Kedarkanth trek blog , Base camp to sankri and delhi

केदारकांठा बेस कैम्प पहुंचने पर दो झौंपडी बनी दिखायी दी । इसके अलावा वहां पर 15 से 20 बंदे थे जो नीचे की ओर उतरने की तैयारी कर रहे थे...


केदारकांठा बेस कैम्प पहुंचने पर दो झौंपडी बनी दिखायी दी । इसके अलावा वहां पर 15 से 20 बंदे थे जो नीचे की ओर उतरने की तैयारी कर रहे थे । हमारे में से सबसे पहले राकेश भाई पहुंच गये थे जो उसी झौंपडी में आग सेंक रहे स्वर्गारोहिणी एडवेंचर के प्रशांत से मिलकर अपनी पर्ची दे चुके थे । वैसे तो हमारा दोपहर का खाना तय नही था और पहुंचने पर चाय स्नेक्स तय थे लेकिन उन लोगो ने अभी तक खाना नही खाया था और हमारे पहुंचने के बाद हम सबसे पहले चाय पी और थोडी देर बाद ही दाल चावल आ गये । हम लोगो ने परांठे खा लिये थे पर फिर भी थोडे थोडे दाल चावल ले लिये । प्रशांत ने अपना काम शुरू किया है और यहीं पर डेरा डाल दिया है । उसकी कंपनी लोकल है और प्रशांत यहां पर आइस स्केटिंग या स्कींइंग कराता है । इस क्षेत्र में कुछ नया करने की हसरत लिये है और इसीलिये पूरी सर्दी यहां पर डेरा डालने की प्लानिंग है तब भी जबकि यहां से बाकी सब लोग जा चुके हैं और मार्च से पहले नही आयेंगें ।प्रशांत से रात के दस बजे तक भी बहुत सारी बाते हुई और इसी बहाने पता चला कि बंदा उत्तराखंड के बडे से छोटे तक सभी ट्रैक कर चुका है ।

राकेश भाई के जूतो में बर्फ घुस गयी थी और हमारे भी जूते गीले हो गये थे । आग के पास आकर राहत मिली और मुझे तो इतना आनंद आया कि मै तो वहीं पर मौजूद एक स्लीपिंग बैग लेकर उसमें घुस गया और एक घंटा सोया । राकेश भाई और जाट देवता चोटी पर जाने का रास्ता देखने चले गये और काफी दूर तक उस पर होकर आये । हमारे आने के समय जो लोग यहां पर दिख रहे थे वे वही यूथ हास्टल वाले थे जो अपने ग्रुप में उत्साही और तेज चलने वाले थे और उन्होने ये ठान लिया था कि हमें कम से कम बेस कैम्प तक तो जाना ही है । उनमें से दो तीन लडकियां थी जिनकी तबियत काफी खराब हो चुकी थी और एक लडकी को तो तीन आदमी पकडकर ले चल रहे थे । आगे नीचे उतरना था और वो भी बर्फ में ऐसे वो लोग कैसे ले जायेंगें उसे सोचने की बात थी । पन्द्रह मिनट बाद ही सब लोग दिखने बंद हो गये और अब हमारे अलावा यहां पर कोई नही था । वो लोग भी यहां पर रूके नही थे रात को सुबह जुडा का तालाब से आये थे और कुछ समय रूककर हरगांव की तरफ चल दिये थे । आज रात वो हरगांव रूकेंगें क्योंकि पैकेज कंपनियो के लिये ये ट्रैक 3 दिन का होता है ।

