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भगवान श्रीकृष्ण की क्रीड़ा स्थली वृंदावन उत्तर प्रदेश के मथुरा जिला के अंतर्गत आता है। यह भगवान श्रीकृष्ण की क्रीड़ा स्थली था। वह अपने ...


भगवान श्रीकृष्ण की क्रीड़ा स्थली


वृंदावन उत्तर प्रदेश के मथुरा जिला के अंतर्गत आता है। यह भगवान श्रीकृष्ण की क्रीड़ा स्थली था। वह अपने सखाओं के साथ गाय चराने और खेलने के लिए यहां आया करते थे। यहां पर मंदिरो की संख्या काफी अधिक है। पूरे वृंदावन में लगभग पांच हजार मंदिर है। क्षेत्रफल के अनुपात में यह संख्‍या काफी अधिक है। यह स्थान भगवान श्रीकृष्ण को काफी प्रिय था। ज्यादा लीलाये भगवान कृष्ण ने यही पर ही रचाई थीं। मथुरा और वृंदावन आपस में अंर्तसंबंधित है। कहा जाता है भगवान कृष्ण वृंदावन छोड़कर नही गये है वह आज भी वृंदावन में है।

कृष्ण भक्तो के लिए यह महत्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक व्यक्ति की यह इच्छा होती है कि वह देह त्याग से पूर्व एक बार वृंदावन जरूर आये। भगवान श्रीकृष्ण ने अपना अधिकांश समय यहीं पर व्‍यतीत किया था। इसी कारण वृंदावन को अन्य धार्मिक स्थलो से अलग माना जाता है। चैतन्य महाप्रभु का कहना था कि वृंदावन वह धाम है, जहां पर कण-कण में भगवान कृष्ण बसते है। यहां के पेड़ो, पत्तो आदि के अन्दर भी भगवान श्रीकृष्ण का वास है। इसे प्रधान धाम भी कहा जाता है। प्रत्येक व्यक्ति यहां पर आकर ही जीवन के सत्य को जान पाता है। वृंदावन में आकर सभी को आध्यात्मिक आंनद की प्राप्ति होती है।           फोटो गैलरी देखें

वृंदावन परिक्रमा
वृंदावन परिक्रमा की प्रथा प्रचीन काल से चली आ रही है। भगवान श्रीकृष्ण के भक्त वृंदावन की परिक्रमा करते है। परिक्रमा मार्ग शहर के बाहरी हिस्से में है।

इस परिक्रमा मार्ग से पूरे वृंदावन की परिक्रमा की जा सकती है। परिक्रमा मार्ग इस्‍कॉन मंदिर से प्रारंभ होता है। परिक्रमा करने में तीन से चार घंटे का समय लगता है। परिक्रमा मार्ग 10 कि.मी. का है। परिक्रमा मार्ग मे काफी सारे दर्शनीय स्थल पड़ते है। इन दर्शनीय स्‍थलों में प्रमुख है, कालिया घाट, मदन मोहन मंदिर, ईमली ताल, श्रृंगार वट, केसरी घाट। वैसे तो परिक्रमा पूरे महीने चलती है परन्तु एकादशी के दिन परिक्रमा करने का विशेष महत्व है।

क्या देखें
निधि वन
यह सेवा कुंज की तरह का ही एक बगीचा है। नृत्य लीला और रास लीला के बाद राधा-कृष्ण ने यहां पर विश्राम किया था। यहां पर रंग महल है, जिसे राधा-कृष्ण का शयन कक्ष कहा जाता है। मान्यता है अभी भी राधा-कृष्ण यहां पर आकर विश्राम करते है। प्रत्येक रात्रि को यहां पर राधा-कृष्ण के लिए सेज सजाई जाती है। यहां पर राधा जी के श्रृंगार का सामान, चार लड्डू और दो दांतुन रखे जाते है। सुबह के वक्त जब पुजारी मंदिर के कपाट खोलते है, तो श्रृंगार का सामान इस्तेमाल किया हुआ, लड्डू फूटे हुए तथा दांतुन किया हुआ मिलता है।

निधि का अर्थ होता है वह स्थान जहां पर आमूल्य रत्न पाये जाते है। निधिवन के अन्दर ही विशाखा कुण्ड है। जिसे भगवान कृष्ण ने अपनी मुरली से खोदकर राधाजी कि सखी विशाखा के लिए बनाया था। कहा जाता है कि रास लीला करते - करते जब विशाखा को प्यास लगी तो उन्होंने भगवान कृष्ण से कहा हमे पानी चाहिए। तब उन्ही के अनुरोध पर भगवान कृष्ण ने इसका निर्माण किया।

निधि वन के मुख्य द्वार के पास ही स्वामी हरिदास जी की समाधि है। उन्ही ने अपनी साधना के फलस्वरूप बांके बिहारी जी की मूर्ति प्रकट कराई थी। स्वामी हरिदास का जन्म 1535 मे हुआ था। उनके पिता का विवाह रायपुर गांव मे एक ब्राहमण की बेटी के साथ हुआ था, जो कि वृंदावन के पास है।

तानसेन राजा अकबर के दरबार मे संगीत वादक थे। वह स्वामी हरिदास जी के पसंदीदा शिष्य थे। एक समय की बात है स्वामी हरिदास जी यमुना किनारे भजन गा रहे थे। उसी समय अकबर वहां से गुजरे उन्हे हरिदास जी का भजन काफी पसंद आया और वह उनके दिल को छू गया। उन्होंने अपनी नाव को रोका और हरिदास जी से कहा, वह उनके यहां पर संगीत अध्यापक के रूप मे कार्य करें। अकबर के अनुरोध पर उन्होंने तानसेन को अपना शिष्य बना लिया।

पूरे निधि वन में तुलसी के वृक्ष पाये जाते है। यहां की मिट्टी को श्रद्धालु अपने साथ प्रसाद के रूप में ले जाते है। मान्यता है कि अभी भी भगवान कृष्ण प्रत्येक रात्रि को गोपियो के साथ यहां पर रास रचाते है। यहां पर आने वाले श्रद्धालु की संख्या काफी अधिक है।

रमण रेती
रमण रेती वह स्थान है जहां पर भगवान कृष्ण और बलराम अपने सखाओं के साथ गाय चराने आया करते थे। यह भगवान कृष्ण और राधा की मिलन स्थली भी था। द्वारका जाने से पूर्व भगवान प्रत्येक रात्रि को यहां पर राधा से मिला करते थे। रमण रेती कुछ कि.मी. मे ही फैला हुआ है। कृष्ण-बलराम मंदिर भी रमण रेती में ही स्थित है।

कृष्ण-बलराम वृक्ष
रमण रेती में ही दो वृक्ष है जिन्हे कृष्ण-बलराम वृक्ष के नाम से जाना जाता है। परिक्रमा मार्ग में ही यह वृक्ष है। यह इस्कॉन मंदिर से 6 मिनट दूरी पर स्थित है। ये वृक्ष आपस में जुड़े हुए है, जिसमें एक का रंग काला और दूसरे का रंग सफेद है। काला वृक्ष भगवान कृष्ण को दर्शाता है जबकि सफेद वृक्ष बलराम को दर्शाता है।

यमुना नदी
यमुना नदी भारत की पवित्र नदियों में से एक है। यह नदी वृंदावन से होकर बहती है। यमुना की उदगम स्थली यमनोत्री है। जो उत्तरी हिमालय में स्थित है। यहां से यमुना नीचे आकर ब्रज मण्डल में प्रवेश करती है। यमुना नदी पर बना हुआ प्रत्येक घाट भगवान कृष्ण की लीलाओं से संबंधित है। यमुना प्रत्यक्ष रूप से भगवान कृष्ण से संबंधित है। जन्म से लेकर किशोरावस्था तक भगवान श्रीकृष्ण ने अधिकतर लीलायें यमुना किनारे ही रची थी। श्रीकृष्ण के जन्म के समय उनकी रक्षा के लिए वसुदेव कृष्ण को गोकुल ले जा रहे थे तब यमुना तेज गति से बह रही थी। परन्तु श्रीकृष्ण के चरण स्‍पर्श कर वह शांत हो गई और सामान्य गति में बहने लगी। यमुना में भगवान कृष्ण अपने सखाओं के साथ स्नान किया करते थे। वह अपनी गायो को भी यमुना में स्नान कराया करते थे। जिस यमुना घाट पर भगवान कृष्ण ने गोपियों के वस्‍त्र चुराये थे वह चीर घाट नाम से प्रसिद्ध है।

यमुना में स्नान का महत्व    
यमुना में एक स्नान गंगा के सौ स्नानो के बराबर है। इसके पीछे यह कारण है गंगा केवल भगवान विष्णु के चरणो से निकलती है। पर भगवान कृष्ण तो अपने अवतार काल में यमुना में अपने सखाओ के साथ स्नान ही नही किया करते थे बल्कि अपनी गायो को भी स्नान कराया करते थे। स्‍नान के लिए केसरी घाट महत्वपूर्ण है, भगवान कृष्ण ने केसरी नामक असुर को मारने के पश्चयात यहां पर स्नान किया था,केसरी घाट पर यमुना का प्रवाह काफी अच्छा है। वारह पुराण के अनुसार गंगा और यमुना के जल में कोई अन्तर नही है, दोनो ही एक समान है। यमुना में स्नान से भक्तो को भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है। यमुना में स्नान से व्यक्ति की कष्ट बधाये दूर हो जाती है। कृष्ण भगवान के चरण कमल यमुना में पांच हजार वर्ष पडे थे।

यमुना मे विशेष स्नान
यमुना सूर्य की पुत्री है और यमराज की बहन है। यमुना को यमराज का वरदान है,  जो व्यक्ति भईया दूज के दिन यमुना में स्नान करता है उसे मृत्यु का भय नहीं रहता है। इसलिए भईया दूज के दिन यमुना में विशेष स्नान होता है जिसमे भारी संख्या मे श्रद्धालु इस स्नान में शामिल होते है। वैसे तो प्रत्येक पूर्णिमा और एकादशी को स्नान होता रहता है।

वृंदावन में मनाये जाने वाले प्रमुख त्यौहार
होली
वैसे तो वृंदावन में सभी त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाये जाते हैं, परन्तु होली और जन्माष्टमी अधिक धूमधाम से मनाये जाते है। होली का त्यौहार फल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। होली का त्यौहार पूरे ब्रज में 45 दिनो तक मनाया जाता है। पर मुख्य उत्सव होली के दिन ही होता है। ब्रजवासी एक-दूसरे पर गुलाल लगाते है। वैसे तो होली पूरे उत्तर भारत मे मनाई जाती है। पर ब्रज की होली अनूठी होती है। यहां पर लठ मार होली होती है। ब्रजवासी नाच गा कर होली मनाते है।

