bharmour to chamba to delhi ,हडसर से दिल्ली घर वापसी चम्बा और पठानकोट होते हुए

भरमौर वापसी में काफी खूबसूरत नजारे देखने को मिले इस वक्त मौसम काफी साफ था । यहां भरमौर और उसके आसपास के क्षेत्र में सेव के पेड भी काफी थे । हम जिस रास्ते पर जा रहे थे इस पर काफी भूस्खलन था जिसका वर्णन और फोटो मै आपके सामने रख चुका हूं । कई जगह तो रास्ता रूका रहता था और फिर हाथ दे देकर रास्ता पास कराते थे । और इसी









भरमौर वापसी में काफी खूबसूरत नजारे देखने को मिले इस वक्त मौसम काफी साफ था । यहां भरमौर और उसके आसपास के क्षेत्र में सेव के पेड भी काफी थे । हम जिस रास्ते पर जा रहे थे इस पर काफी भूस्खलन था जिसका वर्णन और फोटो मै आपके सामने रख चुका हूं । कई जगह तो रास्ता रूका रहता था और फिर हाथ दे देकर रास्ता पास कराते थे । और इसी बीच एक जगह एक्सीडेंट हो गया था । एक गाडी ने पहले तो दो राह चलते आदमियो को टक्कर मारी और उसके बाद वो पहाड से नीचे गिर गयी । बस ये शुक्र रहा कि जहां से वो गाडी गिरी उसके नीचे एकदम गहरी खाई नही थी ब​ल्कि कुछ नीचे को एक छोटी पहाडी और थी और उस पर एक घर बना हुआ था । गाडी वही थी पहाडो में सबसे ज्यादा उपयोग होने वाली महिन्द्रा मैक्स और  उसमें सब्जियां लदी हुई थी । गिरने से पहले वो एक पेड से टकरायी और फिर सीधे घर की छत के उपर जा गिरी । घर में उस वक्त कोई नही था सो जान बच गयी । ड्राइवर की भी और घर वालो की भी । 



पर आप फोटो में देख सकते हैं कि कितना भयंकर हादसा था ये और कितना हो सकता था । जहां कि मै ये घटना लिख रहा हूं उसी से कुछ किलोमीटर दूर हमारे आने के बाद यात्रा के दौरान एक बस के खाई में गिर जाने के कारण 52 लोगो की मौत हो गयी थी । ये भी एक मिनी बस थी और इसमें 90 सवारियां छत तक भरी हुई थी । जो भी दुर्घटनाये होती हैं उसमें चलाने वाले की भी और बैठने वाले की दोनेा की गलती होती है जब आपका ड्राइवर अति तेज चलाता है तो आप अगर टोकते नही तो ये आपकी गलती भी है । अगले दिन सुबह चंबा में इस घटना के बारे में जो खबर छपी उसका फोटो भी लगा दिया है । इसके अलावा भी रास्ते मे कई जगह ऐसे भयंकर हादसे देखे हमने जिसमें गाडी नदी में गिर गयी थी और गिरने के बाद उस गाडी में सवार लोगो का तो जो हुआ सेा हुआ पर उस गाडी की तो सुध लेने वाला कोई नही था । कई जगह महिन्द्रा की गाडी से लेकर बसे तक अटकी पडी थी । रास्ते में एक जगह बडा सुंदर नजारा आया ।




 जहां एक सुंदर सी घाटी जो कि बडे सुंदर पत्थरो से बनी हुई थी और कुदरत ने एक बढिया जगह से दूध सा बहता पानी चला रखा था को देखने को हम फिर से रूक गये । ये छोटा सा पानी का श्रोत आगे रावी नदी में मिल रहा था । ये गांव दुर्गैठी की जगह थी और खास बात ये थी कि यहां हर जगह रास्ते पर हर ग्राम पंचायत ने अपने अपने नाम के स्वागत के बोर्ड लगा रखे थे । इसके बाद चंबा आ गया और शाम होने ही वाली थी । एक जगह हनुमान और शनि मंदिर आ गये तो हमने वहां के पुजारी जो कि बाहर ही खडे थे उनसे पूछा कि होटल कहां मिल सकता है  उन्होने बस स्टैंड के पास को बता दिया । चंबा में बाईपास को छोडकर मुख्य शहर मे घुस गये । यहां रास्ते में एक जगह लिखा था कि यहां पर कमरे उपलब्ध हैं वहीं पर पूछा तो उसने 250 रू में डबल बैड का कमरा बताया । हमने खट से 4 कमरे बुक कर लिये । 1000 रू भी दे दिये । होटल जो था वो जिसका था नीचे की मंजिल पर उसका परिवार रहता था और कुल जमा 5 कमरो में से एक भरा था बाकी खाली थे । पर थोडी देर बाद ही हमें उसके सस्ता होने की हकीकत पता चल गयी । टीवी था पर चल नही र​हा था । गीजर तक था पर किसी टोंटी में पानी नही था । 





