ मेले में एक बड़े प्रशासनिक पद पर थे लेकिन जिस आत्मीयता से भैया ने हमारा ख्याल रखा हमारे मेले में घूमने और रुकने कि व्यवस्था की उसका मै हमेशा ऋणी रहूँगा
मध्य प्रदेश सरकार भी  बधाई की पात्र है जिस प्रकार उसने ये कुम्भ मेले की व्यवस्था की । पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों का रवैया जनता के प्रति बहुत सहयोगी था । हर 10 कदम पर ठन्डे पानी के प्याऊ उपलब्ध थे। एक चीज जो मैंने इस मेले में गौर की वो ये कि किसी भी दुकानदार या अखाड़े या पंडाल वाले को लाउडस्पीकर बजाने की अनुमति शायद नहीं थी जिससे कि पूरे मेले में शांति का माहौल महसूस हो रहा था ।
सड़को पर पर्याप्त मात्रा में नोटिस बोर्ड लगाए गए थे जनता को रास्ता ढूँढने में कोई दिक्कत नही हो रही थी । एक विशेष व्यवस्था कि गयी थी जिससे क्षिप्रा नदी मे पर्याप्त पानी था । पार्किंग की व्यवस्था भी बढ़िया थी ।

कुल मिलाकर फिरोजाबाद से उज्जैन तक कि ये यात्रा बहुत ही उत्साहबर्धक और शिक्षाप्रद  रही |इसके बाद हमने महेश्वर में घूमने का प्लान बनाया और पहुंच गये । महेश्वर नगर के बारे में कुछ बाते आपको बताना चाहता हूं ।

महेश्वर नर्मदा नदी के तट पर बसा मध्य प्रदेश के जिला खरगोन का एक छोटा व शांत नगर है | इसका पौराणिक नाम महिष्मति है | महेश्वर का गौरवशाली इतिहास, प्राकृतिक सौन्दर्य पर्यटकों और सैलानियों को बरबस आकर्षित करता है | लगभग 4000 वर्ष पूर्व इक्ष्वाकु वंश के राजा मुचुकुन्द ने अपने पिता मान्धाता की स्मृति में नर्मदा तट पर ओंकारेश्वर को बसाया था, मुचुकुन्द के 100 वर्ष बाद हैहयवंशी माहिष्मान ने ओम्कारेश्वर (तब का मान्धाता) से 40 मील पश्चिम में नर्मदा तट पर महेश्वर को अपनी राजधानी बनाया |
महेश्वर का किला नर्मदा के तट से लगभग 500 फुट की ऊंचाई पर पीली पाढर नामक मिटटी के टीले पर बना हुआ है | किले की परिधि लगभग 2 किमी है और किले में 5 दरवाजे हैं | उत्तर में 2 दरवाजे है पहला अहिल्याद्वार और दूसरा पेशवा मार्ग पर कमानी दरवाजा |


किले की प्राचीर में लगभग 20 बुर्ज बने हुए हैं | किले के प्रत्येक दरवाजे के बीच में गजानन गणपति विराजमान हैं जिससे ये सिद्ध होता है की इस किले का निर्माण किसी हिन्दू राजा ने करवाया है | उत्तरी प्राचीर में 3.5 फुट ऊँची चिंतामणि गणेश की मूर्ती है जिसे गढ़गणपति भी कहते हैं |चौथी से पांचवीं शताब्दी बीच सुबंधु और महेश्वर नामक दो राजाओं ने महेश्वर को अपनी राजधानी बनाकर फिर से बसाया था, शायद इनमे से ही किसी एक ने महेश्वर किले का निर्माण कराया होगा |

Guest Post-




महेश्वर राजवाड़े का वो स्थान जहाँ से जमीन के अंदर से उज्जैन, माण्डव और ओम्कारेश्वर को जाने की सुरंग मार्ग था अभी इसे सुरक्षा कारणों से बंद किया हुआ है ।

अतिप्राचीन नगरी श्रीमहिष्मति महेश्वर स्थित श्री होलकर रियासत , इन्दुर / इन्दौर की राजधानी का प्रवेश -द्वार जो आज भी इतिहास का साक्षी बन मुल रूप मे पिछले 400 वर्षों की यादें समैट खड़ा है
देवी श्री अहिल्या बाई होल्कर के किले का मुख्य द्वार, जो कि आज भी अपनी जीवटता और अडिग सिपाही की भांति आगंतुको का स्वागत करता है



लोकमाता अहिल्याबाई होलकर की शाही पालकी जो शाही होते हुए भी आम है ।इससे ही लोकमाता की सादगी का पता चलता है ।

नर्मदा में प्रवाहित करने के लिए तैयार रखे हुए शिवलिंग , प्रत्येक तख्ते पर 1008 शिवलिंग और कुल 15 तख्ते है इस मंदिर में ,इस प्रकार प्रतिदिन 15108 शिवलिंग प्रवाहित किये जाते हैं ।

महेश्वर के प्राचीन शिव मंदिर में सुबह के वक़्त का वो दृश्य जब पुजारी लोग प्रतिदिन 15108 शिवलिंग नर्मदा में प्रवाहित करते है ।प्रवाहित करने के लिए शिवलिंगों का निर्माण करते हुए ।
प्रत्येक शिवलिंग के ऊपर एक एक चावल का दाना भी होता है । ये परम्परा बहुत प्राचीन है ।


लोकमाता अहिल्याबाई होलकर द्वारा निर्मित कराये गए श्री ओम्कारेश्वर मंदिर का पिछला भाग
इसका निर्माण सन् 1740 में हुआ

महेश्वर के प्राचीन मंदिर के परिक्रमा मार्ग का एक दृश्य
रखरखाव के आभाव में मंदिर ने अपनी चमक भले खो दी हो पर अपनी भव्यता और विशालता से ये आज भी हमारा मन मोहने की क्षमता रखता है
आदित्य वशिष्ठ
गोबर गणेश मंदिर
काशी विश्वनाथ मंदिर के अंदर का दृश्य




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Ujjain maheshwar yatra by Aditya vashishth
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