प्रशांत से हमने पूछा कि समिट यानि पीक की चढाई हो रही है तो उसने बताया कि दो दिन से वहां कोई नही गया है और इस बीच बर्फ भी काफी पडी है । हमारे बात करते करते ही चार बजे के करीब बर्फ पडने लगी और एक घंटे तक पडती रही । उस वक्त मौसम खराब हो गया और पांच बजे फिर से धूप निकल आयी । हमने भी बर्फ पडने का पूरा मजा लिया और फोटो खिंचवाये । तो उसी बात पर वापस आता हूं कि प्रशांत ने मना तो कर दिया पर साथ ही ये भी कहा कि रास्ता बना हुआ था तो अभी भी निशान तो मिलते जायेंगें । एक जगह रास्ता भटकने की गुंजाइश है वो भी उसने बता दी । मेरा मन तभी दो तीन बातो को सोचने लगा । हमें यदि पीक पर जाना है तो सुबह 4 बजे निकलना होगा ये तय था क्योंकि अक्सर दस बजे के बाद पहाडो में इतनी उंचाई पर मौसम खराब हो जाता है और आजकल तो खराब तो था ही साथ ही मौसम विभाग की चेतावनी भी मिली हुई थी । दूसरी बात ये थी कि हमारे साथ कोई नही जाने वाला था कोई भी नही , ना कोई ग्रुप ना कोई पोर्टर या गाइड । तीसरी बात कि पूरे रास्ते कहीं भी कुछ भी रूकने या छिपने के लिये नही था और चौथी बात की ये सब और दुस्वप्न हो सकता था क्योंकि 4 बजे से 7 बजे तक यहां पर अंधेरा ही रहता है । एक राहत की बात बस ये थी कि पूरी चांदनी रात थी और रात को हमने देखा कि सब कुछ आराम से दिख रहा था बस किसी छोटी सी लीक पर चलने के लिये रोशनी जरूर चाहिये थी या बर्फ में बने गढढे ​देखने के लिये ।

राकेश भाई एक माथे पर लगाने वाली लाइट लाये थे जिसकी लाइट काफी तेज थी और ये काफी काम आने वाली थी । इसके अलावा राकेश भाई के हाथ में एक विदेशी घडी थी जो उचाई और तापमान बताती थी । उसके अनुसार रात को यहां पर तापमान माइनस दस था और सुबह पीक पर माइनस 16 था । शाम को बर्फबारी में घूमने के बाद मै तो झौंपडी में घुस गया तो निकला ही नही । प्रशांत ने पहले ही पूछ लिया था कि अलग सोना पसंद करोगे या इसी झौंपडी में तो हम सबने एक सुर में यहीं के लिये कह दिया क्योंकि यहां पर आग जल रही थी और 12 बजे तक वो जलती रही जिसकी वजह से सर्दी ज्यादा नही लगी । इसके अलावा प्रशांत के पास स्लीपिंग बैग बढिया वाले थे । मैने बहुत सोचने के बाद जाट देवता और राकेश को कह दिया कि मै सुबह नही जा रहा अगर आप जाना चाहते हो तो जा सकते हो आपको रोकूंगा नही । जाट देवता और राकेश ने जाने का फैसला किया और वहां पर मौजूद रसोईये को बता दिया कि सुबह उठा देना और नाश्ता बना देना । रात के 12 बजे तक प्रशांत और उसके तीन साथी ​बात करते रहे तो नींद नही आयी । तीन बजे उठकर नाश्ता आदि करके 4 बजे जाट देवता और राकेश भाई निकल गये । मेरी 7 बजे नींद खुल गयी और उसके बाद भी मै स्लीपिंग बैग में पडा रहा । और सब भी उठ चुके थे और इसी बीच चर्चा शुरू हो गयी पीक पर आने जाने की

प्रशांत भाई की हमारी बात कल भी हुई थी । उनका कहना था कि यहां से पीक साढे 5 किलोमीटर है । हम अभी 3100 मीटर के लगभग पर थे और केदारकंठा की उंचाई 3800 मीटर बताते हैं जो कि बढाकर बतायी जाती है । बेस कैम्प को भी 3400 मीटर बताया जाता है । इस रास्ते के लिये प्रशांत भाई का अनुमान था कि 5 घंटे में जाना और तीन घंटे में आना यानि सुबह 4 बजे चलकर दोनो 12 बजे तक आ जायेंगें । उन्हे पता नही था कि जाट देवता भयंकर से भी भयंकर ट्रैकर है और हमारी वजह से वो आराम से चल रहा था वरना उसकी स्पीड पहाडियो को भी माफ करती है । ठीक 9 बजे जब हम सब स्लीपिंग बैग में बैठे चाय पी रहे थे जाट देवता और राकेश भाई चोटी को फतह करके आ गये । प्रशांत हैरान था कि इतनी टाइम में केवल पहाडी लोग ही कर पाते हैं मैदान का तो कोई कोई ही कर पाता है । राकेश भाई का पीक का फोटो लगा दिया है और उन्होने वीडियो अपने यूटयूब पे डाले हैं जिनका लिंक मै पोस्ट के लास्ट में दे रहा हूं ।