जन्माष्टमी
जन्माष्टमी वृंदावन का मुख्य त्यौहार है। जन्माष्टमी के दिन श्रीकृष्ण भगवान का जन्म हुआ था। यह त्यौहार वृंदावन में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।  जन्माष्टमी के दिन वृंदावन में कृष्ण लीला के जरिए भगवान श्रीकृष्ण को याद किया जाता है। इन लीलाओं में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर किशोर अवस्था तक की लीलाओं का मंचन किया जाता है। सभी मंदिरों में भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव मध्य रात्रि को 12 बजे मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने मध्य रात्रि को रोहिणी नक्षत्र में जन्म लिया था इसी कारण यह उत्सव रात्रि में मनाया जाता है। मंगल गान और बधाई गीतो के साथ मंदिरों के कपाट रात्रि 12 बजे खोले जाते है।

भगवान श्री कृष्ण के समय में मथुरा कैसा होगा इसकी हम केवल कल्पना कर सकते हैं, मगर आज का मथुरा इतना आकर्षक नहीं है । प्राचीन और एतिहासिक तीर्थ होने के कारण तथा विशेषतः भगवान श्री कृष्ण की लीलाभूमि होने के कारण देशविदेश से यात्री यहाँ आते है ।

मथुरा हम पंद्रह दिन रहें मगर यहाँ भी पेट की बिमारी ने हमें नहीं बक्षा । फिर भी हमने जो कुछ देखने लायक था, देखा । यहाँ का विश्रामघाट अत्यंत मनोहर है । शाम की आरती के वक्त उसकी शोभा देखते ही बनती है । हरिद्वार में हरिकी पौडी पर गंगाजी की आरती के दर्शन से हमें अलौकिक आनंद मिलता है । वैसे ही यहाँ जमुनाजी के विश्रामघाट पर होनेवाली आरती आँख और अंतर दोनों को पावन करती है । उसे एक बार देखने से मन नहीं भरता, और बार-बार देखने को मन करता है ।

विश्रामघाट सचमुच विश्रांति का घाट है । संसार के तापों से तप्त और शांति की कामना से आये हुए भाविकों को यहाँ परम शांति का अनुभव होता है । आदमी यहाँ आकर अपनी सारी मुसीबतों को भूल जाता है । प्रबल आध्यात्मिक संस्कारवाले मनुष्य यहाँ उन्नति की प्रेरणा पाते हैं ।

विश्रामघाट से नाव में बैठकर जमुना के दुसरे छोर पर जाने से दुर्वासा ऋषि का स्थान आता है । यह स्थान एकांतिक तथा दर्शनीय है । इस स्थान का दर्शन करते वक्त हमारे मन में महात्मा दुर्वासा की मूरत सामने आयी । हमारे विभिन्न सरितातट पुरातन काल से लेकर अद्यतन काल पर्यंत संत-महात्माओं के निवास से गौरवान्वित होते आयें हैं । तीर्थों का आकर्षण महापुरुषों से बना रहेता है । आजकल तीर्थस्थलों में तपस्वी संतपुरुष भले कम रहते हैं मगर उनका पूर्णतया लोप नहीं हुआ है । आज भी जो श्रध्धा से जाता है उसे उनके दर्शन हो जाते हैं ।

मथुरा से हम गोकुल गयें । जमनातट पर एक गुजराती संन्यासी महात्मा रहते थे, हम उनके साथ रहें । गोकुल श्री कृष्ण की लीलाभूमि है । नंद और यशोदा के घर रहकर उन्होंने गोकुल को पूरे संसार में अमर कर दिया । वैसे तो गोकुल छोटा-सा गाँव है मगर हमें अत्यंत मनभावन लगा । भगवान कृष्ण की लीलाभूमि के दर्शन करके हम मथुरा वापस लौटे ।

मथुरा की यात्रा वृंदावन के दर्शन बगैर अधुरी मानी जाती है । कुछ दिनों के बाद हम वृंदावन गये । वृंदावन को लोग वैकुंठ-तुल्य मानते हैं । चैतन्य महाप्रभु, वल्लभाचार्य, तुलसीदास, सुरदास, मीरां ने रामकृष्णदेव जैसे कई संतपुरुष यहाँ आये थे । वृंदावन के दर्शन करके हमें बडी प्रसन्नता हुई ।

वृंदावन के मंदिरो की शोभा देखते ही बनती है । भगवान कृष्णने जहाँ रासलीला की थी वो जगह देखने लायक है । राधा तथा अन्य गोपीओं की प्रेमगाथा यहाँ की मिट्टी से जुडी हुई है । प्रेमी भक्तों के हृदय यहाँ प्रसन्नता का अनुभव करते हैं ।

ज्यादातर लोग केवल यात्रा के लिये तीर्थधामों में जाते है, कुछ लोग पुण्य की प्राप्ति हेतु जाते हैं, तो कुछ केवल कूतुहल से जाते है । यात्रा सही मायने में तभी सार्थक मानी जायेगी जब लोग यात्रा करके अपने जीवन को सुधारने का, उसे ओर बहेतर बनाने का प्रयास करें । यात्रा केवल शौक से नहीं मगर भावना से होनी चाहिए । वृंदावन आदि यात्राधामों में जानेवाले सभी यात्री अगर अपने दुर्गुणों से मुक्त होने का संकल्प करें, अपने व्यसनों को त्यागने का निश्चय करें तो उनका जीवन अवश्य उज्जवल होगा । यात्रीओं को चाहिए की कम-से-कम यात्रा के दौरान संसार की आसक्ति छोडकर, भगवान की कृपा के लिये विशेष प्रयास करें, तथा यात्रा खत्म होने पर भी साधना के नियम बनायें रखें । यात्रा-प्रवास तभी उनके लिये लाभदायी सिद्ध होंगे ।

ज्ञानदृष्टि से देखा जाय तो समस्त संसार वृंदावन है । एसी एक भी जगह नहीं जहाँ ईश्वर का निवास न हो । जड और चेतन – सभी जगह वह रहेता है मगर अहंकार, ममता और अज्ञान की वजह से हम उन्हें देख नहीं पाते । अज्ञान का पर्दा हटने से हमें उनके दर्शन होंगे । फिर हमारे लिये सभी जगह वृंदावन, काशी और अयोध्या होगी । किसी कवि ने इसीलिये कहा है की 'घट घट में नाथ समाये'

जो बहार है वो अंदर भी है, हमारे तन, मन, अंतर में वो ही रास ले रहा है, वो ही बंसरी बजा रहा है । जैसे वृंदावन बहार है, उसी तरह हमारे अंदर भी है । वहाँ पर भी प्रभु की लीला अनवरत रूप से चल रही है, उनकी शक्ति वहाँ भी कार्यान्वित है । जीवनरूपी यात्रा की फलश्रुति हमारे अंदर तथा बाहर प्रभु के दर्शन करनेमें है । तीर्थयात्रा हमें यह संदेश प्रदान करती है ।

वृंदावन में हमने जो दृश्य देखा वह अभी भी मानसपट पर अंकित है । किसी महंत का शरीर शांत होने पर संकीर्तन के साथ स्मशान लिया जा रहा था । महंत की मुखाकृति आकर्षक व तेजस्वी थी । उनके मुख पर गहरी शांति छायी हुई थी । उनको देखकर मुझे स्मरण हुआ की आखिरकार सबको इसी तरह संसार से जाना पडेगा । मगर जाते-जाते अगर हमारे मुख पर शांति और स्मित रहें तो हमारा जीवन सार्थक कहा जायेगा
मथुरा, भगवान कृष्ण की जन्मस्थली और भारत की परम प्राचीन तथा जगद्-विख्यात नगरी है। शूरसेन देश की यहाँ राजधानी थी। पौराणिक साहित्य में मथुरा को अनेक नामों से संबोधित किया गया है जैसे- शूरसेन नगरी, मधुपुरी, मधुनगरी, मधुरा आदि। भारतवर्ष का वह भाग जो हिमालय और विंध्याचल के बीच में पड़ता है, प्राचीनकाल में आर्यावर्त कहलाता था। यहाँ पर पनपी हुई भारतीय संस्कृति को जिन धाराओं ने सींचा वे गंगा और यमुना की धाराएं थीं। इन्हीं दोनों नदियों के किनारे भारतीय संस्कृति के कई केन्द्र बने और विकसित हुए। वाराणसी, प्रयाग, कौशाम्बी, हस्तिनापुर,कन्नौज आदि कितने ही ऐसे स्थान हैं, परन्तु यह तालिका तब तक पूर्ण नहीं हो सकती जब तक इसमें मथुरा का समावेश न किया जाय। यह आगरा से दिल्ली की ओर और दिल्ली से आगरा की ओर क्रमश: 58 किमी. उत्तर-पश्चिम एवं 145 किमी. दक्षिण-पश्चिम में यमुना के किनारे राष्ट्रीय राजमार्ग 2 पर स्थित है।
वाल्मीकि रामायण में मथुरा को मधुपुर या मधुदानव का नगर कहा गया है तथा यहाँ लवणासुर की राजधानी बताई गई है-[46] इस नगरी को इस प्रसंग में मधुदैत्य द्वारा बसाई, बताया गया है। लवणासुर, जिसको शत्रुघ्न ने युद्ध में हराकर मारा था इसी मधुदानव का पुत्र था।[47] इससे मधुपुरी या मथुरा का रामायण-काल में बसाया जाना सूचित होता है। रामायण में इस नगरी की समृद्धि का वर्णन है।[48] इस नगरी को लवणासुर ने भी सजाया संवारा था। [49]दानव, दैत्य, राक्षस आदि जैसे संबोधन विभिन्न काल में अनेक अर्थों में प्रयुक्त हुए हैं, कभी जाति या क़बीले के लिए, कभी आर्य अनार्य संदर्भ में तो कभी दुष्ट प्रकृति के व्यक्तियों के लिए)। प्राचीनकाल से अब तक इस नगर का अस्तित्व अखण्डित रूप से चला आ रहा है।
[संपादित करें]शहर

द्वारकाधीश मंदिर :
यह मथुरा का सबसे विस्तृत पुष्टिमार्ग मंदिर है। भगवान कृष्ण को ही द्वारिकाधीश (द्वारिका का राजा) कहते हैं । मथुरा नगर के राजाधिराज बाज़ार में स्थित यह मन्दिर अपने सांस्कृतिक वैभव कला एवं सौन्दर्य के लिए अनुपम है । ग्वालियर राज के कोषाध्यक्ष सेठ गोकुल दास पारीख ने इसका निर्माण 1814–15 में प्रारम्भ कराया, जिनकी मृत्यु पश्चात इनकी सम्पत्ति के उत्तराधिकारी सेठ लक्ष्मीचन्द्र ने मन्दिर का निर्माण कार्य पूर्ण कराया । श्रावण के महीने में प्रति वर्ष यहाँ लाखों श्रृद्धालु सोने–चाँदी के हिंडोले देखने आते हैं। मथुरा के विश्राम घाट के निकट ही असकुंडा घाट के निकट यह मंदिर विराजमान है।  (सन्दर्भ: http://hi.brajdiscovery.org)

