Barsu-Dayara -Dodital -Sangamchatti -11

रात के आठ बजे थे और हम अगोडा गांव में थे । यहां पर आते ही देखा कि हमारे टैंट नही लगा है और मिश्रा...

रात के आठ बजे थे और हम अगोडा गांव में थे । यहां पर आते ही देखा कि हमारे टैंट नही लगा है और मिश्रा जी और दोनो पोर्टर ऐसे ही बैठे हैं । मिश्रा जी ने आते ही बताया कि ये राजेश पंवार का होटल है और यहां पर टैंट लगाने का सौ रूपया है और खाने का सौ रूपये थाली है । मैने तुरंत बोल दिया कि खाने को कह दो और टैंट लगा लो पर अब तक क्यों नही लगाया । जबाब में पता चला कि मिश्रा जी से दोनो बंदो की झडप सी हो गयी और जगमोहन कहने लगा कि सारा दिन चलाते हो और रात को खाना बनवाते हो । बस मिश्रा जी ने भी एक दो बात कह दी तो दोनो ने कह दिया कि आने दो उन्ही के सामने बात होंगी ।

उधर मै और एकलव्य भाई धीरे धीरे चलने का ये फायदा उठा रहे थे कि हम चर्चा कर रहे थे कि आगे कैसे होगा । मिश्रा जी के पास चार हजार और हम दोनो के पास हजार के आस पास रूपये थे जिनमें से मिश्रा जी ने खर्च कर दिये हजार रूपये डोडीताल और मांझी में चाय परांठो पर तो अब चार हजार बचे हैं । दोनो पोर्टर के आज तक के 3600 हो गये हैं और खाना तीन सौ और टैंट चार सौ यानि चार हजार । कल हम सुबह संगमचटटी पहुंच जायेंगें तो वहां से उत्तरकाशी जाकर एटीएम से निकाल सकते हैं । फिर तो एक तरीका है कि हम आज रात एक पोर्टर को विदा कर देते हैं और एक को कल सुबह अपने साथ लेकर चलेंगें और उसे वहीं से पैसे दे देंगें । इधर आकर देखा तो टैंट नही लगा था और दोनो की मिश्रा जी से बहस भी हो रही थी तो मन एकदम से खटटा हो गया और तुरंत एक ही फैसला लिया कि दोनो का हिसाब कर देते हैं । दोनो बंदो से टैंट लगाने को कहा और इतनी देर में मिश्रा जी से पूछा कि आपके पास कितना धन है तो बोले कि आपको कितना चाहिये । मैने कहा कि कुछ कम पड जायेंगें तो उन्होने धीरे से बताया कि मेरे पास दो हजार अलग से भी हैं । सुनकर मै और एकलव्य बहुत हंसे ।

हम बिना वजह ही परेशान हो रहे थे और मिश्रा जी दूसरी जेब में लिये बैठे थे । हमने तुरंत दोनो बंदो को बुलाया और उनके 600 रूपये रोज के हिसाब से 3600 दे दिये । अब जगमोहन फिर से पंगा करने लगा कि मेरे तो 700 रूपये रोज के हिसाब से तय हुए थे । मैने उसे पहले तो समझाया पर जब नही माना तो मैने कहा कि मेरे पास तुम्हारी काल रिकार्डिंग है जिमसें 600 रूपये रोज की तय हुई थी । उसने कहा कि सुनवाओ तो मैने कहा कि मै सुनवा दूंगा पर अगर मैने सुनवा दी और बात सही निकली तो एक पैसा नही दूंगा । उसके बाद वो चुप हो गया और पैसे जेब में रखकर निकल गया । दूसरा बंदा वीरेंद्र बढिया और शांत था उसने उसे भी समझाने की कोशिश की ।