यहां पोटटी का जिक्र भी जरूरी है ।😆 शाम को ही प्रशांत से पूछा ​था कि पोटटी किधर को जाना है तो उसने बताया कि सामने जंगल दिख रहा है घना वहीं बैठ जाना कहीं और जब मैने पूछा कि धोना कैसे है तो उसने कहा कि बर्फ का गोला बनाना और पोंछ लेना । बहुत देर तक हंसते रहे हम और उसके बाद उसने पेपर रोल का एक टुकडा दिया कि अगर उस तरीके से दिक्कत है तो इसे ले जाओ लेकिन मैने वो भी नही लिया । आज तक एक ही बार ऐसा मौका आया है जब मुझे पेपर का इस्तेमाल करना पडा है पर अब लगता है कि अगर लंबी दूरी की विमान यात्रा करनी पडी तो कैसे होगा । वैसे रूपकुंड में भी पानी गरम करके दे दिया था पर यहां तो बडी दिक्कत थी । पानी की बोतलो में पानी जम गया था । हमें जो रात को पीने को पानी मिला वो आग के पास एक कनस्तर रखके उसकी बर्फ को पिघलाकर उस गर्म पानी में पानी की बोतल रखकर दिया गया था । मै तो पोटटी गया ही नही क्योंकि मुझे पता था कि इतनी जल्दी ये लोग आ गये तो अब नीचे जा के ही करूंगा😂


अनुमान को धता बताते हुए मौसम आज भी सुबह से साफ था और अब जबकि 9 बजे वापस आना हो गया था तो हमने फिर यहां पर रूकना उचित नही समझा । इस बीच कुछ देर खाना बनाने की वजह से हम रूके और जाट देवता के कारनामो पर चर्चा हुई । मै और जाट देवता पहली बार रूपकुंड के ट्रैक पर गये थे । मै पहले दिन बेदिनी से पातर नौचनिया जाकर रूका था और जाट देवता शाम के 4 बजे उसी दिन वाण पहुंचे थे । मै अगले दिन जब रूपकुंड होकर आ रहा था तब जाट देवता ने मुझे पकड ​लिया और जब तक मै बेदिनी पहुंचा तो वे भी होकर वापस आ गये । एक दिन में 60 किलोमीटर से उपर चले होंगें उस दिन । मै भी 45 किलोमीटर चला । उसके बाद भी जाट देवता ने मुझे जबरदस्ती चोपता ले गये और तुंगनाथ और चंद्रशिला कराया । रूपकुंड जैसा ट्रैक डेढ दिन में करने के बाद कोई और ट्रैक करना बावलो का ही काम है और ये बंदा पूरा पागल है इस मामले में । उसके बाद हमने मणिमहेश और करेरी गांव के ट्रैक भी साथ में किये ।

11 बजे खाना पीना खाकर हम वापस चल पडे सांकरी के लिये । 3029 मीटर बेस कैम्प से जुडा का तालाब 2786 तक 45 मिनट में पहुंच गये कोई दिक्कत नही आयी । यहां से दिक्कते शुरू हुई । अब तक रास्ते पर धूप आ चुकी थी और घने जंगल को छोडकर बाकी जगहो पर फिसलन बन गयी थी बहुत बुरी । कल से अब तक इतना बुरा हाल नही देखा था । आज स्टिक ना होती तो पता नही क्या होता क्योंकि स्टिक के बाद भी मै कम से कम 5 बार फिसला । इसमें से 4 बार तो इसलिये ज्यादा दिक्कत नही हुई क्योंकि मेरे पीछे बैग ने कोई चोट नही लगने दी पर एक बार तो पत्थर पर ​पैर लगे तो काफी देर दर्द रहा । जैसे जैसे सांकरी नजदीक आता गया रास्ता और बदतर होता गया क्योंकि बर्फ कम होती गयी और केवल फिसलन और पानी जिसमें कि मिटटी भी मिलकर कीचड हो गयी थी और कहीं से ​भी निकल लो गिरने की गुंजाइश हर तरफ ​थी । जाट देवता भी मुश्किल महसूस कर रहे थे क्योंकि वे सादे स्पोर्टस के जूते पहने थे जिनका तला बिलकुल सपाट था । मेरे और राकेश के पास थोडे ठीक वाले जूते थे पर ये भी इस ट्रैक के लिये नही थे