यहाँ पर एक बात बताना चाहूँगा की हम लोगों ने अब तक कई बड़े बड़े मंदिरों एवं अनेक धार्मिक स्थलों के दर्शन किये हैं लेकिन मथुरा के जन्मभूमि मंदिर जितनी सख्त चेकिंग एवं सिक्यूरिटी (सुरक्षा व्यवस्था) मैंने अपने जीवन में पहली बार देखी, खैर यहाँ के बाद हम आगरा ताज महल देखने भी गए और काशी विश्वनाथ मंदिर भी लेकिन पहरेदारी का जो आलम मैंने मथुरा के इस जन्मभूमि मंदिर का देखा वह और कहीं नहीं देखने को मिला। कतार में लगने के बाद कम से कम तीन बार मुझे तथा कविता के पापा को सुरक्षा चेक पोस्ट से लाइन से बाहर निकलना पड़ा क्योंकि हर बार कुछ न कुछ समस्या बता कर पुलिस वाले हमें लाइन से बाहर निकाल देते, आखिरी बार तो हमें इसलिए बाहर कर दिया क्योंकि मेरी पेंट की पिछली जेब में सुपारी का एक पाउच रह गया था। जबकि सारा बड़ा सामान जैसे मोबाइल, केमेरा पर्स आदि तो हम सबसे पहले ही क्लॉक रूम में जमा करा चुके थे।  खैर इस खतरनाक चेकिंग से गुजरने के बाद हम मंदिर में पहुंचे। यहाँ मंदिर दो भागों में बंटा हुआ है, एक तरफ तो कंस के काराग्रह का वह संकरा कमरा है जहाँ भगवान् श्री कृष्ण का जन्म हुआ था और दूसरी और श्री राधा कृष्ण का सुन्दर मंदिर है।

श्री कृष्ण जन्मभूमि मंदिर/ केशव देव मंदिर :
भगवान श्रीकृष्ण का यह जन्मस्थान कंस का कारागार था, जहाँ वासुदेव ने भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की आधी रात अवतार ग्रहण किया था। आज यह कटरा केशवदेव नाम से प्रसिद्व है। यह कारागार केशवदेव के मन्दिर के रूप में परिणत हुआ। इसी के आसपास मथुरा पुरी सुशोभित हुई। यहाँ कालक्रम में अनेकानेक गगनचुम्बी भव्य मन्दिरों का निर्माण हुआ। इनमें से कुछ तो समय के साथ नष्ट हो गये और कुछ को विधर्मियों ने नष्ट कर दिया।

कटरा केशवदेव-स्थित श्रीकृष्ण-चबूतरा ही भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य प्राक्ट्य-स्थली कहा जाता है। मथुरा के राजा कंस के जिस कारागार में वसुदेव-देवकीनन्दन श्रीकृष्ण ने जन्म-ग्रहण किया था, वह कारागार आज कटरा केशवदेव के नाम से विख्यात है और ‘इस कटरा केशवदेव के मध्य में स्थित चबूतरे के स्थान पर ही कंस का वह बन्दीगृह था, जहाँ अपनी बहन देवकी और अपने बहनोई वसुदेव को कंस ने कैद कर रखा था।

(जानकारी आभार : http://hi.brajdiscovery.org)

सबसे पहले हम उस कदम्ब के पेड़ के करीब पहुंचे जिस पर बैठ कर कन्हैया बांसुरी बजाया करते थे, और उसके बाद हम नन्द महल पहुंचे जहाँ भगवान कृष्ण पले बढे थे। इसी गोकुल की गलियों में भगवान कृष्ण का बचपन बीता था। सचमुच यहाँ बहुत सारी  छोटी छोटी गलियां देखने को मिली। इन गलियों को देखकर मुझे अनायास ही किसी हिंदी फिल्म का वो गाना याद आ गया ” गोकुल की गलियों का ग्वाला, नटखट बड़ा नंदलाला”

नन्द महल में हमने भगवान के छठी पूजन का स्थान देखा एवं वह स्थान भी देखा जहाँ उन्होंने घुटनों के बल चलना सिखा था। गोकुल में एक संस्था है जो विधवा स्त्रियों के भरण पोषण तथा रोज़गार के लिए कार्य करती है, यहाँ बहुत सारी विधवा स्त्रियाँ भगवान् का भजन कीर्तन करती हैं तथा यह संस्थान उनकी आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। गोकुल में बन्दर बहुतायत में पाए जाते हैं तथा उनसे सावधान रहने की सख्त आवश्यकता होती है वर्ना वे आपके हाथ का सामन छीन कर भाग जाते हैं। यहाँ के बंदरों को मनुष्यों के चश्मों से बहुत लगाव है, वे आपके पहने हुए चश्मे को भी छीन कर भाग सकते हैं।

गोकुल :

यह स्थल मथुरा से 15 किमी की दूरी पर यमुना के पार स्थित है। यह वैष्णव तीर्थ है। यथार्थ महावन और गोकुल एक ही है। नन्द बाबा अपने परिजनों को लेकर नन्दगाँव से महावन में बस गये। गो, गोप,गोपी आदि का समूह वास करने के कारण महावन को ही गोकुल कहा गया है। नन्दबाबा के समय गोकुल नाम का कोई पृथक् रूप में गाँव या नगर नहीं था। यथार्थ में यह गोकुल आधुनिक बस्ती है। यहाँ पर नन्दबाबा की गौशाला थी। विश्वास किया जाता है कि भगवान कृष्ण ने यहाँ की गलियों में अपने बाल सखाओं तथा बलदाऊ के साथ खेला करते थे तथा गाँव से लगे वनों में गौएँ चराया करते थे।

बांके बिहारी जी का प्रकटोउत्सव
बांके बिहारी जी का प्रकटोउत्सव माघ महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। इसी दिन बांके बिहारी जी की मूर्ति निधि वन से प्रकट हुई थी। इस दिन बांके बिहारी मंदिर में फूलो का बंगला लगाया जाता है। बांके बिहारी मंदिर में मंगल गान व नृत्य किया जाता है। बांके बिहारी जी की मूर्ति को प्रकट कराने का श्रेय स्वामी हरिदास जी को जाता है।

वृंदावन में बसंत पंचमी, शिव रात्रि, गुरु पूर्णिमा, अक्षय तृतीया, राम नवमी, राधाष्‍टमी, हरियाली तीज, दीपावली तथा गोर्वधन त्‍यौहार भी धूमधाम से मनाए जाते हैं।

वृंदावन के प्रमुख मंदिर
वृंदावन में लगभग साढे पांच हजार मंदिर है। परन्तु बांके बिहारी मंदिर सबसे अधिक प्रसिद्ध है। इस मंदिर का निर्माण 1864 में हुआ था। इस मंदिर में प्रार्थना करने के लिए एक विशाल आंगन है। यहीं पर भक्त बिहारी जी के दर्शन करते है। मंदिर के अंदर बांके बिहारी जी की मूर्ति काफी सुंदर और मनमोहक है। बांके बिहारी जी की मूर्ति प्रकृतिक है, जोकि निधिवन से प्रकट हुई थी। यहां पर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या काफी अधिक है। मंदिर के अंदर प्रत्येक दिन फूल सज्‍जा की जाती है। जिसे देख यहां आने वाले श्रद्धालु कृतार्थ हो जाते है।

वृंदावन का मौसम
वृंदावन गर्मियो के दिनो मे गर्म रहता है। सामान्य तौर पर गर्मियो का तापमान 45 डिग्री सेल्सियस रहता है। जून से सितम्बर के महीनों में यहा पर अच्छी वर्षा होती है। नवम्बर से मार्च के महीनो में यहा पर सर्दी पड़ती है।

कब जाए
वृंदावन जाने का उपयुक्त समय अगस्त से मार्च तक का है। इस समय यहां का मौसम ठीक होता है। यदि आप अगस्त से मार्च के बीच में जाते है तो वृंदावन के उत्सवों का आंनद उठा सकते है।

कहां ठहरें
वृंदावन के ठहरने की अच्छी व्यवस्था है। निजी होटल व धर्मशालाएं काफी संख्या मे है। धर्मशालाओं मे उचित मूल्य पर कमरें की व्यवस्था हो जाती है। पूरे वृंदावन में 500 से भी अधिक धर्मशालाएं है। धर्मशालाओं मे रहने और खाने का उचित प्रबंध है। वृंदावन के नजदीकी शहर मथुरा में भी ठहरा जा सकता है। यहां पर कई अच्‍छे होटल हैं।

बरसाना

भगवान श्रीकृष्ण की प्रेमिका राधा जी की नगरी


बरसाना मथुरा से 50 कि.मी. दूर उत्तर-पश्चिम में और गोवर्धन से 21 कि.मी. दूर उत्तर में स्थित है। यह भगवान श्रीकृष्ण की प्रेमिका राधा जी की जन्म स्थली है। यह श्‍ाहर पर्वत के ढ़लाऊ हिस्से में बसा हुआ है। इस पर्वत को ब्रह्मा पर्वत के नाम से जाना जाता है। बरसाना में राधा-कृष्ण भक्तों का सालों भर तांता लगा रहता है। बरसाना आने के लिए मथुरा, गोवर्धन और कोसी से बस सेवा उपलब्ध।

बरसाना जिसका मूल नाम ब्रह्मशरण है एक टिले पर बसा हुआ शहर है। जिसके बीचो-बीच एक पहाड़ी है जो कि बरसाने के मस्तिष्‍क पर आभूषण के समान है। उसी के ऊपर ललिजी का मंदिर है। राधा जी को प्यार से वहां के लोग ललि जी कहते है। राधा रानी का मंदिर बहुत ही सुन्दर और मनमोहक है। मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढियों से होकर जाना होता है। बरसाने को कृष्ण भगवान और उनकी प्रमिका राधा रानी की संगम स्थली के नाम से भी जाना जाता है।