आज हम 25 किलोमीटर चले थे । कल 19 और परसो 4 किलोमीटर चले थे । टैंट लगाने के बाद आसपास का नजारा देखा । भारत लाज अगोडा में रूकने का बढिया साधन है और राजेश पंवार ने इसे हर तरह से बढिया बनाया है । कमरे भी बने हुए हैं पर हमारे पास टैंट था तो हमने उसे ही लगाया । इसके बाद राजेश से मिलना हुआ । राजेश ने ही केवल फोन करने मात्र से ही हमारे लिये तीन पोर्टर करा दिये थे अपने गांव के और उन्हे उत्तरकाशी भी भेज​ दिया था । कोई किसी के लिये बिना लालच कुछ कर दे ऐसा आज भी पहाडो में ही संभव है । राजेश एक नवयुवक है और इंटरनेट पर उसका नम्बर उसकी तारीफो के साथ उपलब्ध है । अपने क्षेत्र का विशेषज्ञ है चाहे डोडीताल हो या दयारा से डोडीताल या दारवा टाप होकर यमुनोत्री निकलन इन सब जगह का चप्पा चप्पा वो जानता है । उसकी इसी स्वभाव और विशेषता की वजह से उसके पास ग्रुप की लाइन लगी रहती है और बहुत से लोग उसके साथ ही जाना पसंद करते हैं । हम राजेश से मिले और मिलकर और भी अच्छा लगा कि इतना प्यारा स्वभाव और कम बोलना उसकी प्रकृति में शामिल है । हमने रात का खाना खाया जो कि ​बढिया बना था और सुबह के लिये राजेश से चर्चा की और उससे कहा कि हमें कोई खच्चर करा दे जो कि हमारे तीनो के बैग् लेकर संगमचटटी तक चल पडे । उसने तुरंत हां कर दी और राजेश के हां करने के बाद कोई टेंशन नही थी । हमारे साथ चार लडको ने भी एक टैंट वहां पर लगाया हुआ था । एक अंग्रेजन भी थी जो कि उपर कमरे में रूकी हुई थी ।

रात को हल्की सी बूंदाबांदी भी हुई और नींद भी इतनी बढिया से नही आयी पर रात कट ही गयी । मेरे भी सीधे पैर के घुटने में काफी दर्द था और दर्द की वजह से नींद नही आ पायी । सुबह सवेरे उठकर देखा तो मौसम खराब था और बारिश की पूरी उम्मीद थी । हमने अपना टैंट समेटा और नाश्ता करने राजेश के पास पहुंचे । यहां पर परांठे चाय के साथ खाये और राजेश को पेमेंट किया । राजेश ने खच्चर वाले से बात तो कर ली थी पर वो अभी देर से आयेगा इसलिये हम अपना सामान राजेश के होटल भारत लाज के बरामदे में रखकर चल दिये । गांव असल में राजेश के होटल पर खत्म होता है तो यहां से अब देखने को मिला कि अगोडा काफी बडा गांव है और यहां पर खेती बहुत ही बढिया होती है ।

गांव सुंदर तो है ही साथ ही यहां पर प्राकृतिक विविधता भी भरपूर है । और यहां पर फोटोग्राफी का भी बढिया मौका मिलता है । मैने तो जो भी फोटो लिये वो चलते हुए ही लिये और वो भी जल्दी में क्योंकि एक फोटो लेने के चक्कर में मै एकलव्य भाई जो कि बहुत ही आराम से चल रहे थे उनसे भी दूर रह जाता था । उसके बाद आज मेरे भी पैर में दर्द हो चुका था तो मै तेजी से भाग नही सकता था । उतराई पर हमेशा ही मेरा पैर दिक्कत करता है और वो यहां भी हो रहा था । गांव के लोग सुबह सुबह की गाडी पकडने के लिये मिल्खा सिंह की तरह दौडे जा रहे थे और हम उन गांव वालो को असहाय से देख रहे थे । लडकियां और औरते भी छलांग सी मारती और फिर हमेें देखकर आगे बढ जाती ।

अगोडा से संगमचटटी 6 किलोमीटर है और इस रास्ते पर कहीं कहीं काम भी चल रहा है । असल में उत्तराखंड में आयी आपदा में अस्सी गंगा ने भी सबसे ज्यादा कहर बरसाया था और संगमचटटी जैसी जगहो को तो बर्बाद ही कर दिया था । अब संगमचटटी पर दो दुकान ही हैं जो कि रात को बंद रहती हैं । वे केवल दिन में ही यहां पर आते हैं । मिश्रा जी को कहा कि आप तो तेज भाग रहे हो तो जाकर आगे गाडी में सीट रोक लो और मिश्रा जी हमसे आगे निकल गये उन्होने सीट भी रोकी पर वो भी कुछ समय के लिये ही रोकी जा सकती थी । उनके सीट रोकने पर हम तो आये नही और बाकी सवारियां खडी थी तो वो उन्हे लेकर चला गया । जब हम पहुंचे तो वहां पर कोई गाडी नही थी और गाडी होती भी तो हम क्या कर लेते क्योंकि हमारा सामान जो कि खच्चर पर आ रहा था वो भी नही आया था ।