आज चाय वाले महाशय भी गायब थे क्योंकि अब किसी पर्यटक को आना नही था तो वे यहां पर रहकर क्या करते । जब हम सांकरी पहुंचने वाले थे तब हमें कल वाले बंदे मिले जो कि कल जुडा का तालाब से चले थे और रात को हरगांव रूके थे । उनकी हालत बहुत ही ज्यादा खराब थी । जुडा का तालाब तक बर्फ ज्यादा थी तो आराम से भागे आ रहे थे । बर्फ कम होने और फिसलन बढ जाने से स्पीड बहुत धीमी हो गयी और दो बजे हम सांकरी अपनी गाडी के पास पहुंच गये । यहां आकर सबसे पहले होटल में पोटटी की और उसके बाद हमने वापिस चलना शुरू किया । एक इरादा ये भी हो रहा था कि नाग टिब्बा रास्ते में पडेगा तो उसे भी करते चलें पर फिर 3 में से दो के मना करने के बाद ये प्रस्ताव सर्वसम्मति से खारिज हो गया । बस फिर क्या था मजे से चलते रहे और रात को विकासनगर से थोडा पहले खाना खाया और दो बजे रात को जाट भाई को छोडकर मै अपने घर पहुंच गया ।

कुल मिलाकर ये हमारा तीन दिन का दिल्ली से दिल्ली कार्यक्रम रहा जिसमें एक दिन जाने का पूरा और एक दिन बेस कैम्प तक ट्रैक , तीसरा दिन बेस कैम्प से सांकरी और वहां से दिल्ली का रहा । ट्रैक पूरा होने में डेढ दिन भी नही लगा । हमारा प्रति व्यक्ति खर्च 2900 रूपये आया जिसमें से

3000 ट्रैक का खाना पीना रहना
600 रूपये होटल एक रात सांकरी
2700 रूपये पैट्रोल
400 रूपये सीएनजी
1000 रूपये खाना दो बार , यमुनानगर जाते समय दोपहर और विकासनगर आते समय रात का

ये 7300 रूपये था मोटा मोटा खर्च और बाकी 1400 रूपये खर्च हुए अमरूद , चाय आदि , टोल टैक्स , सांकरी का खाना 180 और परांठे नाश्ते के और अन्य छोटा मोटा खर्च

टोटल 8700 रूपये
राकेश विश्नोई जी का यू टयूब का लिंक
केदारकंठा पहला भाग
केदारकंठा दूसरा भाग 
केदारकंठा चोटी भाग 3 

Kedarkantha Tadkeshwar-






सांकरी की साइड दिखता नजारा , नीचे को ही हरगांव जाते हैं
हमारा ठिकाना
सेल्फी , बडे कैमरे से
राकेश भाई के जूते सूखते हुए
केदारकांठा पीक
केदारकांठा पीक
रात को मिली गरमागरम रो​टियां
वापसी बेस कैम्प से जुडा तालाब की ओर
वापसी बेस कैम्प से जुडा तालाब की ओर
पत्थरो पर जमी बर्फ और कीचड का हाल
पत्थरो पर जमी बर्फ और कीचड का हाल
सांकरी गांव दूर से दिखता हुआ
पहली धार पर सांकरी और उससे पीछे की धार पर तालुका गांव दस किलोमीटर दूर
मोरी के पास एक गांव सडक और नदी के पार
पुरोला के पास खूबसूरत नजारा

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