राधा-कृष्ण को समर्पित इस भव्य और सुन्दर मंदिर का निर्माण राजा वीर सिंह ने 1675 में करवाया था। बाद मे स्थानीय लोगो द्वारा पत्थरो को इस मंदिर में लगवाया। इस मंदिर को बरसाने की लाड़ली जी का मंदिर कहा जाता है। पहाड़ी के मध्य का रास्ता लाड़लीजी मंदिर और शंकरी खोर मंदिर को आपस में जोड़ता है। शंकरी खोर मंदिर में भद्रपद (जुलाई से अगस्त) के माह में मेले का आयोजन किया जाता है। जिसमे भारी संख्या मे श्रद्धालु शामिल होते है।

लाड़ली जी के मंदिर में राधाष्टमी का त्यौहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। यह त्यौहार भद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। राधाष्टमी के उत्सव में राधाजी को लड्डूओं का भोग लगाया जाता है और उस भोग को मोर को खिला दिया जाता है। जिन्हें राधा कृष्ण का स्वरूप माना जाता है। राधाष्टमी के उत्सव के लिए राधाजी के महल को काफी दिन पहले से सजाया जाता है। बरसाने में काफी सारे मनमोहक सरोवर है। जिनमें प्रमुख हैं प्रेम सरोवर, जल महल और बनोकर तालाब जो अपने अन्दर प्राकृतिक सौन्दर्य को समाहित किये हुए है। बरसाना अपनी लठमार होली के लिए काफी प्रसिद्ध है। यहां के घर-घर में होली का उत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।

बरसाने में बनाये जाने वाले प्रमुख त्यौहार
बरसाने में राधाष्टमी और होली का त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। राधाष्टमी का पर्व जन्माष्टमी के 15 दिन बाद भद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। यह पर्व बरसाना वासियो के लिए अति महत्वपूर्ण है। इस दिन लाड़लीजी के मंदिर में जो कि ब्रह्म पहाड़ी पर स्थित है को फूलों और फलों से सजाया जाता है। पूरे बरसाने में इस दिन उत्सव का महौल होता है। राधा रानी को छप्पन प्रकार के व्ययंजनो का भोग लगाया जाता है और इसे बाद में मोर को खिला दिया जाता है। मोर को राधा-कृष्ण का स्वरूप माना जाता है। बाकी प्रसाद को श्रद्धालुओं मे बांट दिया जाता है। राधाजी को प्यार से वृषभानु दुलारी भी कहा जाता है। राधाजी के पिता का नाम वृषभान और उनकी माताजी का नाम कीर्ति था। लाड़लीजी के मंदिर में श्रद्धालु बधाई गान गाते है और नाच गाकर राधाष्टमी का त्यौहार मनाते है।

होली
बरसाने की होली पूरे भारत वर्ष में मशहूर है। यहां पर होली कुछ अलग अंदाज में मनाई जाती है। यहां की होली पूर्णतया राधाकृष्ण को समर्पित है। यहां के लोग अलग-अलग झुंड बनाकर राधा और कृष्ण के गीतो का गान करते है। वे एक दूसरे पर पानी डालते है, गुलाल लगाते है और राधा-कृष्ण द्वारा कि गई लीलाओं का गुणगान करते है। आधा दिन व्यतित होने के बाद नंद गांव के गोप और बरसाने गांव की गोपियों के बीच में मुकाबला होता है। नंदगाव के गोव ध्वज पताका लेकर बरसाने गांव पर चढाई करते हैं और बरसाने गांव की गोपिया उनकी चुनौती को स्वीकार करती है। इस प्रकार मुकाबला आरम्‍भ होता है।  गोपियां नंदगांव से आये गोपों पर लठ्ठो से वार करती है और नंदगाव के गोप अपना बचाव करते है। इस होली को लठमार होली कहा जाता है। इसे देखने के लिए पर्यटक भारी संख्या में आते है। बरसाने में होली का उत्सव 45 दिनों तक मनाया जाता है। होली का त्यौहार फल्गुन मास (मार्च) की पूर्णिमा को मनाया जाता है। पूर्णिमा कि मध्य रात्रि को सभी चौराहो पर होली जलाई जाती है। जिसमें पूरे बरसाना वासी भाग लेते हैं। होली का त्यौहार असत्य पर सत्य की विजय का पर्व है।

कहां पर स्थित है
बरसाना मथुरा से 50 कि.मी. और गोर्वधन से 23 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। आप बस, कार या अन्य हल्के वाहन से बरसाना जा सकते है। अगर आप दिल्ली से आते है तो वाया छाता या कोसी कोकिलावन होकर आ सकते है। बरसाना इन सभी जगहो से सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है।

कहां ठहरें
बरसाने में रहने के लिए काफी सारी धर्मशालाए व होटल है। जिनमें रहने खाने की अच्छी व्यवस्था है। यहां पर होटल कम कीमतपर आसानी से उपलब्ध हो जाते है। इन सभी मे से उपयुक्त स्थान रंगीली महल है। जो लाड़लीजी के मंदिर से थोड़ी ही दूरी पर स्थित है। इसके अलावा यहां से नजदीकी शहर मथुरा में भी ठहरा जा सकता है।

गोकुल

भगवान कृष्ण की नगरी


गोकुल भगवान कृष्ण से संबंधित प्रमुख स्‍थलों में से एक है। यह पवित्र स्थान मथुरा से 15 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। गोकुल गांव यमुना किनारे बसा हुआ है। यह कृष्ण भगवान की बाल लीला स्थली है। भगवान कृष्ण ने बालपन में ज्यादातर लीलाये यही पर रचाई थीं।  

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गोकुल में बल्‍लभाचार्य के समय के तीन मंदिर प्रमुख है, गोकुलनाथ, मदनमोहन और विथलनाथ। यह तीनो मंदिर भगवान कृष्ण को समर्पित है। इन सभी मंदिरो का निर्माण 1511 के आस-पास हुआ है। गोकुल में जन्माष्टमी का त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। जन्माष्टमी के समय पर यहां पर विशाल मेले का आयोजन होता है जो कि आर्कषण का मुख्य केन्द्र रहता है। गोकुल में बलदेव जी का जन्मउत्सव भी बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। अन्कूट और त्रिवंत मेला जो कि कार्तिक के चौथे दिन से प्रारम्भ होता है में भारी संख्या मे श्रद्धालु गोकुल आते है। गोकुल में देखने के लिए मुख्य मंदिर गोकुलनाथजी का मंदिर, राजा ठाकुर मंदिर , गोपाल लालाजी का मंदिर और मोरवाला मंदिर आदि मुख्य है।

पौराणिक कथा के अनुसार
भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ था। कृष्ण के मामा कंस से बचाने के लिए उनके पिता वसुदेव कृष्ण को गोकुल ले आये थे। कंस देवकी और वसुदेव के प्रत्येक नवजात शिशु को मार दिया करता था। देवकी और वसुदेव के विवाह के समय आकाश में भविष्यवाणी हुई थी कि देवकी और वसुदेव की आठवी संतान उसका वध करेगी। उसने तभी देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया और उनकी प्रत्येक संतान को मार दिया करता था। जब देवकी और वसुदेव की आठवी संतान हुई तो उसे वह अपने मित्र नंदराय के यहां गोकुल छोड़ कर आ गये। कृष्ण भगवान ने अपना बचपन यहीं पर बिताया था। कंस द्वारा कई बार कृष्ण को मारने के लिए राक्षस भेजे गए पर भगवान कृष्ण द्वारा उनको मार दिया गया। परन्तु नंदराय ने कंस से परशान होकर गोकुल छोड़ दिया और वो सभी ग्रामवासियों को लेकर नंदगाव आ गये। बचपन में कृष्ण भगवान काफी नटखट थे। वह गोपियो की माखन मटकी फोड दिया करते थे और उनके वस्त्र चुरा लिया करते थे। कृष्ण भगवान की छठी के दिन कंस ने पूतना नाम की राक्षसी को भेजा जो कि माता यशोदा से कृष्ण को दूध पिलाने का हठ करने लगी तो माता ने उसे दूध पिलाने की अनुमति दे दी। पूतना ने अपने स्थनो पर विष लगा रखा था ताकि कृष्ण की मृत्यु हो जाये। परन्तु हुआ उसके  विपरीत भगवान कृष्ण ने उसके स्थनो का पान किया और उसका वध कर दिया।

क्या देखें
गोकुल में मुख्य तौर पर नंदरायजी का 84 खम्बों का महल देखने योग्य है। गोकुल का यमुना घाट काफी सुंदर है। यहीं पर भगवान कृ़ष्ण अपने सखाओं के साथ स्नान किया करते थे। जब माता यशोदा कृष्ण को मिट्टी खाने से माना किया। तब उन्होंने कहा माता मैने माटी नही खाई। तो माता ने उनका मुंह खोल कर देखा तो उन्होंने तीनो लोको के दर्शन करा दिये। जगतगुरु बल्‍लभाचार्य के समकालीन मंदिर भी यहा पर मौजूद है। इन मंदिरों में प्रमुख है  गोकुलनाथ, मदनमोहन, विथलनाथ आदि है। गोकुल में भगवान कृष्ण से संबंधित काफी सारे दर्शनीय स्थल है। रमण रेती वह स्थान है जहां पर भगवान कृष्ण अपने सखाओं के साथ खेला करते थे और वहां की मिट्टी में विश्राम किया करते थे। आज भी यहां पर आने वाले यात्रियों को प्रसाद के रूप में मिट्टी दी जाती है। जो गोकुल के उत्‍सवों का आंनद उठाना चाहते हैं उनको अगस्‍त से नवम्‍बर महीने में आना चाहिए।  जन्माष्टमी के उत्सव पर यहां पर विशाल मेले का आयोजन किया जाता है।

गोकुल में मनाए जाने वाले प्रमुख उत्सव
गोकुल में जन्माष्टमी का त्योहार काफी धूमधाम से मनाया जाता है। जन्माष्टमी पर यहां पर विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। भगवान कृष्ण का जन्म रात्रि 12 बजे रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। मध्य रात्रि यहां पर विशेष उत्सव होता है मंगलगान और बधाई गीतो के साथ सभी मंदिरो के कपाट रात्रि 12 बजे खोले जाते है। बलदेवजी का जन्म उत्सव भी काफी धूमधाम से मनाया जाता है। गोवर्धन और दीपावली का त्योहार भी यहां पर काफी धूमधाम से मनाया जाता है। कार्तिक के माह में यहां पर त्रिनवत मेले का आयोजन होता है जिसमे भारी संख्या में श्रद्धालु देश के कोने-कोने से गोकुल आते है।

कहां ठहरें
गोकुल में रहने के लिए काफी संख्या में धर्मशालाएं व होटल है जिनके अंदर रहने व खाने का उचित प्रबंध