हमारे आधे घंटे बाद खच्चर पर हमारा सामान आया पर अब गाडी नही थी । यहां पर टाटा फाउंउेशन बच्चो को घूमने का अच्छा अवसर प्रदान करती है और आज भी बहुत सारे बच्चे पास के ही गांव में जा रहे थे । उनकी अलग अलग टीम और टीम लीडर थे । संगमचटटी की चाय की दुकान पर जब हम चाय पी रहे थे तो वहीं पर बैठी एक औरत ने हमसें पूछताछ की और हमारे ये बताने पर कि हमारे पास अपनी कार है वो कहने लगी कि हमें भी ले चलना । उसे बडी मुश्किल से समझाया कि कार उत्तरकाशी में खडी है और उसे कोई लाने वाला नही है ।

पूरे डेढ घंटे के इंतजार के बाद एक गाडी आयी । इस बीच मै राजेश को फोन लगाकर कह भी चुका था कि कोई गाडी मंगवा दो बुक करके । जब गाडी आ गयी तो मिश्रा जी ने रूमाल फेंककर सीट बुक कर ली । पीछे की एक सीट पर हम तीनो आ गये और मैने राजेश को मना किया कि अब गाडी मत करना । राजेश का स्वभाव हर बार मुझे रोमांचित कर जाता था ।

गाडी में जाते समय देखा कि यहां पर साधन की कितनी समस्या है और नदी ने कितना नुकसान पहुंचाया है । करोडो रूपये की लागत से एक सुरंग बनी थी उसे भी खाक में मिला दिया । खैर हम उत्तरकाशी पहुंचे और सीधे तिलक भाई के कमरे के सामने ही उतर गये । अबकी बार मैने अपनी जेब के और एकलव्य भाई ने अपनी जेब के पैसे भी खर्च कर दिये । यानि हमने तो ये यात्रा बरसू गांव से संगमचटटी तक 500 रूपये में ही कर ली थी । वैसे इसे पागलपन भी कहा जायेगा कि बिना पैसे ​और बिना खाने के सही सामान के ऐसी यात्रा पर निकल पडो पर कहते हैं कि अंत भला तो सब भला और हम तिलक भाई के कमरे पर पहुंचे तो गीजर चलाकर नहा लिया गया । तिलक भाई से मिलकर लगा कि उत्तरकाशी में अपना ही घर है । उन्होने चाय पिलवाई और बहुत ही स्वादिष्ट खाना बनवाया । खाना खाने के बाद हमने कुछ सीखा टैंट आदि के बारे में उनसे और फोटो वगैरा लेने के बाद दो बजे के करीब हम वहां से विदा हुए । शाम को चिन्यालीसौड के पास एक जगह पर काफी फोटाग्राफी हुई और उसके बाद हम रात को घर पहुंचे । एकलव्य भाई को वीकेंड मनाना था सो वे घर पहुंचना चाहते थे । मै नोएडा और दिल्ली में बिचल जाता हूं रास्तो पर तो मैने राजनगर एक्सटैंशन पर गाडी रोकी तो तीन बाइकर खडे थे । उनमें से एक उन्ही के सैक्टर के सामने वाले सेक्टर का था और मैने उन्हे उनके साथ रवाना कर दिया । मिश्रा जी मेरे साथ घर पर रूके और सुबह मेरे उठने से पहले ही निकल गये । इस पूरी यात्रा में 6 लोग गये थे जिनका कुल खर्च 17000 के करीब आया । इनमें से डा0 साहब अपनी गाडी लेकर आये थे वो खर्च उनका अलग था । बाकी 3 लोगो यानि डाक्टर साहब और कुलदीप जी का घूमने का खर्च 2000 के करीब और उनकी गाडी का खर्च , अमित भाई का भी 2000 के करीब और हम तीनो का आना जाना और समस्त राशन , पोर्टर आदि का खर्च 3850 रूपये प्रति व्यक्ति आया ।

तो अब विदा इस सीरीज से और अगली की प्रतीक्षा करिये

Dayara dodital-



at agoda village
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near chinyalisod
तिकडी जिसने ये यात्रा पूरी हिम्मत से की

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