रूम सर्विस के लिये एक लडका रख छोडा था होटल वाले ने पर वो रूम सर्विस कम घर के काम ज्यादा करता था । वैसे 250 में 3 आदमी प्रति कमरे में थे यानि की 75 रू प्रति आदमी पड रहा था और कमरो में कोई कमी नही थी बस सुविधा थोडी परेशान कर रही थी कमरा देते ही लडका गायब हो गया था । जब काफी देर तक नही मिला तो हमने घर का दरवाजा खटखटाया और गृ​हस्वामिनी से बडे प्यार से कहा कि यदि आप पानी का इंतजाम नही करते तो हमें पैसे वापस दे देा तब जाकर उसने मोटर चलाया और पानी आया । अब खाना ढूंढना  था । होटल से थोडी ही दूर बस  स्टैंड था और वहीं पर खाने के कुछ होटल थे जिनमे 50 रू थाली मिल रही थी और यहां भी वही सिस्टम था पहले चावल परोसे जाते थे फिर रोटी चाहे कितना भी कह लो उन्हे । खाना खा पीकर हम होटल में वापस लौटे और हिसाब करने लगे । एक आदमी के हिस्से में 1700 रू आये थे चंबा तक । आगे दिल्ली जाने वाले को 500 रू और देने थे और मराठा तो बाइक से निकलने वाले थे और संदीप भाई और विपिन का कार्यक्रम आगे जाने का था । आगे मतलब  कहां जाना ​था ये पता नही था अभी तक । मेरे बास का भी फोन आ गया था जिन कांवड की छुटिटयो के उपर मै मुह धोकर आया था वो अभी तक नही हो पायी थी और राजेश जी जिनकी गाडी थी उनके घर में किसी के बीमार होने के कारण उन्होने हडसर में ही कह दिया था कि हम आगे नही जा पायेंगे ।




 गाडी की जिम्मेदारी पर वो देने को भी तैयार थे पर ​यूं किसी का वाहन लेना ठीक नही होता । इसलिये यात्रा को यहीं पर कुछ विराम और कुछ गति देने की सहमति हो गयी । विराम इसलिये कि मराठा और राजेश जी तीनो लोग और मै और विधान और उनके साथी सब दिल्ली वापस जा रहे थे जबकि विपिन और संदीप अगले दिन (चलो राज खोल देता हूं )मसरूर और पालमपुर गये । वे छुक छुक ट्रेन मे भी गये और कसोग भी और तीन दिन बाद वापिस आये । घर आकर अगले दिन जो स्कूल जाने की तैयारी की तो छुटटी के आदेश आ गये । कर लो अब क्या करना है।  रात को हिसाब करके हम सब सेा गये । सुबह सवेरे 4 बजे उठकर जाट देवता और विपिन गायब हो गये और हम सब भी 5 बजे उठकर फ्रेश होकर 6 बजे गाडी में बैठकर चल दिये दिल्ली की ओर । मराठा संतोष और उनके साथी हमसे अलग रास्ते से गये उसी दिन देहरादून तक और रात को देहरादून में रूककर अगले दिन बद्रीनाथ फिर तुंगनाथ और केदारनाथ के दर्शन करके शिवरात्रि के दिन मेरे घर आकर रूके । कुल रात को 5 घंटे रूकने के बाद वो मुम्बई के लिये प्र्स्थान कर गये । सुबह सुबह चंबा का मिलेनियम ग्राउंड या चौगान ​देखने की इच्छा हुई । 