गोवर्धन

पसिद्ध तीर्थस्‍थल गोवर्धन


हिंदुओं का पसिद्ध तीर्थस्‍थल गोवर्धन मथुरा से 26 कि.मी. पश्चिम में डिग हाईवे पर स्थित है। कहा जाता है कि यहां के कण-कण में भगवान श्रीकृष्ण का वास है। यहां एक प्रसिद्ध पर्वत है जिसे यह गिरिराज कहा जाता है। यह पर्वत छोटे-छोटे बालू पत्थरों से बना हुआ है। इस पर्वत की लंबाई 8 कि.मी. है।

गोवर्धन में एक कुंड है जिसे मानसी गंगा कहा जाता है। कहा जाता है कि इसका निर्माण भगवान श्रीकृष्‍ण ने किया था। लोगों का मानना है कि इस कुंड में स्‍नान करना गंगा नदी में स्‍नान करने के बराबर है। मानसी गंगा के चारो ओर के घाटों का निर्माण राजा भगवान दास ने 1637 में कराया था। इसकी साज-सज्‍जा भगवान दास के पुत्र राजा मानसिंह द्वारा कराई गई थी। उन्‍होंने ही मानसी गंगा के पवित्र जल तक पहुंचने के लिए सीढियों का निमार्ण कराया था। मानसी गंगा के पास ही लाल बलुए पत्‍थर से निर्मित हरिदेव मंदिर तथा कुसुम सरोवर है। इन दोनों संरचनाओं में भरतपुर के कारिगरों द्वारा खूबसूरत नक्‍काशी की गई है।

गोवर्धन के बारे में
भगवान कृष्ण के पिता नंद महाराज ने एक बार अपने भाई उपनंद से पूछा कि गोवर्धन पर्वत वृंदावन की पवित्र धरती पर कैसे आया? तब उपनंद ने कहा कि पांडवो के पिता पांडु ने भी यही प्रश्‍न अपने दादा भीष्‍म पितामह से पूछा। इस प्रश्‍न के उत्तर में भीष्‍म पितामह ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है।

एक दिन गोलोक वृंदावन में भगवान श्रीकृष्ण ने राधारानी से कहा की जब हम ब्रज भूमि पर जन्म लेंगे तब हम वहां पर अनेक लीलाये रचायेंगें। तब हमारे द्वारा रचाई गई लीला धरतीवासियो के स्मृतियो में हमेशा रहेगी। पर समय परिवर्तन के साथ यह सब चीजे ऐसी नही रह पायेंगी और नष्ट हो जायेंगी। परन्तु गोवर्धन पर्वत और यमुना नदी धरती के अन्त तक रहेगीं। यह सब कथा सुनकर राधारानी प्रसन्न हो गई।

पौराणिक कथाओं के अनुसार
गोवर्धन पर्वत के संबंध कई कथाएं प्रचलित है। एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में पर्वत राज ओरोंकल की पत्‍नी सलमनी द्वीप ने गोर्वधन नाम के पुत्र को जन्म दिया। गोर्वधन के जन्म के समय आसमान से सभी देवी-देवताओं ने फूलों की वर्षा की और अपसराओ ने नृत्य किया। सभी ने मंगल गान और बधाई गीत गाये। सभी ने उसे गोलोक वृंदावन के मस्तिष्‍क पर अवतरित हुआ अनमोल रत्‍न कहा।

कुछ समय पश्‍चात सतयुग के प्रारंभ में परमज्ञानी पुलस्थय मुनि ने सलमनी द्वीप का भ्रमण किया। उन्होंने वहां पर गोवर्धन पर्वत को देखा जो कि विसर्पी पौधे, फूल, नदियों, गुफाओं और चू-चू करते हुए पक्षियों के कारण अति सुंदर लग रहा था। जिसे देख उनके मन मे कपट आ गया। वह ओरोंकल से मिलने के लिए आए, ओरोंकल ने उनका सम्मान किया और अपने आप को उनकी सेवा मे सर्मपित कर दिया।

पुलस्थय मुनि ने ओरोंकल से कहा कि वह कली से आये हैं जो कि एक पवित्र तीर्थ स्थल है। यह गंगा के किनारे पर स्थित है। परन्तु वहां पर कोइ भी सुंदर पर्वत नही है। फिर उन्होंने कहा राजन तुम गोर्वधन को मुझे दे दो। यह सुनने के बाद ओरोंकल ने मुनि से प्रार्थना की कि मान्यवर यह ना मांगे। इसके बदले कुछ भी मांग लें मैं दे दूंगा। मुनि ने कहा राजन तुम हमारी आज्ञा का उल्लंघन कर रहे हो। मुनि की यह बात सुन कर राजा रोने लगे। राजा गोवर्धन से अपनी जुदाई को सहन नहीं कर पा रहे थे। यह सब बातें गोवर्धन सुन रहे थे। उन्होंने कहा महर्षि आप मुझे कैसे कली तक लेकर जाएंगें। मुनि ने कहा मै तुम्हे अपने दायें हाथ पर रख कर लेकर जाऊंगा। गोवर्धन ने कहा मुनिराज मैं आपके साथ चलूंगा परन्तु एक शर्त है। गोवर्धन ने कहा कि आप मुझे ले जाते समय जहां भी रख देंगे मैं वहीं पर स्थिर हो जाऊंगा। उससे आगे नहीं जाऊंगा। मुनि गोवर्धन की शर्त मान गये।

मुनि ने गोवर्धन को अपने दाये हाथ पर रख लिया और कली के लिये चल दिये। जब वह ब्रज की ओर से गुजरे, गोर्वधन को अनुभव हुआ कि जरूर यह कोई पवित्र स्थल है। उनके मन मे विचार आया कि वह यहीं रूक जाये। परन्तु वह अपने वचन के कारण विवश थे। तभी पुलस्‍थय मुनि के अन्दर एक प्रकृतिक अनुभव आया और वह ध्यान मुद्रा मे जाने लगे। इसके लिए उन्हें गोवर्धन को अपने हाथ से उतारना पड़ा। फिर क्या था गोवर्धन वहीं पर स्थिर हो गये। जब मुनि ने अपनी साधना समाप्त की और वह गोवर्धन को अपने साथ ले जाने लगे तब गोवर्धन ने अपनी शर्त याद दिलाया और कहा मुनि राज आप अपने वचनानुसार मुझे और आगे नही ले जा सकते। यह वचन सुन कर मुनि क्रोधित हो गये और गोवर्धन को श्राप दे दिया। और कहा तुम प्रति दिन एक तिल नीचे घरती में धसते चले जाओंगे। इसी श्राप के कारण गोवर्धन एक तिल कर नीचे धसते चले जा रहे हैं। जब सतयुग में गोवर्धन धरती पर आये थे, वो आठ योजन लम्बे, पांच योजन चौड़े और दो योजन उंचे थे। उनको मिले श्राप के कारण कहा जाता है कलयुग के 10 हजार वर्ष पूरे हो जाने पर गोवर्धन पूरी तरह से धरती मे समाहित हो जायेंगे।

एक अन्‍य पौराणिक कथा भी गोवर्धन के बारे में प्रचलित है। इसके अनुसार गोवर्धन को त्रेता युग का माना जाता है। रावण से सीता को छुडा़ने के लिए भगवान राम को लंका पर चढाई करना जरुरी था। इसके लिए विशाल समुद्र को पार करने के लिए उन्‍हें सेतु की आवश्यकता पड़ी। सेतु बनाने के उन्‍होंने अपनी वानर सेना को पत्थरो की खोज में भेजा। हनुमान पत्थर लेने के लिए हिमालय पर गये और वहां से गोवर्धन पर्वत को अपने साथ लाने लगे तभी उन्हें सूचना मिली की सेतु निर्माण कार्य पूरा हो चूका है। उस समय हनुमान ब्रज भूमि से गुजर रहे थे, उन्होंने गोवर्धन को वहीं पर छोड़ दिया। तब गोवर्धन पर्वत ने हनुमान से कहा कि भगवन मुझसे क्या गलती हो गई जो आप मुझे नहीं ले जा रहे हैं। यह कह कर गोवर्धन रोने लगे। तभी हनुमान ने भगवान राम का ध्यान किया और यह सब कथा विस्तार से कही। फिर उत्तर में भगवान राम ने कहा गोवर्धन से कहो कि जब हम द्वापर युग में कृष्ण अवतार लेंगें तो सात दिन और सात रातों तक उसे अपनी उंगली पर धारण करेंगे। तभी से गोवर्धन की पूजा मेरे रूप में होने लगेगी। यह वचन सुन कर गोवर्धन खुश हो गये और प्रभु की महिमा का गुणगान करने लगे।

गोवर्धन परिक्रमा
गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा 23 कि.मी. की है जिसे पूर्ण करने मे 5 से 6 घंटे का समय लगता है। गोवर्धन की परिक्रमा पर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या काफी अधिक है। पूरे भारत वर्ष से श्रद्धालु यहां पर आकर भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त करते है। विशेष पर्वों पर यहां पर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या मे भारी वृद्धि हो जाती है। यहा के प्रमुख पर्व गोवर्धन और गुरू पूर्णिमा हैं। इन दोनों पर्वों पर तो संख्या 5 लाख को भी पार कर जाती है। वैसे प्रत्येक महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी से पूर्णिमा तक यहां पर मेले का आयोजन किया जाता है। परिक्रमा करते हुए यात्री राधे-राधे बोलते है जिसके कारण सारा वातावरण राधामय हो जाता है। वैसे परिक्रमा करने का कोई निश्चित समय नहीं है। परिक्रमा कभी भी की जा सकती है। साधारण रूप से परिक्रमा करने में 5 से 6 घंटे का समय लगता है। परन्तु दण्डवत परिक्रमा करने वाले को एक हफ्ता लग जाता है। दण्डवत परिक्रमा करने वाले लेट कर परिक्रमा करते हैं और जहां पर विश्राम लेना होता है वहां पर चिन्ह लगा देते है। विश्राम करने के पश्‍चात फिर चिन्ह लगे स्थान से ही पुन परिक्रमा प्रारंभ कर देते है। कुछ साधु 108 पत्थर के साथ परिक्रमा करते हैं। वह एक-एक कर अपने पत्थरों को आगे रखते रहते हैं और धीर-धीर आगे बढते रहते हैं। वे अपनी परिक्रमा को महीनो में पूरा कर पाते है। जिस स्थान पर रूक जाते है वहीं से परिक्रमा प्रारंभ करते है। साधु परिक्रमा मार्ग मे ही विश्राम करते हैं। वह किसी अन्य स्थान पर जाकर विश्राम नही कर सकते है। यह परिक्रमा का नियम है।

