Auli-pangarchulla-Kuari pass-tapovan-Bhavishya badri -9

दिन के ढाई बजे मै खुल्लारा कैम्प साइट पर था और कल सुबह साढे दस बजे मैने औली से यात्रा शुरू की ...

दिन के ढाई बजे मै खुल्लारा कैम्प साइट पर था और कल सुबह साढे दस बजे मैने औली से यात्रा शुरू की थी और माता रानी की कृपा से मैने पंगारचुल्ल छोटी और कुआरी पास दोनो कर लिये थे । एक मन तो मेरा ये था कि इतना समय है कि मै नीचे तुगाशी गांव में उतरता हूं और करन के लिये मैसेज छोड देता हूं कि वो आ जाये । वो मुझे पकड लेगा क्योंकि मेरे पैर में भयंकर दर्द है और मै बहुत ही धीमे धीमे चल रहा हूं ।

मैने खुल्लारा साइट पर कैम्प लगाये बंदे से पूछा तो उसने बताया कि तुगाशी 3 किलोमीटर है और ढाक गांव 4 यानि यहां से सडक तक 7 किलोमीटर का सफर है । यहां पर आकर एक तो बात थी कि यहां पर रूकना मजेदार होने वाला था क्योंकि यहां पर कई लोग रात को होंगें । उस बंदे ने जिनका नाम मुकेश था मुझे गरमागरम चाय पिलायी और चाय पीते पीते मैने ये सोचा कि अब मुझे तीन किलोमीटर उतरने में भी 3 घंटे लग सकते हैं पैर में दर्द की वजह से पर कल सुबह चलूं तो हो सकता है उससे आधे में उतर जायें क्योंकि पैर को आज तीन बजे से कल सुबह 7 बजे तक आराम मिलेगा । बस यही बात क्लिक कर गयी और मै आराम से बैठकर मुकेश से बाते करने लगा । उसने मुुझे पूरी भी आफर की पर मैने मना कर दिया ।

यहीं बुग्याल में बीचोबीच पानी की धारा बह रही थी । मुकेश ने बताया कि सामने एक पत्थर है वहां पर नेटवर्क आता है आईडिया का तो मैने वहां पर जाकर काल करने की कोशिश की पर मेरी काल नही लगी अलबत्ता एक मैसेज किया तो वो चला गया । नेटवर्क ना होकर हवा में बहती हुई तरंग ही है पर वो भी एक पत्थर पर ही है । उपर जो ग्रुप गया था वो सेटेलाइट फोन ले गया था जबकि यहां पर मुकेश के पास में ऐसा ही फोन था ।एक तरफ को मै उपर को देखता कि ग्रुप वाले वापस आ रहे हैं कि नही और दूसरी तरफ की साइड को करन को देखता । साढे तीन बजे करन आ गया और हमने आपस में विचार करके उन लोगो के टैंट से थोडा दूर और पानी की धारा के पास पर उनके विपरीत साइड में अपना टैंट लगा लिया । करन ने तो मुकेश से लेकर पूरी भी खा ली । वो मेरी तरह नही था जो जरा सी खिचडी और एक बिस्कुट के पैकेट में पूरी यात्रा कर आया और अभी भी कुछ ना खाये । टैंट लगाने के बाद करन लकडी लाने थोडा सा उपर की ओर चला गया । मैने उसे साफ कह दिया था कि बोन फायर नही करना हमें और अगर करना भी होगा तो ये लोग करेंगें ही तो हम वहां पर ही हाथ सेक लेंगें ।

ऐसे ही कब छह बज गये पता ही नही चला और उस समय ग्रुप के लोग उपर से आते दिखे । साथ के लोग सब उपर पेडो के पास से एक दो लकडी उठाकर ला रहे थे । दोबारा उपर ना जाना पडे तो ये भी बढिया तरीका है । आते ही उन्होने बोनफायर शुरू कर दिया और मैने करन को बोल दिया कि अपना खाना बनाना शुरू करो । करन ने पहले सूप बनाकर मुझे और मुकेश को पिलाया । मुकेश ने जिद करी कि आज खाना हमारे साथ ही खाओ पर मुझे उसके इतने सत्कार के बाद भी मन नही था ।