असल में रात को होटल में पोस्टर  लगा देखा था तो एक बार गाडी उधर को मोड ली । काफी सुंदर मैदान था पर इस समय आकर्षक नही लगा । बस जैसे हमारे यहां के पार्को में लोग घूमते हैं ऐसे ही लोग मार्निंग वाक ले रहे थे । इसलिये वहां पर ज्यादा देर नही रूके और जैसे ही चंबा से थोडा आगे निकले बारिश शुरू हो गयी । पठानकोट से थोडा पहले एक जगह नाश्ते के लिये रूके और उसके बाद जालंधर से आगे हाइवे पर खाना खाया ।  पंजाबी खाना मजेदार था वैसे भी हम तीन चार दिन से खाना ढंग का कहां खा पा रहे थे । या तो मैगी या फिर राजमा चावल । यहां पर शाही पनीर के साथ दही वगैरा से बडे मजे से खाना खाया गया । खाना खाकर हम सब सो गये बलवान के सिवा जो गाडी चला रहा था । शाम के 4 बजे हरियाणा राज्य की सीमा के अंदर कहीं गाडी रोकी ठंडा वगैरा पीने  के लिये । तभी यहां थोडी दूर पर एक टयूबवैल चलती नजर आयी । अभी हम बिल्कुल ठंडे इलाके में थे कई दिन से और जैसे ही हाइवे पर आये तो गर्मी शुरू हो गयी थी । वैसे तो गाडी में चलते समय गर्मी नही लग रही थी पर फिर भी गर्मी और उमस दोनेा थी । सो आव देखा ना ताव और सब टयूबवैल में कूद पडे । काफी बडी टयूबवैल थी और नहाने की जगह भी उसमें काफी थी सो सबने नहाने के काफी मजे लिये  । जहां हम एक एक घंटा चलने की सोच रहे थे वहीं फिर कुछ भी ध्यान नही रहा । नहा धोकर चलने के बाद हम फ्रेश हो गये थे । 




शाम के 7 बजे के करीब राजेश जी ने सप्रेम हमे बार्डर के पास मैट्रो स्टेशन जाने वाली गाडी में बिठाकर विदा दी । राजेश जी के बाद मै और विधान और उनके साथी तीनो रह गये थे । दिल्ली कश्मीरी गेट मैट्रो पर मै और विधान उतर गये । जयपुर की गाडी पकडने से पहले हमने साथ में चाय वगैरा पी और फिर विधान चला गया  अब तक रात के 8 बज चुके थे । मै मेरठ की गाडी जो कि सामने के लोकल स्टैंड से मिलती है उस पर जाकर मेरठ की गाडी का इंतजार करने लगा । आधे घंटे बाद गाडी आयी तो हमने भागकर सीट ले ली । ड्राइवर और कंडक्टर ने सबसे पहले तो सामान वालो का सामान रखवाया क्योंकि वो उनकी कमाई का ​जरिया था और फिर खाना खाने चले गये । मन निश्चिंत था क्योंकि अब तो घर के सामने ही उतरना था । पर जैसे ही खाना खाकर ड्राइवर आया तो उसने उदघोषणा ​की कि गाडी में मेरठ से पहले कोई ना हो क्योंकि कांवड की वजह से रास्ता बंद है और गाडी हापुड  को जायेगी । रात के साढे नौ बजे उसने बम फोडा पहले नही बता सकता था । खैर तुरंत भागकर फिर मैट्रो स्टेशन पहुंचा और आनंद विहार की मैट्रो पकडी । आनंद विहार से पहले तो ममेरे  भाई को फोन लगाया कि मेरी बाइक लेकर आ जाओ । वो उधर से चल पडा इधर मुझे एक आटो मिला  जिसने मुझे बीस रूपये लेकर मोहननगर उतार दिया । मोहननगर से अपनी बाइक पर रात को बारह बजे घर पहुंचा


इस पोस्ट में 1600 शब्द हैं

आप सबने इस पूरी यात्रा में मेरा सहयोग दिया और आपके सहयोग एवं प्रोत्साहन के कारण ही मै लिख सका । ऐसा ही आगे बनाये रखिये

MANIMAHESH YATRA-






























अब दिल्ली दूर नही


मेरा मुझ में कुछ नही जो कुछ है सो तेरा










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TravelUFO । Musafir hoon yaaron: bharmour to chamba to delhi ,हडसर से दिल्ली घर वापसी चम्बा और पठानकोट होते हुए
bharmour to chamba to delhi ,हडसर से दिल्ली घर वापसी चम्बा और पठानकोट होते हुए
भरमौर वापसी में काफी खूबसूरत नजारे देखने को मिले इस वक्त मौसम काफी साफ था । यहां भरमौर और उसके आसपास के क्षेत्र में सेव के पेड भी काफी थे । हम जिस रास्ते पर जा रहे थे इस पर काफी भूस्खलन था जिसका वर्णन और फोटो मै आपके सामने रख चुका हूं । कई जगह तो रास्ता रूका रहता था और फिर हाथ दे देकर रास्ता पास कराते थे । और इसी
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