परिक्रमा मार्ग के प्रमुख दर्शनीय स्थल
परिक्रमा मार्ग मे अनेक दर्शनीय स्थल हैं। जिनमे से कुछ अति महत्वपूर्ण हैं। परिक्रमा मार्ग मे मंदिरो की संख्या काफी अधिक है जो बहुत ही भव्य और सुन्दर है। परिक्रमा मार्ग मे अनेक कुण्ड पड़ते है जिसमें से प्रमुख हैं राधा कुण्ड और कृष्ण कुण्ड। राधा कुण्ड को राधा रानी ने अपने कंगन से और कृष्ण कुण्ड को कृष्ण भगवान ने अपनी मुरली से बनाया था। कहा जाता है इन कुण्डो का निमार्ण कृष्ण भगवान ने गौ हत्या के पाप से मक्ति पाने के लिए किया था। एक समय भगवान कृष्ण अपनी गायों को चराने के लिए जा रहे थे उसी समय एक राक्षस उनकी गायों मे गाय का रूप बना कर आ गया और उत्पात मचाने लगा। भगवान कृष्ण ने उसे पहचान लिया और उसका वध कर उसकी करनी का दण्ड दिया। वध करने के पश्‍चात भगवान कृष्ण राधा से मिलने गये। राधा ने कहा कि मैं  आपसे नहीं मिलूंगी आपको गौ हत्या का आप लग गया है। पहले इस पाप से मुक्ति पाओ फिर हम से मिलो। इसी के लिए भगवान कृष्ण ने इन कुण्डों का निर्माण किया। परिक्रमा मार्ग मे ही कुसुम सरोवर है जो कि बहुत ही सुन्दर है। परिक्रमा मार्ग मे आगे बढने पर मानसी गंगा आती है जिसे भगवान कृष्ण ने बनाया था। इसमें स्नान का महत्‍व गंगा मे स्नान के बराबर है। परिक्रमा की शुरूआत दान घाटी मंदिर से की जाती है और इसकी समाप्ति भी इसी मंदिर पर होती है। इसी स्थान पर राधा जी ने कृष्ण भगवान को दान दिया था। इसी कारण यह स्थान दान घाटी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यही पर गोवर्धन  की शीला का दूधाभिषेक किया जाता।

राधा कुण्ड मे प्रमुख स्नान
राधा कुण्ड में अहोई अष्टमी को विशेष स्नान होता है। यह स्नान अश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को किया जाता है। इसमें बड़ी संख्‍या में लोग आते हैं।  मान्यता है कि यदि किसी स्‍त्री के संतात न होती हो तो यदि वह यहां पर आकर स्नान कर ले तो उसे भगवान कृष्ण की कृपा से संतान प्राप्ति हो जाती है। इस दिन यहां पर विशाल मेले का आयोजन किया जाता है।

परिक्रमा करते समय बरते जाने वाली सावधानियां
1. परिक्रमा करते वक्त यात्रियों को गाय, साधुओं, पेड़ो, विसर्पी पौधो आदि का सम्मान करना चाहिए।
2. परिक्रमा मार्ग में किसी भी व्यक्ति पर क्रोध नही करना चाहिए और न ही किसी को अपशब्द बोलना चाहिए।
3. परिक्रमा करते वक्त जूते नहीं पहनने चाहिए तथा कपड़े साफ होने चाहिए।
4. परिक्रमा शुरू करने से पूर्व अपने दांत ठीक प्रकार से साफ कर लेने चाहिए।
5. ध्यान रहे परिक्रमा करते वक्त किसी भी जीव-जन्तु की हत्या न हो जाए। इसलिए ध्यान से चलना चाहिए।
6. परिक्रमा करते वक्त यदि किसी स्थान पर विश्राम के लिए रूकते है तो उसी स्थान से परिक्रमा पुन: प्रारंभ करनी चाहिए जिस स्थान पर रूके थे।
7. परिक्रमा अधूरी नहीं छोड़नी चाहिए।
8. महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान परिक्रमा नहीं करनी चाहिए।
9. यदि कोई व्यक्ति तनाव ग्रस्त है तो उसे उसका त्याग कर परिक्रमा करनी चाहिए।
10. परिक्रमा करते समय राधा-कृष्ण का नाम उच्चारण करना चाहिए।

गोवर्धन का महत्व
गोवर्धन का वर्णन हमारे वेदो में भी विस्तार पूर्वक पाया जाता है। वेदो के अनुसार गोवर्धन एक बहुत ही पवित्र पर्वत है। इसे कोई साधारण पर्वत नही समझना चाहिए। यह पूरे विश्व का सर्वाधिक पूजनीय पर्वत है। गोवर्धन विश्व ही नहीं पूरे ब्रह्माण्‍ड के लिए पूजनीय है। इसे धरती के सबसे अनमोल रत्‍न और इसके ताज की उपाधि दी गई है। वेदो के अनुसार गोवर्धन दो तरह से जाना जाता है। एक तो भगवान कृष्ण के रूप मे और दूसरा पर्वतों के राजा गिरिराज के रुप में।

कृष्ण भगवान द्वारा गोवर्धन की पूजा
कृष्ण ने अवतार काल में गोवर्धन की पूजा कराई थी। इससे पूर्व ब्रजवासी इन्द्र की पूजा किया करते थे। उनका मानना था कि यदि इन्द्र उन पर प्रसन्न रहेंगे तो ब्रज में खुशहाली बनी रहेगी और उनके खेत हरे-भरे रहेंगे। परन्तु कृष्ण भगवान ने उन्हे समझाया और कहा वास्तव में ब्रज की खुशहाली का कारण गोवर्धन है। यह उनकी गायों के लिए एक वरदान है। जहां से वह अपना भरण-पोषण करती है। वहां से वह हरी-भरी घास खाती है। जिसके कारण वह अधिक दूध देती है। उसी दूध से मख्खन, घी, मेवा और मिष्ठान तैयार होते हैं। यदि गोवर्धन न होता तो हमारी गाय कहां चरने जाती?  इस लिए हमे गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए। ब्रजवासियों ने कृष्ण भगवान के कहने पर गोवर्धन की पूजा प्रारंभ कर दी। इस प्रकार ब्रज मे गोवर्धन पूजा की प्रथा प्रारंभ हो गयी। इस कारण इन्द्र को क्रोध आ गया और उन्होंने पूरे ब्रज में भारी वर्षा प्रारंभ कर दी। इस कारण पूरे ब्रज में हा-हाकार मच गया, बाढ आ गई। ब्रजवासियो की रक्षा के लिए भगवान कृष्ण सभी को गोवर्धन की शरण में लेकर आ गये। उन्होंने गोवर्धन से प्रार्थना की और कहा हमें शरण दें। फिर भगवान कृष्ण ने गोवर्धन को अपनी अनामिका पर उठा लिया और सभी लोगो को उसके नीचे आने के लिए कहा। कृष्ण द्वारा सभी लोगो की रक्षा की गई। इन्द्र ने सात दिन और रात तक वर्षा की फिर भी वह ब्रजवासियो का कुछ भी बाल बंका नही कर पाए। इस प्रकार उनका घमण्ड चूर हो गया उन्‍हें अपनी गलती का अहसास हुआ।

गोवर्धन मे मनाए जाने वाले त्यौहार
वैसे तो गोवर्धन मे सभी त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता है। पर गोवर्धन और जन्माष्टमी अधिक धूमधाम से मनाये जाते है। गोवर्धन का त्यौहार कार्तिक मास मे शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि को मनाया जाता है। इसी दिन भगवान कृष्ण ने गोवर्धन को धारण किया था। जिस स्थान पर भगवान ने गोवर्धन को अपनी उंगली पर धारण किया था वह स्थान जतीपुरा के नाम से प्रसिद्ध है। यह स्‍थान गोर्वधन की परिक्रमा मार्ग मे ही आता है।

कहां ठहरें
वैसे तो ठहरने के लिए गोवर्धन में कई छोटे-छोटे होटल और धर्मशालाएं है। लेकिन प्रमुख होटल यहां से कुछ ही दू

मथुरा रेलवे स्टेशन काफ़ी व्यस्त जंक्शन है और दिल्ली से दक्षिण भारत या मुम्बई जाने वाली सभी ट्रेने मथुरा होकर गुजरती हैं। सडक द्वारा भी पहुंचा जा सकता है। आगरा से मात्र 55 किलोमीटर दूर है। वृन्दावन पहुचने के लिये यह वृन्दावन की वेबसाईट काफी सूचना देती हे| स्टेशन के आसपास कई होटल हैं और विश्राम घाट के आसपास कई कमखर्च वाली धर्मशालाएं रूकने के लिए उपलब्ध हैं। घूमने के लिए टेक्सी कर सकते हैं, जिससे मथुरा, वृन्दावन एक दिन में घूमा जा सकता है। अधिकतर मंदिरों में दर्शन सुबह १२ बजे तक और सांय ४ से ६-७ बजे तक खुलते हैं, दर्शनार्थियों को इसी हिसाब से अपना कार्यक्रम बनाना चाहिए। आटो और तांगे भी उपलब्ध है। यमुना में नौका विहार और प्रातःकाल और सांयकाल में विश्राम घाट पर होने वाली यमुना जी की आरती दर्शनीय है। गोकुल की ओर जाने के लिये आधा दिन और लगेगा, उसके बाद गोवर्धन के लिये निकल सकते हैं । गोवर्धन के लिये बस से उपलब्ध है। राधाष्टमी का उत्सव वृन्दावन मे धूम से मनाया जाता

रानीखेत

एक छोटा लेकिन बेहद खूबसूरत हिल स्टेशन


परिचय- प्रकृति प्रेमियों का स्वर्ग रानीखेत समुद्र तल से 1824 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक छोटा लेकिन बेहद खूबसूरत हिल स्टेशन है। उत्तराखंड की कुमाऊं की पहाड़ियों के आंचल में बसा रानीखेत फिल्म निर्माताओं को भी बहुत पसन्द आता है। राजा हिन्दुस्तानी समेत अनेक फिल्में यहा बनी हैं। रानीखेत में प्रकृति की हसीन वादियों में देवदार और पाइन के घने वन और हिमालय की विस्तृत पर्वतमाला देखने दूर-दूर से सैलानियों का आना जाना लगा रहता है।

लोगों का मानना है कि कुमाऊं के राजा सुखरदेव की पत्नी रानी पद्मावति ने जब रानीखेत की सुंदरता देखी तो उन्होंने यहां रहने को निश्चय कर लिया। तब से इस स्थान का रानीखेत अर्थात् रानी का खेत कहा जाता है। रानीखेत और इसके आसपास के क्षेत्रों में कुमाऊंनी शासकों का शासन था। बाद में अग्रेजों का इस पर नियंत्रण हो गया। उन्होंने रानीखेत को हिल रिजॉर्ट के रूप में विकसित किया और 1869 ई. में यहां अपनी छावनी स्थापित की। रानीखेत आज की कुमाऊं रजिमेन्ट का मुख्य केन्द्र है।