मजबूरी की बात अलग है पर हमारे पास भले ही खिचडी है पर है तो सही । हमने तो अपनी वही खिचडी बनायी पर आज करन ने लाल और हरी मिर्च ले ली मुकेश से और साथ ही थोडा सा रिफाइंड भी । उसके मुताबिक कल बिना मिर्च के मजा नही आया था और ना आज सुबह । सात बजे तक हमारी खिचडी बनी और उधर उनका भी खाना तैयार हो रहा था । आज खिचडी के साथ चाय भी बनायी गयी और खिचडी खाते ही मैने सोने का ऐलान कर दिया । आज थकान थी और मुझे अब सोने के अलावा किसी चीज में रूचि नही थी । आठ बजे तक हम सो गये थे । रात को एक झटके की नींद तो ठीक आयी पर उसके बाद बुग्याल में शाम के समय से विराजमान दो कुत्तो की भौंकने की आवाज ने नींद खुलवा दी । शायद कोई जानवर था जिस पर वे पूरे गुस्से में भौंक रहे थे ।

चार बजे पडोसियो का स्टोव चालू हो गया तो फिर से नींद खुल गयी जो फिर आयी नही और पांच बजे तो मै टैंट से निकल आया । सिवाय ग्रुप की पार्टी के बाकी सब लोग जग गये थे यानि पोर्टर और कम्पनी के मुलाजिम और नाश्ता और चाय बन रहे थे । मुझे भी मुकेश ने गुड मार्निग बोलते हुए फिर से चाय पकडा दी । उनके बुजुर्ग गाइड साब जो कल बात नही कर पाये थे वो अब टैंट से निकलकर मेरे पास आये और उन्होने काफी बाते शेयर की और हमने नम्बर भी लिये । उन्होने बताया कि पंगारचुल्ल की पहली चोटी काफी खडी है आखिरी के 200 मीटर और बर्फ उस पर बहुत ज्यादा थी तो सौ मीटर पहले ही सब लोग वापस आ गये क्योंकि वापस आने के लिये भी टाइम ज्यादा हो रहा था ।



उन्होने बताया कि आजकल कम्पनी वाले जल्दी का टूर बना देते हैं तीन दिन का समय कम है इसे करने के लिये । फिर मुझसे पूछा कि तुम कब चले थे और जब मैने बताया कि कल तो वे चुप हो गये बोले कि आजकल की पीढी बहुत तेजी में रहती है ।

मैने उनसे पूछा कि सूर्योदय किसी समय होगा तो उन्होने बताया कि छह बजे और मै अपना कैमरा निकालकर बैठ गया । सूर्योदय हुआ तो पर उसने पूरा एक घंटा लगा दिया । इस बीच करीब 200 फोटो लिये मैने और इतना मस्त सूर्योदय मैने बहुत दिनो बाद देखा । यहां इस पोस्ट में भी सूर्योदय के फोटो कम से कम करके लगाने के बाद भी दस के आसपास हो गये हैं । इस बीच मुझे बहुत जोर का प्रेशर भी लग आया था पर जब तक सूर्योदय नही हो गया और धूप नही आ गयी तब तक मै नही गया । सात बजे जैसे ही सूर्योदय की बजाय धूप हो गयी मै कैमरा टैंट में रख उपर की ओर भागा । पोटटी भी 140 की स्पीड से आयी थी आज तो । उधर करन ने मैगी बना रखी थी । मैने फ्रेश् होने के बाद हाथ मुंह धोये और फिर चाय मैगी खायी । साढे सात बजे मै अपना बैग उठाकर चल दिया नीचे की ओर और करन टैंट पैक करने लगा । वो मुझे पकड ही लेगा और इस बुग्याल से नीचे भी एक और बुग्याल था जहां उतरते ही मुझे पता चल गया कि ये घुटने का दर्द में मामूली सी ही राहत मिली है ना कि पूरी तरह तो आज जबकि केवल उतराई ही उतराई है तो मुझे अपने पैर का ध्यान रखना होगा ।