आगरा

ताज की नगरी


ताज की नगरी आगरा सिर्फ उत्तर प्रदेश का ही नहीं बल्कि भारत का गौरव है। अपनी ऐतिहासिक इमारतों के लिए मशहूर यह शहर देश-विदेश के बीच लोकप्रिय पर्यटक स्‍थल के रूप में जाना जाता है। यहां की प्राचीन धरोहर मुगल काल की याद ताजा कर देती हैं। बात चाहे मोहब्‍बत की निशानी ताजमहल की हो या आगरा किले की, हर इमारत एक से बढ़कर एक है। आगरा किले में आज भी शाहजहां की अंतिम दिनों की तन्‍हाई को महसूस किया जा सकता है। आगरा के पास ही बसे फतेहपुर सीकरी में सलीम चिश्‍ती की दरगाह पर दुआएं मांगने वालों का तांता लगा रहता है। मुगल वास्‍तुशिल्‍प का अनोखा रूप दिखलाता आगरा सैलानियों को इतिहास के करीब ले जाता है। फोटो गैलरी देखें

ताजमहल
आगरा का वर्णन ताजमहल के बिना अधूरा ही माना जाता है। बहुत से लोग तो ताजमहल के कारण ही आगरा को जानते हैं। ताजमहल को मुगलों द्वारा बनवाई गई सर्वश्रेष्‍ठ स्‍मारक माना जाता है। 1983 में इसे यूनेस्‍को की विश्‍व धरोहर सूची का हिस्‍सा बनाया गया। उस्‍ताद अहमद लाहौरी को ताजमहल का प्रधान शिल्‍पकार माना जाता हे। इसके बारे में कहा जाता है इसकी बनावट और सजावट पर इतिमद-उद-दौला के मकबरे का प्रभाव पड़ा है।
दुनिया के सात अजूबों में शामिल ताजमहल को मुगल सम्राट शाहजहां ने अपनी प्रिय पत्‍नी मुमताज महल की याद में बनवाया था। यमुना नदी के तट पर स्थित प्रेम की इस निशानी को बनाने में लगभग 20 वर्ष का समय लगा था। 1631 में ताजमहल का निर्माण कार्य शुरू हुआ था और 1653 में कहीं जाकर यह पूरी तरह से बनकर तैयार हो सका। इसे बनवाने के लिए राजस्‍थान के मकराना से सफेद संगमरमर मंगवाया गया था। इसकी नींव और दरवाजों पर लगे बलुआ पत्‍थरों को फतेहपुर सीकरी से मंगवाया गया था। ताजमहल में की गई बेहद बारीक नक्‍काशी और सजावट जैसा अन्‍य उदाहरण मिलना संभव नहीं है। इसमें की गईं फूल और पत्तियों की नक्‍काशियां एकदम सजीव प्रतीत होती हैं। इसकी सजावट में अनेक बहुमूल्‍य रत्‍नों का भी प्रयोग किया गया है। कहा जाता है कि ताजमहल जैसा खूबसूरत स्‍मारक कहीं और न बन सके इसलिए शाहजहां ने इसके कारीगरों के हाथ कटवा दिए थे और जीवन भर उनके परिवार का पालन पोषण किया था। 42 एकड में फैले इस भव्‍य इमारत को देखने के लिए दुनियाभर से लोगों का आना जाना लगा रहता है। चांदनी रात में इसकी सुंदरता में और निखार आ जाता है। ताजमहल के निचले तल में मुमताज महल की कब्र बनी है। बाद में शाहजहां की कब्र को भी यहां बनाया गया।


आगरा किला
अकबर सबसे प्रमुख मुगल शासक था। उसके शासनकाल में आगरा को अकबरबाद का नाम से पुकारा जाता था। उसने लोदी किले के स्‍थान पर नई शैली का आगरा किला बनवाया। इस किले का निर्माण सैन्‍य उद्देश्‍य से 1565 ईसवी में किया गया था। शहर के बीच में स्थित यह किला ताजमहल के बाद आगरा का सबसे प्रमुख पर्यटक स्‍थल है। वैसे तो इस किले का बनाने का मकसद सैन्‍य था, लेकिन अपने शासनकाल में शाहजहां ने इसका एक हिस्‍सा महल में बदल दिया था। अमर सिंह दरवाजा आगरा किले में प्रवेश का एकमात्र द्वार है। यहां से ताज का मनमोहक नजारा दिखाई देता है।


किले में अंदर आज भी मुगल काल को महसूस किया जा सकता है। इसी किले में औरंगजेब से अपने पिता शाहजहां को सात सालों तक कैद रखा। किले में कई खूबसूरत कमरे और पेवेलियन हैं जिनमें से दीवान-ए-आम और दीवाने-ए-खास सबसे महत्‍वपूर्ण हैं। इसके अलावा किले में कुछ सुंदर मस्जिदें और महल भी हैं जिनमें से अधिकांश का निर्माण शाहजहां ने करवाया था। इनमें से शीश महल और खास महल की खूबसूरती देखते ही बनती है। अंगूरी बाग की सैर करना न भूलें जो आंखों को बहुत सुकून पहुंचाता है। संगमरमर से बना मुसम्‍मान बुर्ज भी दर्शनीय है। यहीं से ताजमहल को देखतें हुए शाहजहां ने अपने अंतिम दिन व्‍यतीत किए थे।

आगरा किले के अंदर कुछ प्रमुख स्‍मारक इस प्रकार हैं:
दीवान-ए-आम
इस ढ़ांचें का निर्माण मूल रूप से लकड़ी से किया गया था लेकिन बाद में शाहजहां से उसे वर्तमान रूप प्रदान किया। इसपर शाहजहां शैली के प्रभाव को स्‍पष्‍ट रूप से देखा जा सकता है जो संगमरमर पर की गई फूलों की नक्‍काशी से पता चलती है। इस कमरे में राजा आम जनता की फरियाद सुनते थे और अधिकारियों से मिलते थे। दीवान-ए-आम से एक रास्‍ता नगीना मस्जिद और महिला बाजार की ओर जाता है जहां केवल महिलाएं ही मुगल औरतों को सामान बेच सकती थीं।


दीवान-ए-खास
यह कमरा केवल निजी लोगों के लिए था। इसका निर्माण भी शाहजहां ने करवाया था। यह कमरा दो हिस्‍सों मे बंटा हुआ है जो तीन बुर्जों से आपस में जुड़ा हुआ है। यहीं से प्रसिद्ध मयूर सिंहासन को औरंगजेब दिल्‍ली ले गया था जो बाद में इरान ले जाया गया।
अष्‍ठभुजीय इमारत
खूबसूरती से तराशी गई यह इमारत दीवान-ए-खास के पास स्थित है। यही वह जगह है जहां औरंगजेब की कैद में शाहजहां ने अपनी जिंदगी के आखिरी सात साल बिताए। माना जाता है कि यहां से ताज का सबसे सुंदर नजारा दिखाई पड़ता है जो अधिक प्रदूषण के कारण अब अधिक स्‍पष्‍ट नहीं होता।
समय: सूर्योदय से सूर्यास्‍त
शो टाइम: अंग्रेजी में शाम 7.30, हिंदी में रात 8.30

चीनी का रौजा
यह मकबरा शिराज के अल्‍लमा अफजल खल मुल्‍लाह शुक्रुल्‍लाह को समर्पित है। शुक्रुल्‍लाह मश्‍हूर पारसी कवि और विद्वान थे जो बाद में शाहजहां के प्रधानमंत्री भी बने। 1635 में बनी इस खूबसूरत मकबरे का नाम इसको बनाने में इस्‍तेमाल हुए पत्‍थरों के नाम पर पड़ा। यह  मकबरा उस समय मुगल वास्‍तुशिल्‍प पर पारसी प्रभाव का दर्शाता है। इतिमद-उद-दौला से एक किमी. से भी कम दूरी पर स्थित इस इमारत के ऊपर गोलाकार गुंबद है। इसे देखकर बताया जा सकता है कि यह आगरा की एकमात्र पारसी इमारत है। गुंबद की भीतरी छत पर तस्‍वीरों और इस्‍लामिक लिखावट के चिह्न देखे जा सकते हैं। गुंबद के ऊपर कुराने की कुछ आयतें खुदी हुई हैं।

लोकेशन: पश्चिमी युपी, गंगा, यमुना के उपजाऊ क्षेत्र मथुरा से 56 किमी. दूर                      
दूरी: दिल्ली से 203 किमी. दूर, लखनऊ से 365 किमी. दूर    

घूमने का समय: आगरा घुमने का सबसे अच्छा मौसम सर्दियों का है विशेषकर नवम्बर से मार्च तक का मौसम।आगरा कैसे पहुंचे
वायु मार्ग:  दिल्ली से आगरा तक सीधी विमान सेवा है जो आपको खेडिया हवाई अड्डे पर पहुंचा देती है। एलियांस विमान सेवा सप्ताह में तीन दिन वहां के फेर लगाती है।
रेल मार्ग:  आगरा के सबसे समीप चार स्टेशन हैं आगरा कैंट, आगरा फोर्ट, ईदगाह आगरा जंक्शन और राजा की मंडी। आगरा में भारत और विदेशों से सबसे ज्यादा पर्यटक आते है। मुंबई से आगरा के लिए प्रतिदिन चार रेल हैं। कोलकाता से प्रतिदिन तुफान एक्सप्रेस सुपरफास्ट ट्रेन आगरा पहुंचती है।
सडक मार्ग:  आगरा सड़क मार्ग द्वारा भी देश के विभिन्न भागों से जुड़ा हुआ है। दिल्ली से आगरा तक अच्छी बस सेवा है। अपने वाहन से भी यहां पहुंचा जा सकता है। कलकता से आगरा राष्ट्रीय राजमार्ग 2 से जुड़ा हुआ है। आगरा पहुंचने के लिए पहले लखनऊ पहुंचिए वहां से कानपुर 77 किमी. की दूरी पर है वहां से आगरा पहुंचने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग 2 पर दायीं तरफ मुडिए।


कौसानी




यहां से बर्फ से ढ़के नंदा देवी पर्वत की चोटी का नजारा बडा भव्‍य दिखाई देता हैं


उत्तराखंड राज्‍य के अल्‍मोड़ा जिले से 53 किमी. उत्तर में स्थित है कौसानी, भारत का खूबसूरत पर्वतीय पर्यटक स्‍थल। हिमालय की खूबसूरती के दर्शन कराता कौसानी पिंगनाथ चोटी पर बसा है। यहां से बर्फ से ढ़के नंदा देवी पर्वत की चोटी का नजारा बडा भव्‍य दिखाई देता हैं। कोसी और गोमती नदियों के बीच बसा कौसानी भारत का स्विट्जरलैंड कहलाता है। यहां के खूबसूरत प्राकृतिक नजारे, खेल और धार्मिक स्‍थल पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