उधर ग्रुप वाली पार्टी मेरे चलने तक सोकर ही उठी थी जबकि बाकी लोगो ने सामान समेटना शुरू कर दिया था । सारा साामान पांच घोडो पर आया था और वे ही लेने के लिये आयेंगें । मै धीरे धीरे उतरता रहा । कुछ दूर तक तो नार्मल उतराई थी और जंगल भी हल्का हल्का था । यहां पर चिडिया देखने और उन्हे कैद करने वालोे के लिये स्वर्ग है । मै तो बहुत धीरे चल रहा था इसलिये कुछ के फोटो ले भी लिये । बिना पूंछ का चूहा भी यहां पर काफी दिखता है । पर एक दिक्कत थी यहां पर यहां हर जगह छोटी छोटी मक्खियां घेर लेती थी रूकते ही । ये डास की तरह थी जो हमारे यहां पर बरसात में होती है और पसीने वाले को चिपक जाती हैं
दो तीन किलोमीटर के बाद उतराई शुरू हो गयी और वो भी खडी उतराई । बाप रे इतनी उतरने के बाद भी कोई जगह दिख नही रही थी कि आने को है । रास्ते में बहुत सारी लडकियां मिली जो किसी गांव से आ रही होंगी झूला घास लाने को । दूर से ही कहने लगी अंकल टाफी तो मैने इशारे से कहा कि यहां आ जाओ हमारे में हिम्मत नही कि वहीं जाकर दें । जब तक उनमें से दो तीन लडकियां आयी तब तक मैने अपने बैग से टाफी निकाल ली ।

थोडी देर बाद एक गांव दिखने लगा था और वो हमारे सामने इसी उंचाई पर था जो ​कि वहां तक जाना हो तो पहले घाटी में उतरना होगा नदी से तब उपर चढना होगा । मेरे हिसाब से हम सात किलोमीटर चल चुके थे और तीन किलोमीटर बाद आने वाला तुगाशी गांव अभी तक तो आया नही था । साफ था कि करन फिर से गलत रास्ते पर ले आया था । मरवा दिया भाई ने पर मै चलता रहा और फिर नेटवर्क आ गया मोबाईल में भी । सात बजे के चले और खडी उतराई उतरते उतरते साढे दस बज गये इस बीच ना पानी मिला ना गांव । अब नीचे घाटी दिखी बहुत सुंदर जिसमें दो गांव उपर नीचे उल्टे हाथ पर थे और एक गांव नीचे जबकि एक वही गांव जो उपर से दिखा था वो सीधे हाथ पर उपर की ओर था ।

करन की बजाय मैने एक भैंस चराने वाले से पूछा तो उसने बताया कि ये गांव रायगढी है और उल्टे हाथ पर उपर तुगाशी जबकि नीचे करछी गांव है । सीधे हाथ पर दिख् रहा गांव खरचा है और ढाक कहां है ये पूछने पर उसने बताया कि ढाक के लिये करछी को जाना पडेगा । यहां से रास्ता सीधे तपोवन जाता है । जो कि यहां से ढाई तीन किलोमीटर है ।

खुल्लारा कैम्प के बारे में उसने बताया कि यहां से नौ से दस किलोमीटर के बीच है । मै सोच ही रहा था कि शुरू में मै काफी तेजी से उतरा था और एक घंटे में तीन किलोमीटर तो आराम से औसत आ जाता है पर आज फिर से करन ने मुझे 7 की बजाय 12 किलोमीटर चलवा दिया था । करन का कहना था कि तपोवन से गाडी की सीट मिल जायेगी । वो अपनी बात को सही कहना चाहता था । मैने कुछ नही कहा और आगे चलते रहे । रायगढी से हमने नदी की धारा को पार किया और फिर चढाई आयी । चढाई के बाद काफी दूर तक करीब एक किलोमीटर प्लेन रास्ता था और उसके बाद एक मोड से तपोवन दिखने लगा । तपोवन तक तो मेरा पैर जवाब दे चुका था और साढे ग्यारह बजे मै तपोवन की सडक पर था

Kuari pass-



lovely sunrise
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सबसे पहली किरण नीलकंठ पर्वत पर
lovely sunrise
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मैगी बनकर ढकी रखी है चाय बन रही है
lovely sunrise
उपर पंगारचुल्ल की ओर देख लो एक बार
औली की तरफ सामने गोरसोन टाप दिख रहा है
बिना पूंछ का चूहा
शुरू का रास्ता बढिया है
बुरांश
ये सीजन है बुरांश का बस दस दिन और
एक नजर उपर की ओर
ऐसी जगहो पर शार्टकट ना मारें तो क्या करें
करन खडा है खडी उतराई से शुरू करने को
पूरी यात्रा में यही नजारा था
रायगढी गांव नीचे
उपर तुगाशी और नीचे करछी सीधे हाथ पर
इसकी आवाज मस्त थी नाम पता नही
रायगढी से आगे
आगे एक किलोमीटर प्लेन है
सुंदर झरना

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