क्‍या देखें
अनासक्त‍ि आश्रम
इसे गांधी आश्रम भी कहा जाता है। इस आश्रम का निमार्ण महात्‍मा गांधी को श्रद्धांजली देने के उद्देश्‍य से किया गया था। कौसानी की सुंदरता और शांति ने गांधी जी को बहुत प्रभावित किया था। यहीं पर उन्‍होंने अनासक्ति योग नामक लेख लिखा था। इस आश्रम में एक अध्‍ययन कक्ष और पुस्‍तकालय, प्रार्थना कक्ष (यहां गांधी जी के जीवन से संबंधित चित्र लगे हैं) और किताबों की एक छोटी दुकान है। यहां रहने वालों को यहां होने वाली प्रार्थना सभाओं में भाग लेना होता है। यह पर्यटक लॉज नहीं है। इस आश्रम से बर्फ से ढके हिमालय को देखा जा सकता है। यहां से चौखंबा, नीलकंठ, नंदा घुंटी, त्रिशूल, नंदा देवी, नंदा खाट, नंदा कोट और पंचचुली शिखर दिखाई देते हैं।
प्रार्थना का समय: सुबह 5 बजे और शाम 6 बजे (गर्मियों में शाम 7 बजे)
दूरभाष: 05962-258028


बागेश्‍वर (42 किमी)
बागेश्‍वर गोमती और सरयु नदी के संगम पर स्थित है। इस मंदिर का परिसर आकर्षण का मुख्‍य केंद्र है। इसका निर्माण 1602 में लक्ष्‍मी चंद ने कराया था। मंदिर में स्‍थापित मूर्तियां 7वीं शताब्‍दी से लेकर 16वीं शताब्‍दी के मध्‍य की हैं। जनवरी में मकर संक्रांति के आस पास लगने वाले उत्तरायणी मेले में बड़ी संख्‍या में लोग यहां आते हैं। बागेश्‍वर से कुछ ही दूरी पर नीलेश्‍वर और भीलेश्‍वर की पहाडि़यों पर चंडिका मंदिर और शिव मंदिर भी हैं।


जिम कार्बेट नेशनल पार्क

टाइगर, तेंदुओं और हाथियों के अलावा बहुत से दुर्लभ पशुओं व पक्षियों को देखा जा सकता है


उत्तराखंड राज्य के नैनीताल के निकट हिमालय की पहाड़ियों पर स्थित जिम कार्बेट नेशनल पार्क विविध वन्य जीवों और वनस्पतियों के लिए जाना जाता है। पार्क में बड़ी तादाद में टाइगर, तेंदुओं और हाथियों के अलावा बहुत से दुर्लभ पशुओं व पक्षियों को देखा जा सकता है। लगभग 318 वर्ग किमी. के क्षेत्र में फैला जिम कार्बेट नेशनल पार्क 1936 में हैली नेशनल पार्क के रूप में स्थापित किया गया था। हैली उस समय उत्तर प्रदेश के गवर्नर थे। 1957 में इस पार्क का नाम बदलकर जिम कार्बेट नेशनल पार्क रख दिया गया। जिम कार्बेट एक शिकारी था लेकिन उसकी रुचि पर्यावरण में भी थी। वह अपना अधिकांश समय पार्क को विकसित करने में व्यतीत करने में बिताया करता था। उसी के नाम पर पार्क का नाम रखा गया। प्रोजेक्ट टाइगर के अधीन आने वाला यह भारत का प्रथम राष्ट्रीय पार्क है। टाइगरों की घटती संख्या पर अंकुश लगाने के लिए इस पार्क को 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर के अधीन लाया गया। प्रारंभ में इस पार्क में अंग्रेज शिकार खेला करते करते थे। इसी पार्क से होकर रामगंगा नदी बहती है जो पार्क की खूबसूरती में चार चांद लगाती है।

आकर्षण
जंगली जीव- पर्यटक यहां मुख्य रूप से टाइगरों को देखने आते हैं। टाइगरों के अलावा हाथी, पैंथर, जंगली बिल्ली, फिशिंग केट्स, हिमालयन केट्स, हिमालयन काला भालू, स्लोथ बीयर, हिरन, होग हिरन, बार्किग हिरन, घोरल, जंगलीबोर, पैंगोलिन, भेड़िए, मार्टेन्स, ढोल, सिवेट, नेवला, ऊदबिलाव, खरगोश, चीतल, सांभर, हिरन, लंगूर, नीलगाय आदि पशुओं को यहां देखा जा सकता है। यहां बहने वाली नदियों में घडियालों को भी देखा जा सकता है।

पक्षी- कार्बेट में लगभग 600 पक्षियों की प्रजातियां पाई जाती हैं। यहां बगुला, डार्टर, जलकौवा, टिटहरी, पैराडाइज फ्लाईकैचर, मुनिया, वीवर बर्ड्स, फिशिंग ईगल, सर्पेन्ट ईगल, जंगली मुर्गा, मैना, मोर, बार्बेट, किंगफिशर, बत्तख, गीज, सेंडपाइपर, नाइटजार, पेराकीट्स, उल्लू, कुक्कु, कठफोडवा, चील आदि पक्षियों की प्रजातियां पाई जाती हैं।

वनस्पतियां- कार्बेट नेशनल पार्क पहाड़ियों और नदियों के बीच बसा हुआ है। पार्क का निचला हिस्सा शाल के पेड़ों से घिरा हुआ है। जबकि ऊपरी हिस्से के पेड़ पौधों में विविधता पाई जाती है। दूरस्थ क्षेत्र में चिर, अनौरी और बकली के पेड़ देखने को मिलते हैं। पार्क के कुछ हिस्सों में बांस की विभिन्न किस्में देखी जा सकती हैं।

जीप सफारी- पार्क में घूमने के लिए जीप सफारी सबसे सुविधाजनक माध्यम है। रामनगर के टूरिस्ट लॉज और अन्य टूरिस्ट एजेन्सियों से जीप किराए पर मिल सकती हैं। जीप सफारी से जंगल और जंगली पशुओं को देखने का अपना ही मजा है।

हाथी सफारी- कार्बेट नेशनल पार्क में टाइगरों को देखने के लिए हाथी की सवारी सबसे बेहतर और उपयुक्त मानी जाती है। हाथी सफारी का अनुभव अविस्मरणीय होता है। पार्क में विभिन्न प्रजातियों के पक्षी, सरीसृपों, स्तनपायी और जानवरों को नजदीक से देखने के लिए हाथी सफारी का आनंद लिया जा सकता है।

कैसे जाएं
वायुमार्ग- कार्बेट से 50 किमी. दूर पंतनगर में स्थित फूलबाग नजदीकी एयरपोर्ट है। फूलबाग से बस या टैक्सी के माध्यम से कार्बेट पहुंचा जा सकता है।

रेलमार्ग- कार्बेट से 21 किमी. दूर रामनगर नजदीकी रेलवे स्टेशन है। रामनगर से सड़क मार्ग के द्वारा कार्बेट पहुंचा जा सकता है।

सड़क मार्ग- कार्बेट दिल्ली से लगभग 280 किमी. की दूरी पर है। दिल्ली से मुरादाबाद हापुड़ और गजरौला होते हुए रामनगर पहुंचा जा सकता है। दिल्ली परिवहन निगम की बसें रामनगर तक जाती हैं। लखनऊ से भी रामनगर के लिए बसों की व्यवस्था है।

 कब जाएं- 15नवंबर से 15 जून तक की अवधि सबसे उपयुक्त मानी जाती है। 16 जून से 14नवंबर तक पार्क बंद रहता है।

पर्यटन कार्यालय
वाइल्ड लाइफ फोरस्ट डिपार्टमेंट ऑफिस
द डाइरेक्टर, कार्बेट टाइगर रिजर्व
रामनगर- 244715
जिला- नैनीताल
दूरभाष- 05947-253977
पार्क रिसेप्सन दूरभाष- 251489
फैक्स- 251376
ईमेल- info


बागेश्रवर

बागेश्रवर को ''देवताओं का घर' के रूप में जाना जाता है


बागेश्रवर भारतीय राज्य उत्तरांचल का एक जिला है । बागेश्रवर को ''देवताओं का घर' के रूप में जाना जाता है। यह एक महत्‍वपूर्ण धार्मिक एवं पर्यटन स्‍थल है। यह अल्‍मोड़ा से 90 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। इसी स्‍थान पर सरयू और गोमती नदियों का संगम भी होता है। यह स्‍थान प्रमुख रूप से पुराने बाघनाथ मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। इसके अलावा यह स्‍थान जनवरी माह में लगने वाले उत्तरायनी मेले के लिए भी प्रसिद्ध है। यह खूबसूरत शहर रोमांचकारी खेल प्रेमियों के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। वहीं बागेश्रवर में प्रसिद्ध पिंदारी, सुंदरदुंगा और कफनी ग्‍लैशियर भी स्थित है।

कहां जाएं                                               फोटो गैलरी देखें
बाघनाथ मंदिर- यह एक ऐतिहासिक और धार्मिक स्‍थान है। बागेश्रवर का यह नाम यहां स्थित पुराने शिव मंदिर के नाम पर रखा गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यहां पर ऋषि मार्कंडे रहा करते थे और इस स्‍थान पर भगवान शिव बाघ के रूप में घूमा करते थे। इस पवित्र मंदिर का निर्माण चंद शासन के दौरान बनवाया गया। ऐसा माना जाता है कि इस स्‍थान पर कोई भी शिवलिंग को स्‍थापित नहीं कर पाया था। तब आखिर में श्री मनोरथ पांडे जो पलायन गांव में रहते थे उन्‍होंने यहां पर तपस्‍या की और सफलता पूर्वक इस स्‍थान पर शिवलिंग को स्‍थापित किया। तभी से यहां शिवरात्रि के अवसर पर मेले का आयोजन किया जाता है और बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस मंदिर में भारी संख्‍या में श्रद्वालु विशेष रूप से शिवरात्रि के अवसर पर और श्रवण माह में हर सोमवार को काफी भीड़ रहती है।

इसके अलावा यहां पर कई अन्‍य मंदिर भी स्थित है। सबसे प्रमुख मंदिरों में से अर्थे भैरव मंदिर, दत्तातरे महाराज, गंगामाई मंदिर, हनुमान मंदिर, दुर्गा मंदिर, कालिका मंदिर, थिंगल मंदिर,पंचम जुनाखरा और वनेश्रवर मंदिर आदि भी स्थित है।

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